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किष्किन्धाकाण्ड, सर्ग 4

ततः प्रहृष्टो हनुमान् कृत्यवानिति तद्वचः । श्रुत्वा मधुरभावं च सुग्रीवं मनसा गतः ॥ १ ॥

भावार्थ

श्रीरामजीकी बात सुनकर तथा सुग्रीवके विषयमें उनका सौम्यभाव जानकर और साथ ही यह समझकर कि इन्हें भी सुग्रीवसे कोई आवश्यक काम है, हनुमान्जीको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने मन-ही-मन सुग्रीवका स्मरण किया ॥१॥

भाव्यो राज्यागमस्तस्य सुग्रीवस्य महात्मनः । यदयं कृत्यवान् प्राप्तः कृत्यं चैतदुपागतम् ॥ २ ॥

भावार्थ

‘अब अवश्य ही महामना सुग्रीवको राज्यकी प्राप्ति होनेवाली है; क्योंकि ये महानुभाव किसी कार्य या प्रयोजनसे यहाँ आये हैं और यह कार्य सुग्रीवके ही द्वारा सिद्ध होनेवाला है’ ॥ २ ॥

ततः परमसंहृष्टो हनूमान् प्लवगोत्तमः । प्रत्युवाच ततो वाक्यं रामं वाक्यविशारदः ॥ ३ ॥

भावार्थ

तत्पश्चात् बातचीतमें कुशल वानरश्रेष्ठ हनुमान्जी अत्यन्त हर्षमें भरकर श्रीरामचन्द्रजीसे बोले—॥ ३ ॥

किमर्थं त्वं वनं घोरं पम्पाकाननमण्डितम् । आगतः सानुजो दुर्गं नानाव्यालमृगायुतम् ॥ ४ ॥

भावार्थ

‘पम्पा-तटवर्ती काननसे सुशोभित यह वन भयंकर और दुर्गम है। इसमें नाना प्रकारके हिंसक जन्तु निवास करते हैं। आप अपने छोटे भाईके साथ यहाँ किसलिये आये हैं ?’ ॥४॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा लक्ष्मणो रामचोदितः । आचचक्षे महात्मानं रामं दशरथात्मजम् ॥ ५ ॥

भावार्थ

हनुमान्जीका यह वचन सुनकर श्रीरामकी आज्ञासे लक्ष्मणने दशरथनन्दन महात्मा श्रीरामका इस प्रकार परिचय देना आरम्भ किया—॥ ५ ॥

राजा दशरथो नाम द्युतिमान् धर्मवत्सलः । चातुर्वर्ण्यं स्वधर्मेण नित्यमेवाभिपालयन् ॥ ६ ॥

भावार्थ

‘विद्वन् ! इस पृथ्वीपर दशरथ नामसे प्रसिद्ध जो धर्मानुरागी तेजस्वी राजा थे, वे सदा ही अपने धर्मके अनुसार चारों वर्णोंकी प्रजाका पालन करते थे ॥ ६ ॥

न द्वेष्टा विद्यते तस्य स तु द्वेष्टि न कंचन । स तु सर्वेषु भूतेषु पितामह इवापरः ॥ ७ ॥

भावार्थ

‘इस भूतलपर उनसे द्वेष रखनेवाला कोई नहीं था और वे भी किसीसे द्वेष नहीं रखते थे । वे समस्त प्राणियोंपर दूसरे ब्रह्माजीके समान स्नेह रखते थे ॥ ७ ॥

अग्निष्टोमादिभिर्यज्ञैरिष्टवानाप्तदक्षिणैः । तस्यायं पूर्वजः पुत्रो रामो नाम जनैः श्रुतः ॥ ८ ॥

भावार्थ

‘उन्होंने पर्याप्त दक्षिणावाले अग्निष्टोम आदि यज्ञोंका अनुष्ठान किया था । ये उन्हीं महाराजके ज्येष्ठ पुत्र हैं । लोग इन्हें श्रीराम कहते हैं ॥ ८ ॥

शरण्यः सर्वभूतानां पितुर्निर्देशपारगः । ज्येष्ठो दशरथस्यायं पुत्राणां गुणवत्तरः ॥ ९ ॥

भावार्थ

‘ये सब प्राणियोंको शरण देनेवाले और पिताकी आज्ञाका पालन करनेवाले हैं। महाराज दशरथके चारों पुत्रोंमें ये सबसे अधिक गुणवान् हैं ॥ ९ ॥

राजलक्षणसंयुक्तः संयुक्तो राज्यसम्पदा । राज्याद् भ्रष्टो मया वस्तुं वने सार्धमिहागतः ॥ १० ॥

भावार्थ

‘ये राजाके उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न हैं । जब इन्हें राज्य-सम्पत्तिसे संयुक्त किया जा रहा था, उस समय कुछ ऐसा कारण आ पड़ा, जिससे ये राज्यसे वञ्चित हो गये और वनमें निवास करनेके लिये मेरे साथ यहाँ आ गये ॥ १० ॥

भार्यया च महाभाग सीतयानुगतो वशी । दिनक्षये महातेजाः प्रभयेव दिवाकरः ॥ ११ ॥

भावार्थ

‘महाभाग ! जैसे दिनका क्षय होनेपर सायकाल महातेजस्वी सूर्य अपने प्रभाके साथ अस्ताचलको जाते हैं, उसी प्रकार ये जितेन्द्रिय श्रीरघुनाथजी अपनी पत्नी सीताके साथ वनमें आये थे ॥ ११ ॥

अहमस्यावरो भ्राता गुणैर्दास्यमुपागतः । कृतज्ञस्य बहुज्ञस्य लक्ष्मणो नाम नामतः ॥ १२ ॥

भावार्थ

‘मैं इनका छोटा भाई हूँ । मेरा नाम लक्ष्मण है । मैं अपने कृतज्ञ और बहुज्ञ भाईके गुणोंसे आकृष्ट होकर इनका दास हो गया हूँ ॥ १२ ॥

सुखार्हस्य महार्हस्य सर्वभूतहितात्मनः । ऐश्वर्येण विहीनस्य वनवासे रतस्य च ॥ १३ ॥ रक्षसापहृता भार्या रहिते कामरूपिणा । तच्च न ज्ञायते रक्षः पत्नी येनास्य वा हृता ॥ १४ ॥

भावार्थ

‘सम्पूर्ण भूतोंके हितमें मन लगानेवाले, सुख भोगनेके योग्य, महापुरुषोंद्वारा पूजनीय, ऐश्वर्यसे हीन तथा वनवासमें तत्पर मेरे भाईकी पत्नीको इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले एक राक्षसने सूने आश्रमसे हर लिया । जिसने इनकी पत्नीका हरण किया है, वह राक्षस कौन है और कहाँ रहता है ? इत्यादि बातोंका ठीक-ठीक पता नहीं लग रहा है ॥१३-१४॥

दनुर्नाम दितेः पुत्रः शापाद् राक्षसतां गतः । आख्यातस्तेन सुग्रीवः समर्थो वानराधिपः ॥ १५ ॥ स ज्ञास्यति महावीर्यस्तव भार्यापहारिणम् । एवमुक्त्वा दनुः स्वर्गं भ्राजमानो दिवं गतः ॥ १६ ॥

भावार्थ

‘दनु नामक एक दैत्य था, जो शापसे राक्षसभावको प्राप्त हुआ था । उसने सुग्रीवका नाम बताया और कहा— ‘वानरराज सुग्रीव सामर्थ्यशाली और महान् पराक्रमी हैं । वे आपकी पत्नीका अपहरण करनेवाले राक्षसका पता लगा देंगे ।’ ऐसा कहकर तेजसे प्रकाशित होता हुआ दनु स्वर्गलोकमें पहुँचनेके लिये आकाशमें उड़ गया ॥ १५-१६ ॥

एतत् ते सर्वमाख्यातं याथातथ्येन पृच्छतः । अहं चैव च रामश्च सुग्रीवं शरणं गतौ ॥ १७ ॥ एष दत्त्वा च वित्तानि प्राप्य चानुत्तमं यशः । लोकनाथः पुरा भूत्वा सुग्रीवं नाथमिच्छति ॥ १८ ॥

भावार्थ

‘आपके प्रश्नके अनुसार मैंने सब बातें ठीक-ठीक बता दीं । मैं और श्रीराम दोनों ही सुग्रीवकी शरणमें आये हैं ॥ ‘ये पहले बहुत-से धन-वैभवका दान करके परम उत्तम यश प्राप्त कर चुके हैं । जो पूर्वकालमें सम्पूर्ण जगत्के नाथ ( संरक्षक ) थे, वे आज सुग्रीवको अपना रक्षक बनाना चाहते हैं ॥ १८ ॥

सीता यस्य स्नुषा चासीच्छरण्यो धर्मवत्सलः । तस्य पुत्रः शरण्यश्च सुग्रीवं शरणं गतः ॥ १९ ॥

भावार्थ

‘सीता जिनकी पुत्रवधू है, जो शरणागतपालक और धर्मवत्सल रहे हैं, उन्हीं महाराज दशरथके पुत्र शरणदाता श्रीराम आज सुग्रीवकी शरणमें आये हैं ॥ १९ ॥

सर्वलोकस्य धर्मात्मा शरण्यः शरणं पुरा । गुरुमें राघवः सोऽयं सुग्रीवं शरणं गतः ॥ २० ॥

भावार्थ

‘जो मेरे धर्मात्मा बड़े भाई श्रीरघुनाथजी पहले सम्पूर्ण जगत्को शरण देनेवाले तथा शरणागतवत्सल रहे हैं, वे इस समय सुग्रीवकी शरणमें आये हैं ॥ २० ॥

यस्य प्रसादे सततं प्रसीदेयुरिमाः प्रजाः । स रामो वानरेन्द्रस्य प्रसादमभिकाङ्क्षते ॥ २१ ॥

भावार्थ

‘जिनके प्रसन्न होनेपर सदा यह सारी प्रजा प्रसन्नतासे खिल उठती थी, वे ही श्रीराम आज वानरराज सुग्रीवकी प्रसन्नता चाहते हैं ॥ २१ ॥

येन सर्वगुणोपेताः पृथिव्यां सर्वपार्थिवाः । मानिताः सततं राज्ञा सदा दशरथेन वै ॥ २२ ॥ तस्यायं पूर्वजः पुत्रस्त्रिषु लोकेषु विश्रुतः । सुग्रीवं वानरेन्द्रं तु रामः शरणमागतः ॥ २३ ॥

भावार्थ

‘जिन राजा दशरथने सदा अपने यहाँ आये हुए भूमण्डलके सर्वसद्गुणसम्पन्न समस्त राजाओंका निरन्तर सम्मान किया, उन्हींके ये त्रिभुवनविख्यात ज्येष्ठ पुत्र श्रीराम आज वानरराज सुग्रीवकी शरणमें आये हैं ॥ २२-२३ ॥

शोकाभिभूते रामे तु शोकार्ते शरणं गते । कर्तुमर्हति सुग्रीवः प्रसादं सह यूथपैः ॥ २४ ॥ एवं ब्रुवाणं सौमित्रिं करुणं साश्रुपातनम् । हनूमान् प्रत्युवाचेदं वाक्यं वाक्यविशारदः ॥ २५ ॥

भावार्थ

‘श्रीराम शोकसे अभिभूत और आर्त होकर शरणमें आये हैं । यूथपतियोंसहित सुग्रीवको इनपर कृपा करनी चाहिये’ ॥ नेत्रोंसे आँसू बहाकर करुणाजनक स्वरमें ऐसी बातें कहते हुए सुमित्राकुमार लक्ष्मणसे कुशल वक्ता हनुमान्जीने इस प्रकार कहा—॥ २५ ॥

ईदृशा बुद्धिसम्पन्ना जितक्रोधा जितेन्द्रियाः । द्रष्टव्या वानरेन्द्रेण दिष्ट्या दर्शनमागताः ॥ २६ ॥ स हि राज्याच्च विभ्रष्टः कृतवैरश्च वालिना । हृतदारो वने त्रस्तो भ्रात्रा विनिकृतो भृशम् ॥ २७ ॥

भावार्थ

‘राजकुमारो ! वानरराज सुग्रीवको आप-जैसे बुद्धिमान्, क्रोधविजयी और जितेन्द्रिय पुरुषोंसे मिलनेकी आवश्यकता थी । सौभाग्यकी बात है कि आपने स्वयं ही दर्शन दे दिया ॥ ‘वे भी राज्यसे भ्रष्ट हैं। वालीके साथ उनकी शत्रुता हो गयी है । उनकी स्त्रीका भी वालीने ही अपहरण कर लिया है तथा उस दुष्ट भाईने उन्हें घरसे निकाल दिया है, इसलिये वे अत्यन्त भयभीत होकर वनमें निवास करते हैं ॥ २७ ॥

करिष्यति स साहाय्यं युवयोर्भास्करात्मजः । सुग्रीवः सह चास्माभिः सीतायाः परिमार्गणे ॥ २८ ॥

भावार्थ

‘सूर्यनन्दन सुग्रीव सीताका पता लगानेमें हमारे साथ स्वयं रहकर आप दोनोंकी पूर्ण सहायता करेंगे’ ॥ २८ ॥

इत्येवमुक्त्वा हनुमाञ्श्लक्ष्णं मधुरया गिरा । बभाषे साधु गच्छामः सुग्रीवमिति राघवम् ॥ २९ ॥

भावार्थ

ऐसा कहकर हनुमान्जीने श्रीरघुनाथजीसे स्निग्ध मधुर वाणीमें कहा—‘अच्छा, अब हमलोग सुग्रीवके पास चलें’ ॥२९॥

एवं ब्रुवन्तं धर्मात्मा हनूमन्तं स लक्ष्मणः । प्रतिपूज्य यथान्यायमिदं प्रोवाच राघवम् ॥ ३० ॥

भावार्थ

उस समय धर्मात्मा लक्ष्मणने उपर्युक्त बात कहनेवाले हनुमान्जीका यथोचित सम्मान किया और श्रीरामचन्द्रजीसे कहा—॥ ३० ॥

कपिः कथयते हृष्टो यथायं मारुतात्मजः । कृत्यवान् सोऽपि सम्प्राप्तः कृतकृत्योऽसि राघव ॥ ३१ ॥

भावार्थ

‘भैया रघुनन्दन ! ये वानरश्रेष्ठ पवनकुमार हनुमान् अत्यन्त हर्षसे भरकर जैसी बात कह रहे हैं, उससे जान पड़ता है कि सुग्रीवको भी आपसे कुछ काम है । ऐसी दशामें आप अपना कार्य सिद्ध हुआ ही समझें ॥ ३१ ॥

प्रसन्नमुखवर्णश्च व्यक्तं हृष्टश्च भाषते । नानृतं वक्ष्यते वीरो हनूमान् मारुतात्मजः ॥ ३२ ॥ ततः स सुमहाप्राज्ञो हनूमान् मारुतात्मजः । जगामादाय तौ वीरौ हरिराजाय राघवौ ॥ ३३ ॥

भावार्थ

‘इनके मुखकी कान्ति स्पष्टतः प्रसन्न दिखायी देती है और ये हर्षसे उत्फुल्ल होकर बातचीत करते हैं । अतः मेरा विश्वास है कि पवनपुत्र वीर हनुमान्जी झूठ नहीं बोलेंगे’ ॥ तदनन्तर परम बुद्धिमान् पवनपुत्र हनुमान्जी उन दोनों रघुवंशी वीरोंको साथ ले सुग्रीवसे मिलनेके लिये चले ॥३३॥

भिक्षुरूपं परित्यज्य वानरं रूपमास्थितः । पृष्ठमारोप्य तौ वीरौ जगाम कपिकुञ्जरः ॥ ३४ ॥

भावार्थ

कपिवर हनुमान्ने भिक्षुरूपको त्यागकर वानररूप धारण कर लिया । वे उन दोनों वीरोंको पीठपर बिठाकर वहाँसे चल दिये ॥ ३४ ॥

स तु विपुलयशाः कपिप्रवीरः पवनसुतः कृतकृत्यवत् प्रहृष्टः । गिरिवरमुरुविक्रमः प्रयातः स शुभमतिः सह रामलक्ष्मणाभ्याम् ॥ ३५॥

भावार्थ

महान् यशस्वी तथा शुभ विचारवाले महापराक्रमी वे कपिवीर पवनकुमार कृतकृत्य-से होकर अत्यन्त हर्षमें भर गये और श्रीराम-लक्ष्मणके साथ गिरिवर ऋष्यमूकपर जा पहुँचे ॥ ३५ ॥

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