किष्किन्धाकाण्ड, सर्ग 59
ततस्तदमृतास्वादं गृध्रराजेन भाषितम् । निशम्य वदता हृष्टास्ते वचः प्लवगर्षभाः ॥ १ ॥
भावार्थ
उस समय वार्तालाप करते हुए गृध्रराजके द्वारा कहे गये उस अमृतके समान स्वादिष्ट मधुर वचनको सुनकर सब वानरश्रेष्ठ हर्षसे खिल उठे ॥ १ ॥
जाम्बवान् वानरश्रेष्ठः सह सर्वैः प्लवङ्गमैः । भूतलात् सहसोत्थाय गृध्रराजानमब्रवीत् ॥ २ ॥
भावार्थ
वानरों और भालुओंमें श्रेष्ठ जाम्बवान् सब वानरोंके साथ सहसा भूतलसे उठकर खड़े हो गये और गृध्रराजसे इस प्रकार पूछने लगे—॥ २ ॥
क्व सीता केन वा दृष्टा को वा हरति मैथिलीम् । तदाख्यातु भवान् सर्वं गतिर्भव वनौकसाम् ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘पक्षिराज ! सीता कहाँ हैं ? किसने उन्हें देखा है ! और कौन उन मिथिलेशकुमारीको हरकर ले गया है ! ये सब बातें बताइये और हम सब वनवासी वानरोंके आश्रयदाता होइये ॥ ३ ॥
को दाशरथिबाणानां वज्रवेगनिपातिनाम् । स्वयं लक्ष्मणमुक्तानां न चिन्तयति विक्रमम् ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘कौन ऐसा धृष्ट है, जो वज्रके समान वेगपूर्वक चोट करनेवाले दशरथनन्दन श्रीरामके बाणों तथा स्वयं लक्ष्मणके चलाये हुए सायकोंके पराक्रमको कुछ नहीं समझता है?’॥४॥
स हरीन् प्रतिसम्मुक्तान् सीताश्रुतिसमाहितान् । पुनराश्वासयन् प्रीत इदं वचनमब्रवीत् ॥ ५ ॥
भावार्थ
उस समय उपवास छोड़कर बैठे और सीताजीका वृत्तान्त सुननेके लिये एकाग्र हुए, उन वानरोंको प्रसन्नतापूर्वक पुनः आश्वासन देते हुए सम्पातिने उनसे यह बात कही—॥ ५ ॥
श्रूयतामिह वैदेह्या यथा मे हरणं श्रुतम् । येन चापि ममाख्यातं यत्र चायतलोचना ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘वानरो ! विदेहकुमारी सीताका जिस प्रकार अपहरण हुआ है, विशाललोचना सीता इस समय जहाँ है और जिसने मुझसे यह सब वृत्तान्त कहा है एवं जिस तरह मैंने सुना है, वह सब बताता हूँ, सुनो ॥ ६ ॥
अहमस्मिन् गिरौ दुर्गे बहुयोजनमायते । चिरान्निपतितो वृद्धः क्षीणप्राणपराक्रमः ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘यह दुर्गम पर्वत कई योजनोंतक फैला है । दीर्घकाल हुआ, जब मैं इस पर्वतपर गिरा था । मेरी प्राणशक्ति क्षीण हो गयी थी और मैं वृद्ध था ॥ ७ ॥
तं मामेवंगतं पुत्रः सुपार्श्वो नाम नामतः । आहारेण यथाकालं बिभर्ति पततां वरः ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘इस अवस्थामें मेरा पुत्र पक्षिप्रवर सुपार्श्व ही यथासमय आहार देकर प्रतिदिन मेरा भरण-पोषण करता है ॥८॥
तीक्ष्णकामास्तु गन्धर्वास्तीक्ष्णकोपा भुजङ्गमाः । मृगाणां तु भयं तीक्ष्णं ततस्तीक्ष्णक्षुधा वयम् ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘जैसे गन्धर्वोंका कामभाव तीव्र होता है, सर्पोंका क्रोध तेज होता है और मृगोंको भय अधिक होता है, उसी प्रकार हमारी जातिके लोगोंकी भूख बड़ी तीव्र होती है ॥ ९ ॥
स कदाचित् क्षुधार्तस्य ममाहाराभिकाङ्क्षिणः । गतसूर्येऽहनि प्राप्तो मम पुत्रो ह्यनामिषः ॥ १० ॥
भावार्थ
‘एक दिनकी बात है मैं भूखसे पीड़ित होकर आहार प्राप्त करना चाहता था । मेरा पुत्र मेरे लिये भोजनकी तलाशमें निकला था, किंतु सूर्यास्त होनेके बाद वह खाली हाथ लौट आया, उसे कहीं मांस नहीं मिला ॥ १० ॥
स मयाऽऽहारसंरोधात् पीडितः प्रीतिवर्धनः । अनुमान्य यथातत्त्वमिदं वचनमब्रवीत् ॥ ११ ॥ अहं तात यथाकालमामिषार्थी खमाप्लुतः । महेन्द्रस्य गिरेर्द्वारमावृत्य सुसमाश्रितः ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘भोजन न मिलनेसे मैंने कठोर बातें सुनाकर अपनी प्रीति बढ़ानेवाले उस पुत्रको बहुत पीड़ा दी, किंतु उसने नम्रतापूर्वक मुझे आदर देते हुए यह यथार्थ बात कही—॥ ‘तात ! मैं यथासमय मांस प्राप्त करनेकी इच्छासे आकाशमें उड़ा और महेन्द्र पर्वतके द्वारको रोककर खड़ा हो गया ॥ १२ ॥
तत्र सत्त्वसहस्राणां सागरान्तरचारिणाम् । पन्थानमेकोऽध्यवसं संनिरोद्धुमवाङ्मुखः ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘वहाँ अपनी चोंच नीची करके मैं समुद्रके भीतर विचरनेवाले सहस्रों जन्तुओंके मार्गको रोकनेके लिये अकेला ठहर गया ॥ १३ ॥
तत्र कश्चिन्मयादृष्टः सूर्योदयसम प्रभाम् । स्त्रियमादाय गच्छन् वै भिन्नाञ्जनचयोपमः ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘उस समय मैंने देखा खानसे काटकर निकाले हुए कोयलेकी राशिके समान काला कोई पुरुष एक स्त्रीको लेकर जा रहा है । उस स्त्रीकी कान्ति सूर्योदयकालकी प्रभाके समान प्रकाशित हो रही थी ॥ १४ ॥
सोऽहमभ्यवहारार्थं तौ दृष्ट्वा कृतनिश्चयः । तेन साम्ना विनीतेन पन्थानमनुयाचितः ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘उस स्त्री और उस पुरुषको देखकर मैंने उन्हें आपके आहारके लिये लानेका निश्चय किया, किंतु उस पुरुषने नम्रतापूर्वक मधुर वाणीमें मुझसे मार्गकी याचना की ॥ १५ ॥
नहि सामोपपन्नानां प्रहर्ता विद्यते भुवि । नीचेष्वपि जनः कश्चित् किमङ्ग बत मद्विधः ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘पिताजी ! भूतलपर नीच पुरुषोंमें भी कोई ऐसा नहीं है, जो विनयपूर्वक मीठे वचन बोलनेवालोंपर प्रहार करे । फिर मुझ-जैसा कुलीन पुरुष कैसे कर सकता है ? ॥ १६ ॥
स यातस्तेजसा व्योम संक्षिपन्निव वेगितः । अथाहं खेचरैर्भूतैरभिगम्य सभाजितः ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘फिर तो वह तेजसे आकाशको व्याप्त करता हुआ-सा वेगपूर्वक चला गया । उसके चले जानेपर आकाशचारी प्राणी सिद्ध-चारण आदिने आकर मेरा बड़ा सम्मान किया ॥ १७ ॥
दिष्ट्या जीवति सीतेति ह्यब्रुवन् मां महर्षयः । कथंचित् सकलत्रोऽसौ गतस्ते स्वस्त्यसंशयम् ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘वे महर्षि मुझसे बोले—‘सौभाग्यकी बात है कि सीता जीवित हैं । तुम्हारी दृष्टि पड़नेपर भी स्त्रीके साथ आया हुआ वह पुरुष किसी तरह सकुशल बच गया; अतः अवश्य तुम्हारा कल्याण हो’ ॥ १८ ॥
एवमुक्तस्ततोऽहं तैः सिद्धैः परमशोभनैः । स च मे रावणो राजा रक्षसां प्रतिवेदितः ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘उन परम शोभायमान सिद्ध पुरुषोंने मुझसे ऐसा कहा, तत्पश्चात् उन्होंने यह भी बताया कि ‘वह काला पुरुष राक्षसोंका राजा रावण था’ ॥ १९ ॥
पश्यन् दाशरथेर्भार्यां रामस्य जनकात्मजाम् । भ्रष्टाभरणकौशेयां शोकवेगपराजिताम् ॥ २० ॥ रामलक्ष्मणयोर्नाम क्रोशन्तीं मुक्तमूर्धजाम् । एष कालात्ययस्तात इति वाक्यविदां वरः ॥ २१ ॥ एतदर्थं समग्रं मे सुपार्श्वः प्रत्यवेदयत् । तच्छ्रुत्वापि हि मे बुद्धिर्नासीत् काचित् पराक्रमे ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘तात ! दशरथनन्दन श्रीरामकी पत्नी जनककिशोरी सीता शोकके वेगसे पराजित हो गयी थीं । उनके आभूषण गिर रहे थे और रेशमी वस्त्र भी सिरसे खिसक गया था । उनके केश खुले हुए थे और वे श्रीराम तथा लक्ष्मणका नाम ले-लेकर उन्हें पुकार रही थीं । मैं उनकी इस दयनीय दशाको देखता रह गया । यही मेरे विलम्बसे आनेका कारण है ।’ इस प्रकार बातचीतकी कला जाननेवालोंमें श्रेष्ठ सुपार्श्व-ने मेरे सामने इन सारी बातोंका वर्णन किया । यह सब सुनकर भी मेरे हृदयमें पराक्रम कर दिखानेका कोई विचार नहीं उठा ॥ २०-२२ ॥
अपक्षो हि कथं पक्षी कर्म किंचित् समारभेत् । यत् तु शक्यं मया कर्तुं वाग्बुद्धिगुणवर्तिना ॥ २३ ॥ श्रूयतां तत्र वक्ष्यामि भवतां पौरुषाश्रयम् ।
भावार्थ
‘बिना पंखका पक्षी कैसे कोई पराक्रम कर सकता है ? अपनी वाणी और बुद्धिके द्वारा साध्य जो उपकाररूप गुण है, उसे करना मेरा स्वभाव बन गया है । ऐसे स्वभावसे मैं जो कुछ कर सकता हूँ, वह कार्य तुम्हें बता रहा हूँ, सुनो । वह कार्य तुमलोगोंके पुरुषार्थसे ही सिद्ध होनेवाला है ॥ २३½ ॥
वाङ्मतिभ्यां हि सर्वेषां करिष्यामि प्रियं हि वः ॥ २४ ॥ यद्धि दाशरथेः कार्यं मम तन्नात्र संशयः ।
भावार्थ
‘मैं वाणी और बुद्धिके द्वारा तुम सब लोगोंका प्रिय कार्य अवश्य करूँगा; क्योंकि दशरथनन्दन श्रीरामका जो कार्य है, वह मेरा ही है—इसमें संशय नहीं है ॥ २४½ ॥
तद् भवन्तो मतिश्रेष्ठा बलवन्तो मनस्विनः ॥ २५ ॥ प्रहिताः कपिराजेन देवैरपि दुरासदाः ।
भावार्थ
‘तुमलोग भी उत्तम बुद्धिसे युक्त, बलवान्, मनस्वी तथा देवताओंके लिये भी दुर्जय हो । इसीलिये वानरराज सुग्रीवने तुम्हें इस कार्यके लिये भेजा है ॥ २५½ ॥
रामलक्ष्मणबाणाश्च विहिताः कङ्कपत्रिणः ॥ २६ ॥ त्रयाणामपि लोकानां पर्याप्तास्त्राणनिग्रहे ।
भावार्थ
‘श्रीराम और लक्ष्मणके कङ्कपत्रसे युक्त जो बाण हैं, वे साक्षात् विधाताके बनाये हुए हैं । वे तीनों लोकोंका संरक्षण और दमन करनेके लिये पर्याप्त शक्ति रखते हैं ॥२६½॥
कामं खलु दशग्रीवस्तेजोबलसमन्वितः । भवतां तु समर्थानां न किंचिदपि दुष्करम् ॥ २७ ॥
भावार्थ
‘तुम्हारा विपक्षी दशग्रीव रावण भले ही तेजस्वी और बलवान् है, किंतु तुम-जैसे सामर्थ्यशाली वीरोंके लिये उसे परास्त करना आदि कोई भी कार्य दुष्कर नहीं है ॥ २७ ॥
तदलं कालसङ्गेन क्रियतां बुद्धिनिश्चयः । नहि कर्मसु सज्जन्ते बुद्धिमन्तो भवद्विधाः ॥ २८ ॥
भावार्थ
‘अतः अब अधिक समय बितानेकी आवश्यकता नहीं है । अपनी बुद्धिके द्वारा दृढ निश्चय करके सीताके दर्शनके लिये उद्योग करो; क्योंकि तुम-जैसे बुद्धिमान् लोग कार्योंकी सिद्धिमें विलम्ब नहीं करते हैं’ ॥ २८ ॥
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