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किष्किन्धाकाण्ड, सर्ग 48

सह ताराङ्गदाभ्यां तु सहसा हनुमान् कपिः। सुग्रीवेण यथोद्दिष्टं गन्तुं देशं प्रचक्रमे ॥ १ ॥

भावार्थ

उधर तार और अङ्गदके साथ हनुमान्जी सहसा सुग्रीवके बताये हुए दक्षिण दिशाके देशोंकी ओर चले ॥ १ ॥

स तु दूरमुपागम्य सर्वैस्तैः कपिसत्तमैः। ततो विचित्य विन्ध्यस्य गुहाश्च गहनानि च ॥ २ ॥ पर्वताग्रनदीदुर्गान् सरांसि विपुलद्रुमान्। वृक्षखण्डांश्च विविधान् पर्वतान् वनपादपान् ॥ ३ ॥ अन्वेषमाणास्ते सर्वे वानराः सर्वतोदिशम्। न सीतां ददृशुर्वीरा मैथिलीं जनकात्मजाम् ॥ ४ ॥

भावार्थ

उन सभी श्रेष्ठ वानरोंके साथ बहुत दूरका रास्ता तै करके वे विन्ध्याचलपर गये और वहाँकी गुफाओं, जंगलों, पर्वतशिखरों, नदियों, दुर्गम स्थानों, सरोवरों, बड़े-बड़े वृक्षों, झाड़ियों और भाँति-भाँतिके पर्वतों एवं वन्य वृक्षोंमें सब ओर ढूँढ़ते फिरे; परंतु वहाँ उन समस्त वीर वानरोंने मिथिलेशकुमारी जनकनन्दिनी सीताको कहीं नहीं देखा ॥२–४॥

ते भक्षयन्तो मूलानि फलानि विविधान्यपि। अन्वेषमाणा दुर्धर्षा न्यवसंस्तत्र तत्र ह ॥ ५ ॥

भावार्थ

वे सभी दुर्धर्ष वीर नाना प्रकारके फल-मूलका भोजन करते हुए सीताको खोजते और जहाँ-तहाँ ठहर जाया करते थे ॥ ५ ॥

स तु देशो दुरन्वेषो गुहागहनवान् महान्। निर्जलं निर्जनं शून्यं गहनं घोरदर्शनम् ॥ ६ ॥

भावार्थ

विन्ध्यपर्वतके आसपासका महान् देश बहुत-सी गुफाओं तथा घने जंगलोंसे भरा था । इससे वहाँ जानकीको ढूँढ़ने-में बड़ी कठिनाई होती थी । भयंकर दिखायी देनेवाले वहाँके सुनसान जंगलमें न तो पानी मिलता था और न कोई मनुष्य ही दिखायी देता था ॥ ६ ॥

ताद्दशान्यप्यरण्यानि विचित्य भृशपीडिताः । स देशश्च दुरन्वेष्यो गुहागहनवान् महान् ॥ ७ ॥

भावार्थ

वैसे जंगलोंमें भी खोज करते समय उन वानरोंको अत्यन्त कष्ट सहन करना पड़ा । वह विशाल प्रदेश अनेक गुहाओं और सघन वनोंसे व्याप्त था । अतः वहाँ अन्वेषणका कार्य बहुत कठिन प्रतीत होता था ॥ ७ ॥

त्यक्त्वा तु तं ततो देशं सर्वे वै हरियूथपाः । देशमन्यं दुराधर्षं विविशुश्चाकुतोभयाः ॥ ८ ॥

भावार्थ

तदनन्तर वे समस्त वानर-यूथपति उस देशको छोड़कर दूसरे प्रदेशमें घुसे, जहाँ जाना और भी कठिन था तो भी उन्हें वहीं किसीसे भय नहीं होता था ॥ ८ ॥

यत्र वन्ध्यफला वृक्षा विपुष्पाः पर्णवर्जिताः । निस्तोयाः सरितो यत्र मूलं यत्र सुदुर्लभम् ॥ ९ ॥

भावार्थ

वहाँके वृक्ष कभी फल नहीं देते थे । इनमें फूल भी नहीं लगते थे और उनकी डालियोंमें पत्ते भी नहीं थे । वहाँकी नदियोंमें पानीका नाम नहीं था । कन्द-मूल आदि तो वहाँ सर्वथा दुर्लभ थे ॥ ९ ॥

न सन्ति महिषा यत्र न मृगा न च हस्तिनः । शार्दूलाः पक्षिणो वापि ये चान्ये वनगोचराः ॥ १० ॥

भावार्थ

उस प्रदेशमें न भैंसे थे न हिरन और हाथी, न बाघ थे न पक्षी तथा वनमें विचरनेवाले अन्य प्राणियोंका भी वहाँ अभाव था ॥ १० ॥

न चात्र वृक्षा नौषध्यो न वल्ल्यो नापि वीरुधः । स्निग्धपत्राः स्थले यत्र पद्मिन्यः फुल्लपङ्कजाः ॥ ११ ॥ प्रेक्षणीयाः सुगन्धाश्च भ्रमरैश्च विवर्जिताः ।

भावार्थ

वहाँ न पेड़ थे न पौधे, न ओषधियाँ थीं न लता-बेलें । उस देशकी पोखरियोंमें चिकने पत्तों और खिले हुए फूलोंसे युक्त कमल भी नहीं थे । इसीलिये न तो वे देखने योग्य थीं, न उनमें सुगन्ध छा रही थी और न वहाँ भौंरे ही गुंजार करते थे ॥ ११½ ॥

कण्डुर्नाम महाभागः सत्यवादी तपोधनः ॥ १२ ॥ महर्षिः परमामर्षी नियमैर्दुष्प्रधर्षणः ।

भावार्थ

पहले वहाँ कण्डु नामसे प्रसिद्ध एक महाभाग सत्यवादी और तपस्याके धनी महर्षि रहते थे, जो बड़े अमर्षशील थे— अपने प्रति किये गये अपराधको सहन नहीं करते थे । शौच-संतोष आदि नियमोंका पालन करनेके कारण उन महर्षिको कोई तिरस्कृत या पराजित नहीं कर सकता था ॥ १२½ ॥

तस्य तस्मिन् वने पुत्रो बालको दशवार्षिकः ॥ १३ ॥ प्रणष्टो जीवितान्ताय क्रुद्धस्तेन महामुनिः ।

भावार्थ

उस वनमें उनका एक बालक पुत्र, जिसकी अवस्था दस वर्षकी थी, किसी कारणसे मर गया । इससे कुपित होकर वे महामुनि उस वनके जीवनका अन्त करनेके लिये उद्यत हो गये ॥ १३½ ॥

तेन धर्मात्मना शप्तं कृत्स्नं तत्र महद्वनम् ॥ १४ ॥ अशरण्यं दुराधर्षं मृगपक्षिविवर्जितम् ।

भावार्थ

उन धर्मात्मा महर्षिने उस समूचे विशाल वनको वहाँ शाप दे दिया, जिससे वह आश्रयहीन, दुर्गम तथा पशु-पक्षियोंसे शून्य हो गया ॥ १४½ ॥

तस्य ते काननान्तांस्तु गिरीणां कन्दराणि च ॥ १५ ॥ प्रभवाणि नदीनां च विचिन्वन्ति समाहिताः । तत्र चापि महात्मानो नापश्यञ्जनकात्मजाम् ॥ १६ ॥ हर्तारं रावणं वापि सुग्रीवप्रियकारिणः ।

भावार्थ

वहाँ सुग्रीवका प्रिय करनेवाले उन महामनस्वी वानरोंने उस वनके सभी प्रदेशों, पर्वतोंकी कन्दराओं तथा नदियोंके उद्गमस्थानोंमें एकाग्रचित्त होकर अनुसंधान किया; परंतु वहाँ भी उन्हें जनकनन्दिनी सीता अथवा उनका अपहरण करनेवाले रावणका कुछ पता नहीं चला ॥ १५-१६½ ॥

ते प्रविश्य तु तं भीमं लतागुल्मसमावृतम् ॥ १७ ॥ ददृशुर्भीमकर्माणमसुरं सुरनिर्भयम् ।

भावार्थ

तत्पश्चात् लताओं और झाड़ियोंसे व्याप्त हुए दूसरे किसी भयंकर वनमें प्रवेश करके उन हनुमान् आदि वानरोंने भयानक कर्म करनेवाले एक असुरको देखा, जिसे देवताओंसे कोई भय नहीं था ॥ १७½ ॥

तं दृष्ट्वा वानरा घोरं स्थितं शैलमिवासुरम् ॥ १८ ॥ गाढं परिहिताः सर्वे दृष्ट्वा तं पर्वतोपमम् ।

भावार्थ

उस घोर निशाचरको पहाड़के समान सामने खड़ा देख सभी वानरोंने अपने ढीले-ढाले वस्त्रोंको अच्छी तरह कस लिया और सब-के-सब उस पर्वताकार असुरसे भिड़नेको तैयार हो गये ॥ १८½ ॥

सोऽपि तान् वानरान् सर्वान् नष्टाःस्थेत्यब्रवीद् बली ॥ अभ्यधावत संक्रुद्धो मुष्टिमुद्यम्य संगतम् ।

भावार्थ

उधर वह बलवान् असुर भी उन सब वानरोंको देखकर बोला—‘अरे, आज तुम सभी मारे गये ।‘ इतना कहकर वह अत्यन्त कुपित हो बँधा हुआ मुक्का तानकर उनकी ओर दौड़ा ॥ १९½ ॥

तमापतन्तं सहसा वालिपुत्रोऽङ्गदस्तदा ॥ २० ॥ रावणोऽयमिति ज्ञात्वा तलेनाभिजघान ह ।

भावार्थ

उसे सहसा आक्रमण करते देख वालि-पुत्र अङ्गदने समझा कि यही रावण है; अतः उन्होंने आगे बढ़कर उसे एक तमाचा जड़ दिया ॥ २०½ ॥

स वालिपुत्राभिहतो वक्त्राच्छोणितमुद्वमन् ॥ २१ ॥ असुरो न्यपतद् भूमौ पर्यस्त इव पर्वतः । ते तु तस्मिन् निरुच्छ्वासे वानरा जितकाशिनः ॥ २२ ॥ व्यचिन्वन् प्रायशस्तत्र सर्वं ते गिरिगह्वरम् ।

भावार्थ

वालिपुत्रके मारनेपर वह असुर मुँहसे रक्त वमन करता हुआ फटकर गिरे हुए पहाड़की भाँति पृथ्वीपर जा पड़ा और उसके प्राणपखेरू उड़ गये । तत्पश्चात् विजयोल्लाससे सुशोभित होनेवाले वानर प्रायः वहाँकी सारी पर्वतीय गुफाओंमें अनुसंधान करने लगे ॥ २१-२२½ ॥

विचितं तु ततः सर्वे सर्वे ते काननौकसः ॥ २३ ॥ अन्यदेवापरं घोरं विविशुर्गिरिगह्वरम् ।

भावार्थ

जब वहाँके सारे प्रदेशमें खोज कर ली गयी, तब उन समस्त वनवासी वानरोंने किसी दूसरी पर्वतीय कन्दरामें प्रवेश किया; जो पहलेकी अपेक्षा भी भयानक थी ॥ २३½ ॥

ते विचित्य पुनः खिन्ना विनिष्पत्य समागताः । एकान्ते वृक्षमूले तु निषेदुर्दीनमानसाः ॥ २४ ॥

भावार्थ

उसमें भी ढूँढ़ते-ढूँढ़ते वे थक गये और निराश होकर निकल आये । फिर सब-के-सब एकान्त स्थानमें एक वृक्षके नीचे खिन्नचित्त होकर बैठ गये ॥ २४ ॥

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