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किष्किन्धाकाण्ड, सर्ग 46

गतेषु वानरेन्द्रेषु रामः सुग्रीवमब्रवीत् । कथं भवान् विजानीते सर्वं वै मण्डलं भुवः ॥ १ ॥

भावार्थ

उन समस्त वानरयूथपतियोंके चले जानेपर श्रीरामचन्द्रजीने सुग्रीवसे पूछा—‘सखे ! तुम समस्त भूमण्डलके स्थानोंका परिचय कैसे जानते हो ?’ ॥ १ ॥

सुग्रीवश्च ततो राममुवाच प्रणतात्मवान् । श्रूयतां सर्वमाख्यास्ये विस्तरेण वचो मम ॥ २ ॥

भावार्थ

तब सुग्रीवने विनीत होकर श्रीरामचन्द्रजीसे कहा— ‘भगवन् ! मैं सब कुछ विस्तारके साथ बता रहा हूँ । मेरी बातें सुनिये ॥ २ ॥

यदा तु दुन्दुभिं नाम दानवं महिषाकृतिम् । प्रतिकालयते वाली मलयं प्रति पर्वतम् ॥ ३ ॥ तदा विवेश महिषो मलयस्य गुहां प्रति । विवेश वाली तत्रापि मलयं तज्जिघांसया ॥ ४ ॥

भावार्थ

‘जब वाली महिषरूपधारी दानव दुन्दुभि* ( उसके पुत्र मायावी ) का पीछा कर रहे थे, उस समय वह महिष मलयपर्वतकी ओर भागा और उस पर्वतकी कन्दरामें घुस गया । यह देख वालीने उसके वधकी इच्छासे उस गुफाके भीतर भी प्रवेश किया ॥ ३-४ ॥

ततोऽहं तत्र निक्षिप्तो गुहाद्वारि विनीतवत् । न च निष्क्रामते वाली तदा संवत्सरे गते ॥ ५ ॥

भावार्थ

‘उस समय मैं विनीतभावसे उस गुफाके द्वारपर खड़ा रहा; क्योंकि वालीने मुझे वहीं रख छोड़ा था । परंतु एक वर्ष व्यतीत हो जानेपर भी वाली उसके भीतरसे नहीं निकले ॥ ५ ॥

ततः क्षतजवेगेन आपुपूरे तदा बिलम् । तदहं विस्मितो दृष्ट्वा भ्रातुः शोकविषार्दितः ॥ ६ ॥

भावार्थ

‘तदनन्तर वेगपूर्वक बहे हुए रक्तकी धारासे उस समय वह सारी गुफा भर गयी । यह देखकर मुझे बड़ा विस्मय हुआ तथा मैं भाईके शोकसे व्यथित हो उठा ॥ ६ ॥

अथाहं गतबुद्धिस्तु सुव्यक्तं निहतो गुरुः । शिला पर्वतसंकाशा बिलद्वारि मया कृता ॥ ७ ॥

भावार्थ

‘फिर मेरी बुद्धिमें यह बात आयी कि अब मेरे बड़े भाई निश्चय ही मारे गये । यह विचार पैदा होते ही मैंने उस गुफाके द्वारपर एक पहाड़-जैसी चट्टान रख दी ॥ ७ ॥

अशक्नुवन्निष्क्रमितुं महिषो विनशिष्यति । ततोऽहमागां किष्किन्धां निराशस्तस्य जीविते ॥ ८ ॥

भावार्थ

‘सोचा—इस शिलासे द्वार बंद हो जानेपर मायावी निकल नहीं सकेगा, भीतर ही घुट-घुटकर मर जायगा । इसके बाद भाईके जीवनसे निराश होकर मैं किष्किन्धापुरीमें लौट आया ॥ ८ ॥

राज्यं च सुमहत् प्राप्य तारां च रुमया सह । मित्रैश्च सहितस्तत्र वसामि विगतज्वरः ॥ ९ ॥

भावार्थ

‘यहाँ विशाल राज्य तथा रुमासहित ताराको पाकर मित्रोंके साथ मैं निश्चिन्ततापूर्वक रहने लगा ॥ ९ ॥

आजगाम ततो वाली हत्वा तं वानरर्षभः । ततोऽहमददां राज्यं गौरवाद् भययन्त्रितः ॥ १० ॥

भावार्थ

‘तत्पश्चात् वानरश्रेष्ठ वाली उस दानवका वध करके आ पहुँचे । उनके आते ही मैंने भाईके गौरवसे भयभीत हो वह राज्य उन्हें वापस कर दिया ॥ १० ॥

स मां जिघांसुर्दुष्टात्मा वाली प्रव्यथितेन्द्रियः । परिकालयते वाली धावन्तं सचिवैः सह ॥ ११ ॥

भावार्थ

‘परंतु दुष्टात्मा वाली मुझे मार डालना चाहता था, उसकी सारी इन्द्रियाँ यह सोचकर व्यथित हो उठी थीं कि ‘यह मुझे मारनेके लिये ही गुफाका द्वार बंद करके भाग आया था।’ मैं अपनी प्राण-रक्षाके लिये मन्त्रियोंके साथ भागा और वाली मेरा पीछा करने लगा ॥ ११ ॥

ततोऽहं वालिना तेन सोऽनुबद्धः प्रधावितः । नदीश्च विविधाः पश्यन् वनानि नगराणि च ॥ १२ ॥ आदर्शतलसंकाशा ततो वै पृथिवी मया । अलातचक्रप्रतिमा दृष्टा गोष्पदवत् कृता ॥ १३ ॥

भावार्थ

‘वाली मेरे पीछे लगा रहा और मैं जोर-जोरको भागता गया। उसी समय मैंने विभिन्न नदियों, वनों और नगरोंको देखते हुए सारी पृथ्वीको गायकी खुरीकी भाँति मानकर उसकी परिक्रमा कर डाली । भागते समय मुझे यह पृथ्वी दर्पण और अलातचक्रके समान दिखायी दी ॥ १२-१३ ॥

पूर्वां दिशं ततो गत्वा पश्यामि विविधान् द्रुमान् । पर्वतान् सदरीन् रम्यान् सरांसि विविधानि च ॥ १४ ॥

भावार्थ

‘तदनन्तर पूर्व दिशामें जाकर मैंने नाना प्रकारके वृक्ष, कन्दराओंसहित रमणीय पर्वत और भाँति-भाँतिके सरोवर देखे ॥ १४ ॥

उदयं तत्र पश्यामि पर्वतं धातुमण्डितम् । क्षीरोदं सागरं चैव नित्यमप्सरसालयम् ॥ १५ ॥

भावार्थ

‘वहीं नाना प्रकारके धातुओंसे मण्डित उदयाचल तथा अप्सराओंके नित्य-निवासस्थान क्षीरोद सागरका भी मैंने दर्शन किया ॥ १५ ॥

परिकाल्यमानस्तदा वालिनाभिद्रुतो ह्यहम् । पुनरावृत्य सहसा प्रस्थितोऽहं तदा विभो ॥ १६ ॥

भावार्थ

‘उस समय वाली पीछा करते रहे और मैं भागता रहा । प्रभो ! जब मैं यहाँ फिर लौटकर आया, तब वालीके डरसे पुनः सहसा मुझे भागना पड़ा ॥ १६ ॥

दिशस्तस्यास्ततो भूयः प्रस्थितो दक्षिणां दिशम् । विन्ध्यपादपसंकीर्णां चन्दनद्रुमशोभिताम् ॥ १७ ॥

भावार्थ

‘उस दिशाको छोड़कर मैं फिर दक्षिण दिशाकी ओर प्रस्थित हुआ, जहाँ विन्ध्यपर्वत और नाना प्रकारके वृक्ष भरे हुए हैं तथा चन्दनके वृक्ष जिसकी शोभा बढ़ाते हैं ॥१७॥

द्रुमशैलान्तरे पश्यन् भूयो दक्षिणतोऽपराम् । अपरां च दिशं प्राप्तो वालिना समभिद्रुतः ॥ १८ ॥

भावार्थ

‘वृक्षों और पर्वतोंकी ओटमें बारंबार वालीको देखकर मैंने दक्षिण दिशाको छोड़ दिया तथा वालीके खदेड़नेपर पश्चिम दिशाकी शरण ली ॥ १८ ॥

स पश्यन् विविधान् देशानस्तं च गिरिसत्तमम् । प्राप्य चास्तं गिरिश्रेष्ठमुत्तरं सम्प्रधावितः ॥ १९ ॥

भावार्थ

‘वहाँ नाना प्रकारके देशोंको देखता हुआ मैं गिरिश्रेष्ठ अस्ताचलतक जा पहुँचा । वहाँ पहुँचकर मैं पुनः उत्तर दिशाकी ओर भागा ॥ १९ ॥

हिमवन्तं च मेरुं च समुद्रं च तथोत्तरम् । यदा न विन्दे शरणं वालिना समभिद्रुतः ॥ २० ॥ ततो मां बुद्धिसम्पन्नो हनुमान् वाक्यमब्रवीत् ।

भावार्थ

‘हिमालय, मेरु और उत्तर समुद्रतक पहुँचकर भी जब वालीके पीछा करनेके कारण मुझे कहीं शरण नहीं मिली, तब परमबुद्धिमान् हनुमानजीने मुझसे यह बात कही—॥२०½॥

इदानीं मे स्मृतं राजन् यथा वाली हरीश्वरः ॥ २१ ॥ मतङ्गेन तदा शप्तो ह्यस्मिन्नाश्रममण्डले । प्रविशेद् यदि वै वाली मूर्धास्य शतधा भवेत् ॥ २२ ॥

भावार्थ

‘‘राजन् ! इस समय मुझे उस घटनाका स्मरण हो आया है, जैसा कि मतङ्गमुनिने उन दिनों वानरराज वालीको शाप दिया था कि ‘यदि वाली इस आश्रममण्डलमें प्रवेश करेगा तो उसके मस्तकके सैकड़ों टुकड़े हो जायँगे’ ॥ २१-२२ ॥

तत्र वासः सुखोऽस्माकं निरुद्विग्नो भविष्यति । ततः पर्वतमासाद्य ऋष्यमूकं नृपात्मज ॥ २३ ॥ न विवेश तदा वाली मतङ्गस्य भयात् तदा ।

भावार्थ

‘‘अतः वहीं निवास करना हमलोगोंके लिये सुखद और निर्भय होगा ।’ राजकुमार ! इस निश्चयके अनुसार हमलोग ऋष्यमूक पर्वतपर आकर रहने लगे । उस समय मतङ्ग ऋषिके भयसे वालीने वहाँ प्रवेश नहीं किया ॥ २३½ ॥

एवं मया तदा राजन् प्रत्यक्षमुपलक्षितम् । पृथिवीमण्डलं सर्वं गुहामस्म्यागतस्ततः ॥ २४ ॥

भावार्थ

‘राजन् ! इस प्रकार मैंने उन दिनों समस्त भूमण्डलको प्रत्यक्ष देखा था । उसके बाद ऋष्यमूककी गुफामें आया था’ ॥ २४ ॥

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