किष्किन्धाकाण्ड, सर्ग 6
पुनरेवाब्रवीत् प्रीतो राघवं रघुनन्दनम् । अयमाख्याति ते राम सचिवो मन्त्रिसत्तमः ॥ १ ॥ हनुमान् यन्निमित्तं त्वं निर्जनं वनमागतः ।
भावार्थ
सुग्रीवने पुनः प्रसन्नतापूर्वक रघुकुलनन्दन श्रीरामचन्द्रजीसे कहा—‘श्रीराम ! मेरे मन्त्रियोंमें श्रेष्ठ सचिव ये हनुमान्जी आपके विषयमें वह सारा वृत्तान्त बता चुके हैं, जिसके कारण आपको इस निर्जन वनमें आना पड़ा है ॥ १½ ॥
लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा वसतश्च वने तव ॥ २ ॥ रक्षसापहृता भार्या मैथिली जनकात्मजा । त्वया वियुक्ता रुदती लक्ष्मणेन च धीमता ॥ ३ ॥ अन्तरं प्रेप्सुना तेन हत्वा गृध्रं जटायुषम् । भार्यावियोगजं दुःखं प्रापितस्तेन रक्षसा ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘अपने भाई लक्ष्मणके साथ जब आप वनमें निवास करते थे, उस समय राक्षस रावणने आपकी पत्नी मिथिलेशकुमारी जनकनन्दिनी सीताको हर लिया । उस वेलामें आप उनसे अलग थे और बुद्धिमान् लक्ष्मण भी उन्हें अकेली छोड़कर चले गये थे । राक्षस इसी अवसरकी प्रतीक्षामें था । उसने गीध जटायुका वध करके रोती हुई सीताका अपहरण किया है । इस प्रकार उस राक्षसने आपको पत्नी-वियोगके कष्टमें डाल दिया है ॥ २–४ ॥
भार्यावियोगजं दुःखं नचिरात् त्वं विमोक्ष्यसे । अहं तामानयिष्यामि नष्टां वेदश्रुतीमिव ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘परंतु इस पत्नी-वियोगके दुःखसे आप शीघ्र ही मुक्त हो जायँगे । मैं राक्षसद्वारा हरी गयी वेदवाणीके समान आपकी पत्नीको वापस ला दूँगा ॥ ५ ॥
रसातले वा वर्तन्तीं वर्तन्तीं वा नभस्तले । अहमानीय दास्यामि तव भार्यामरिंदम ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘शत्रुदमन श्रीराम ! आपकी भार्या सीता पातालमें हों या आकाशमें, मैं उन्हें ढूँढ़ लाकर आपकी सेवामें समर्पित कर दूँगा ॥ ६ ॥
इदं तथ्यं मम वचस्त्वमवेहि च राघव । न शक्या सा जरयितुमपि सेन्द्रैः सुरासुरैः ॥ ७ ॥ तव भार्या महाबाहो भक्ष्यं विषकृतं यथा । त्यज शोकं महाबाहो तां कान्तामानयामि ते ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘रघुनन्दन ! आप मेरी इस बातको सत्य मानें । महाबाहो ! आपकी पत्नी जहर मिलाये हुए भोजनकी भाँति दूसरोंके लिये अग्राह्य है । इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता और असुर भी उन्हें पचा नहीं सकते । आप शोक त्याग दीजिये । मैं आपकी प्राणवल्लभाको अवश्य ला दूँगा ॥ ७-८ ॥
अनुमानात् तु जानामि मैथिली सा न संशयः । ह्रियमाणा मया दृष्टा रक्षसा रौद्रकर्मणा ॥ ९ ॥ क्रोशन्ती रामरामेति लक्ष्मणेति च विस्वरम् । स्फुरन्ती रावणस्याङ्के पन्नगेन्द्रवधूर्यथा ॥ १० ॥
भावार्थ
‘एक दिन मैंने देखा, भयंकर कर्म करनेवाला कोई राक्षस किसी स्त्रीको लिये जा रहा है । मैं अनुमानसे समझता हूँ, वे मिथिलेशकुमारी सीता ही रही होंगी, इसमें संशय नहीं है; क्योंकि वे टूटे हुए स्वरमें ‘हा राम ! हा राम ! हा लक्ष्मण !’ पुकारती हुई रो रही थीं तथा रावणकी गोदमें नागराजकी वधू ( नागिन ) की भाँति छटपटाती हुई प्रकाशित हो रही थीं ॥ ९-१० ॥
आत्मना पञ्चमं मां हि दृष्ट्वा शैलतले स्थितम् । उत्तरीयं तया त्यक्तं शुभान्याभरणानि च ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘चार मन्त्रियोंसहित पाँचवाँ मैं इस शैल-शिखरपर बैठा हुआ था । मुझे देखकर देवी सीताने अपनी चादर और कई सुन्दर आभूषण ऊपरसे गिराये ॥ ११ ॥
तान्यस्माभिर्गृहीतानि निहितानि च राघव । आनयिष्याम्यहं तानि प्रत्यभिज्ञातुमर्हसि ॥ १२ ॥ तमब्रवीत् ततो रामः सुग्रीवं प्रियवादिनम् । आनयस्व सखे शीघ्रं किमर्थं प्रविलम्बसे ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘रघुनन्दन ! वे सब वस्तुएँ हमलोगोंने लेकर रख ली हैं । मैं अभी उन्हें लाता हूँ, आप उन्हें पहचान सकते हैं’ ॥ तब श्रीरामने यह प्रिय संवाद सुनानेवाले सुग्रीवसे कहा—‘सखे ! शीघ्र ले आओ, क्यों विलम्ब करते हो ?’॥१३॥
एवमुक्तस्तु सुग्रीवः शैलस्य गहनां गुहाम् । प्रविवेश ततः शीघ्रं राघवप्रियकाम्यया ॥ १४ ॥ उत्तरीयं गृहीत्वा तु स तान्याभरणानि च । इदं पश्येति रामाय दर्शयामास वानरः ॥ १५ ॥
भावार्थ
उनके ऐसा कहनेपर सुग्रीव शीघ्र ही श्रीरामचन्द्रजीका प्रिय करनेकी इच्छासे पर्वतकी एक गहन गुफामें गये और चादर तथा वे आभूषण लेकर निकल आये । बाहर आकर वानरराजने ‘लीजिये, यह देखिये’ ऐसा कहकर श्रीरामको वे सारे आभूषण दिखाये ॥ १४-१५ ॥
ततो गृहीत्वा वासस्तु शुभान्याभरणानि च । अभवद् बाष्पसंरुद्धो नीहारेणेव चन्द्रमाः ॥ १६ ॥
भावार्थ
उन वस्त्र और सुन्दर आभूषणोंको लेकर श्रीरामचन्द्रजी कुहासेसे ढके हुए चन्द्रमाकी भाँति आँसुओंसे अवरुद्ध हो गये ॥ १६ ॥
सीतास्नेहप्रवृत्तेन स तु बाष्पेण दूषितः । हा प्रियेति रुदन् धैर्यमुत्सृज्य न्यपतत् क्षितौ ॥ १७ ॥
भावार्थ
सीताके स्नेहवश बहते हुए आँसुओंसे उनका मुख और वक्षःस्थल भीगने लगे । वे ‘हा प्रिये !’ ऐसा कहकर रोने लगे और धैर्य छोड़कर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ १७ ॥
हृदि कृत्वा स बहुशस्तमलंकारमुत्तमम् । निश्श्वास भृशं सर्पो बिलस्थ इव रोषितः ॥ १८ ॥
भावार्थ
उन उत्तम आभूषणोंको बारंबार हृदयसे लगाकर वे बिलमें बैठे हुए रोषमें भरे सर्पकी भाँति जोर-जोरसे साँस लेने लगे ॥ १८ ॥
अविच्छिन्नाश्रुवेगस्तु सौमित्रिं प्रेक्ष्य पार्श्वतः । परिदेवयितुं दीनं रामः समुपचक्रमे ॥ १९ ॥
भावार्थ
उनके आँसुओंका वेग रुकता ही नहीं था । अपने पास खड़े हुए सुमित्राकुमार लक्ष्मणकी ओर देखकर श्रीराम दीनभावसे विलाप करते हुए बोले—॥ १९ ॥
पश्य लक्ष्मण वैदेह्या संत्यक्तं ह्रियमाणया । उत्तरीयमिदं भूमौ शरीराद् भूषणानि च ॥ २० ॥
भावार्थ
‘लक्ष्मण ! देखो, राक्षसके द्वारा हरी जाती हुई विदेहनन्दिनी सीताने यह चादर और ये गहने अपने शरीरसे उतारकर पृथ्वीपर डाल दिये थे ॥ २० ॥
शाद्वलिन्यां ध्रुवं भूम्यां सीतया ह्रियमाणया । उत्सृष्टं भूषणमिदं तथा रूपं हि दृश्यते ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘निशाचरके द्वारा अपहृत होती हुई सीताके द्वारा त्यागे गये ये आभूषण निश्चय ही घासवाली भूमिपर गिरे होंगे; क्योंकि इनका रूप ज्यों-का-त्यों दिखायी देता है—ये टूटे-फूटे नहीं हैं’ ॥ २१ ॥
पवमुक्तस्तु रामेण लक्ष्मणो वाक्यमब्रवीत् । नाहं जानामि केयूरे नाहं जानामि कुण्डले ॥ २२ ॥ नूपुरे त्वभिजानामि नित्यं पादाभिवन्दनात् । ततस्तु राघवो वाक्यं सुग्रीवमिदमब्रवीत् ॥ २३ ॥ ब्रूहि सुग्रीव कं देशं ह्रियन्ती लक्षिता त्वया । रक्षसा रौद्ररूपेण मम प्राणप्रिया हृता ॥ २४ ॥
भावार्थ
श्रीरामके ऐसा कहनेपर लक्ष्मण बोले—‘भैया ! मैं इन बाजूबंदोंको तो नहीं जानता और न इन कुण्डलोंको ही समझ पाता हूँ कि किसके हैं; परंतु प्रतिदिन भाभीके चरणोंमें प्रणाम करनेके कारण मैं इन दोनों नूपुरोंको अवश्य पहचानता हूँ’ ॥ तब श्रीरघुनाथजी सुग्रीवसे इस प्रकार बोले—‘सुग्रीव ! तुमने तो देखा है, वह भयंकर रूपधारी राक्षस मेरी प्राणप्यारी सीताको किस दिशाकी ओर ले गया है, यह बताओ ॥ २३-२४ ॥
क्व वा वसति तद् रक्षो महद् व्यसनदं मम । यन्निमित्तमहं सर्वान् नाशयिष्यामि राक्षसान् ॥ २५ ॥
भावार्थ
‘मुझे महान् संकट देनेवाला वह राक्षस कहाँ रहता है ? मैं केवल उसीके अपराधके कारण समस्त राक्षसोंका विनाश कर डालूँगा ॥ २५ ॥
हरता मैथिलीं येन मां च रोषयता ध्रुवम् । आत्मनो जीवितान्ताय मृत्युद्वारमपावृतम् ॥ २६ ॥
भावार्थ
‘उस राक्षसने मैथिलीका अपहरण करके मेरा रोष बढ़ाकर निश्चय ही अपने जीवनका अन्त करनेके लिये मौतका दरवाजा खोल दिया है ॥ २६ ॥
मम दयिततमा हृता वनाद् रजनिचरेण विमथ्य येन सा । कथय मम रिपुं तमद्य वै प्लवगपते यमसंनिधिं नयामि ॥ २७ ॥
भावार्थ
‘वानरराज ! जिस निशाचरने मुझे धोखेमें डालकर मेरा अपमान करके मेरी प्रियतमाका वनसे अपहरण किया है, वह मेरा घोर शत्रु है । तुम उसका पता बताओ । मैं अभी उसे यमराजके पास पहुँचाता हूँ’ ॥ २७ ॥
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