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किष्किन्धाकाण्ड, सर्ग 53

ततस्ते दद्दशुर्घोरं सागरं वरुणालयम् । अपारमभिगर्जन्तं घोरैरूर्मिभिराकुलम् ॥ १ ॥

भावार्थ

तदनन्तर उन श्रेष्ठ वानरोंने वरुणकी निवासभूमि भयंकर महासागरको देखा, जिसका कहीं पार नहीं था और जो भयानक लहरोंसे व्याप्त होकर निरन्तर गर्जना कर रहा था॥१॥

मयस्य मायाविहितं गिरिदुर्गं विचिन्वताम् । तेषां मासो व्यतिक्रान्तो यो राज्ञा समयः कृतः ॥ २ ॥

भावार्थ

मयासुरके अपनी मायाद्वारा बनाये हुए पर्वतकी दुर्गम गुफामें सीताकी खोज करते हुए उन वानरोंका वह एक मास बीत गया, जिसे राजा सुग्रीवने लौटनेका समय निश्चित किया था ॥ २ ॥

विन्ध्यस्य तु गिरेः पादे सम्प्रपुष्पितपादपे । उपविश्य महात्मानश्चिन्तामापेदिरे तदा ॥ ३ ॥

भावार्थ

विन्ध्यगिरिके पार्श्ववर्ती पर्वतपर, जहाँके वृक्ष फूलोंसे लदे थे, बैठकर वे सभी महात्मा वानर चिन्ता करने लगे ॥ ३ ॥

ततः पुष्पातिभाराग्राँल्लताशतसमावृतान् । द्रुमान् वासन्तिकान् दृष्ट्वा बभूवुर्भयशङ्किताः ॥ ४ ॥

भावार्थ

जो वसन्त ऋतुमें फलते हैं, उन आम आदि वृक्षोंकी डालियोंको मञ्जरी एवं फूलोंके अधिक भारसे झुकी हुई तथा सैकड़ों लता-वेलोंसे व्याप्त देख वे सभी सुग्रीवके भयसे थर्रा उठे ( वे शरद्-ऋतुमें चले थे और शिशिर-ऋतु आ गयी थी । इसीलिये उनका भय बढ़ गया था ) ॥ ४ ॥

ते वसन्तमनुप्राप्तं प्रतिवेद्य परस्परम् । नष्टसंदेशकालार्था निपेतुर्धरणीतले ॥ ५ ॥

भावार्थ

वे एक दूसरेको यह बताकर कि अब वसन्तका समय आना चाहता है, राजाके आदेशके अनुसार एक मासके भीतर जो काम कर लेना चाहिये था, वह न कर सकने या उसे नष्ट कर देनेके कारण भयके मारे पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ५ ॥

ततस्तान् कपिवृद्धांश्च शिष्यांश्चैव वनौकसः । वाचा मधुरयाऽऽभाष्य यथावदनुमान्य च ॥ ६ ॥ स तु सिंहवृषस्कन्धः पीनायतभुजः कपिः। युवराजो महाप्राज्ञ अङ्गदो वाक्यमब्रवीत् ॥ ७ ॥

भावार्थ

तब जिनके कंधे सिंह और बैलके समान मांसल थे, भुजाएँ बड़ी-बड़ी और मोटी थीं तथा जो बड़े बुद्धिमान् थे, वे युवराज अङ्गद उन श्रेष्ठ वानरों तथा अन्य वनवासी कपियोंको यथावत् सम्मान देते हुए मधुर वाणीसे सम्बोधित करके बोले—॥ ६-७ ॥

शासनात् कपिराजस्य वयं सर्वे विनिर्गताः। मासः पूर्णो बिलस्थानां हरयः किं न बुध्यत ॥ ८ ॥ वयमाश्वयुजे मासि कालसंख्याव्यवस्थिताः। प्रस्थिताः सोऽपि चातीतः किमतः कार्यमुत्तरम् ॥ ९ ॥

भावार्थ

‘वानरो ! हम सब लोग वानरराजकी आज्ञासे आश्विन मास बीतते-बीतते एक मासकी निश्चित अवधि स्वीकार करके सीताकी खोजके लिये निकले थे, किंतु हमारा वह एक मास उस गुफामें ही पूरा हो गया, क्या आपलोग इस बातको नहीं जानते ? हम जब चले थे, तबसे लौटनेके लिये जो मास निर्धारित हुआ था, वह भी बीत गया; अतः अब आगे क्या करना चाहिये ? ॥ ८-९ ॥

भवन्तः प्रत्ययं प्राप्ता नीतिमार्गविशारदाः। हितेष्वभिरता भर्तुर्निसृष्टाः सर्वकर्मसु ॥ १० ॥

भावार्थ

‘आपलोगोंको राजाका विश्वास प्राप्त है। आप नीति-मार्गमें निपुण हैं और स्वामीके हितमें तत्पर रहते हैं। इसीलिये आपलोग यथासमय सब कार्योंमें नियुक्त किये जाते हैं ॥ १० ॥

कर्मस्वप्रतिमाः सर्वे दिक्षु विश्रुतपौरुषाः। मां पुरस्कृत्य निर्याताः पिङ्गाक्षप्रतिचोदिताः ॥ ११ ॥ इदानीमकृतार्थानां मर्तव्यं नात्र संशयः। हरिराजस्य संदेशमकृत्वा कः सुखी भवेत् ॥ १२ ॥

भावार्थ

कार्य सिद्ध करनेमें आपलोगोंकी समानता करनेवाला कोई नहीं है। आप सभी अपने पुरुषार्थके लिये सभी दिशाओंमें विख्यात हैं। इस समय वानरराज सुग्रीवकी आज्ञासे मुझे आगे करके आपलोग जिस कार्यके लिये निकले थे, उसमें आप और हम सफल न हो सके। ऐसी दशामें हमलोगोंको अपने प्राणोंसे हाथ धोना पड़ेगा, इसमें संशय नहीं है। भला वानरराजके आदेशका पालन न करके कौन सुखी रह सकता है ? ॥ ११-१२ ॥

अस्मिन्नतीते काले तु सुग्रीवेण कृते स्वयम्। प्रायोपवेशनं युक्तं सर्वेषां च वनौकसाम् ॥ १३ ॥

भावार्थ

‘स्वयं सुग्रीवने जो समय निश्चित किया था, उसके बीत जानेपर हम सब वानरोंके लिये उपवास करके प्राण त्याग देना ही ठीक जान पड़ता है ॥ १३ ॥

तीक्ष्णः प्रकृत्या सुग्रीवः स्वामिभावे व्यवस्थितः। न क्षमिष्यति नः सर्वानपराधकृतो गतान् ॥ १४ ॥

भावार्थ

‘सुग्रीव स्वभावसे ही कठोर हैं। फिर इस समय तो वे हमारे राजाके पदपर स्थित हैं। जब हम अपराध करके उनके पास जायँगे, तब वे कभी हमें क्षमा नहीं करेंगे ॥१४॥

अप्रवृत्तौ च सीतायाः पापमेव करिष्यति। तस्मात् क्षममिहाद्यैव गन्तुं प्रायोपवेशनम् ॥ १५ ॥ त्यक्त्वा पुत्रांश्च दारांश्च धनानि च गृहाणि च।

भावार्थ

‘उल्टे सीताका समाचार न पानेपर हमारा वध ही कर डालेंगे, अतः हमें आज ही यहाँ स्त्री, पुत्र, धन-सम्पत्ति और घर-द्वारका मोह छोड़कर मरणान्त उपवास आरम्भ कर देना चाहिये ॥ १५½ ॥

ध्रुवं नो हिंसते राजा सर्वान् प्रतिगतानितः ॥ १६ ॥ वधेनाप्रतिरूपेण श्रेयान् मृत्युरिहैव नः।

भावार्थ

‘यहाँसे लौटनेपर राजा सुग्रीव निश्चय ही हम सबका वध कर डालेंगे। अनुचित वधकी अपेक्षा यहीं मर जाना हम लोगोंके लिये श्रेयस्कर है॥ १६½ ॥

न चाहं यौवराज्येन सुग्रीवेणाभिषेचितः ॥ १७ ॥ नरेन्द्रेणाभिषिक्तोऽस्मि रामेणाक्लिष्टकर्मणा।

भावार्थ

‘सुग्रीवने युवराजपदपर मेरा अभिषेक नहीं किया है। अनायास ही महान् कर्म करनेवाले महाराज श्रीरामने ही उस पदपर मेरा अभिषेक किया है ॥ १७½ ॥

स पूर्वं बद्धवैरो मां राजा दृष्ट्वा व्यतिक्रमम् ॥ १८ ॥ घातयिष्यति दण्डेन तीक्ष्णेन कृतनिश्चयः।

भावार्थ

‘राजा सुग्रीवने तो पहलेसे ही मेरे प्रति वैर बाँध रक्खा है। इस समय आज्ञा-लङ्घनरूप मेरे अपराधको देखकर पूर्वोक्त निश्चयके अनुसार तीखे दण्डद्वारा मुझे मरवा डालेंगे ॥ १८½ ॥

किं मे सुहृद्भिर्व्यसनं पश्यद्भिर्जीवितान्तरे। इहैव प्रायमासिष्ये पुण्ये सागररोधसि ॥ १९ ॥

भावार्थ

‘जीवन-कालमें मेरा व्यसन ( राजाके हाथसे मेरा मरण ) देखनेवाले सुहृदोंसे मुझे क्या काम है ? यहीं समुद्रके पावन तटपर मैं मरणान्त उपवास करूँगा’ ॥ १९ ॥

एतच्छ्रुत्वा कुमारेण युवराजेन भाषितम्। सर्वे ते वानरश्रेष्ठाः करुणं वाक्यमब्रुवन् ॥ २० ॥

भावार्थ

युवराज वालिकुमार अङ्गदकी यह बात सुनकर वे सभी श्रेष्ठ वानर करुणस्वरमें बोले—॥ २० ॥

तीक्ष्णः प्रकृत्या सुग्रीवः प्रियारक्तश्च राघवः। समीक्ष्याकृतकार्यांस्तु तस्मिंश्च समये गते ॥ २१ ॥ अद्यार्यां च वैदेहीं दृष्ट्वा चैव समागतान्। राघवप्रियकामाय घातयिष्यत्यसंशयम् ॥ २२ ॥

भावार्थ

‘सचमुच सुग्रीवका स्वभाव बड़ा कठोर है। उधर भी-रामचन्द्रजी अपनी प्रिय पत्नी सीताके प्रति अनुरक्त हैं। सीताको खोजकर लौटनेके लिये जो अवधि निश्चित की गयी थी, वह समय व्यतीत हो जानेपर भी यदि हम कार्य किये बिना ही वहाँ उपस्थित होंगे तो उस अवस्थामें हमें देखकर और विदेहकुमारीका दर्शन किये बिना ही हमें लौटा हुआ जानकर श्रीरामचन्द्रजीका प्रिय करनेकी इच्छासे सुग्रीव हमें मरवा डालेंगे, इसमें संशय नहीं है ॥ २१-२२ ॥

न क्षमं चापराद्धानां गमनं स्वामिपार्श्वतः। प्रधानभूताश्च वयं सुग्रीवस्य समागताः ॥ २३ ॥

भावार्थ

‘अतः अपराधी पुरुषोंका स्वामीके पास लौटकर जाना कदापि उचित नहीं है । हम सुग्रीवके प्रधान सहयोगी या सेवक होनेके कारण इधर उनके भेजनेसे आये थे ॥ २३ ॥

इहैव सीतामन्वीक्ष्य प्रवृत्तिमुपलभ्य वा। नो चेद् गच्छाम तं वीरं गमिष्यामो यमक्षयम् ॥ २४ ॥

भावार्थ

‘यदि यहीं सीताका दर्शन करके अथवा उनका समाचार जानकर वीर सुग्रीवके पास नहीं जायँगे तो अवश्य ही हमें यमलोकमें जाना पड़ेगा’ ॥ २४ ॥

प्लवङ्गमानां तु भयार्दितानां श्रुत्वा वचस्तार इदं बभाषे। अलं विषादेन बिलं प्रविश्य वसाम सर्वे यदि रोचते वः ॥ २५ ॥

भावार्थ

भयसे पीड़ित हुए उन वानरोंका यह वचन सुनकर तारने कहा—‘यहाँ बैठकर विषाद करनेसे कोई लाभ नहीं है। यदि आपलोगोंको ठीक जँचे तो हम सब लोग स्वयं-प्रभाकी उस गुफामें ही प्रवेश करके निवास करें ॥ २५ ॥

इदं हि मायाविहितं सुदुर्गमं प्रभूतपुष्पोदकभोज्यपेयम् । इहास्ति नो नैव भयं पुरंदरा- न्न राघवाद् वानरराजतोऽपि वा ॥ २६ ॥

भावार्थ

‘यह गुफा मायासे निर्मित होनेके कारण अत्यन्त दुर्गम है। यहाँ फल-फूल, जल और खाने पीनेकी दूसरी वस्तुएँ भी प्रचुर मात्रामें उपलब्ध हैं । अतः उसमें हमें न तो देवराज इन्द्रसे, न श्रीरामचन्द्रजीसे और न वानरराज सुग्रीवसे ही भय है’ ॥ २६ ॥

श्रुत्वाङ्गदस्यापि वचोऽनुकूल- मूचुश्च सर्वे हरयः प्रतीताः। यथा न हन्येम तथा विधान- मसक्तमद्यैव विधीयतां नः ॥ २७ ॥

भावार्थ

तारकी कही हुई पूर्वोक्त बात, जो अङ्गदके भी अनुकूल थी, सुनकर सभी वानरोंको उसपर विश्वास हो गया । वे सब-के-सब बोल उठे—‘बन्धुओ ! हमें वैसा कार्य आज ही अविलम्ब करना चाहिये, जिससे हम मारे न जायँ’ ॥ २७ ॥

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