Ramayana.com

किष्किन्धाकाण्ड, सर्ग 2

तौ तु दृष्ट्वा महात्मानौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ । वरायुधधरौ वीरौ सुग्रीवः शङ्कितोऽभवत् ॥ १ ॥

भावार्थ

महात्मा श्रीराम और लक्ष्मण दोनों भाइयोंको श्रेष्ठ आयुध धारण किये वीर वेशमें आते देख ( ऋष्यमूक पर्वतपर बैठे हुए ) सुग्रीवके मनमें बड़ी शङ्का हुई ॥ १ ॥

उद्विग्नहृदयः सर्वा दिशः समवलोकयन् । न व्यतिष्ठत कस्मिंश्चिद् देशे वानरपुंगवः ॥ २ ॥

भावार्थ

वे उद्विग्नचित्त होकर चारों दिशाओंकी ओर देखने लगे । उस समय वानरशिरोमणि सुग्रीव किसी एक स्थानपर स्थिर न रह सके ॥ २ ॥

नैव चक्रे मनः स्थातुं वीक्षमाणौ महाबलौ । कपेः परमभीतस्य चित्तं व्यवससाद ह ॥ ३ ॥

भावार्थ

महाबली श्रीराम और लक्ष्मणको देखते हुए सुग्रीव अपने मनको स्थिर न रख सके । उस समय अत्यन्त भयभीत हुए उन वानरराजका चित्त बहुत दुखी हो गया ॥ ३ ॥

चिन्तयित्वा स धर्मात्मा विमृश्य गुरुलाघवम् । सुग्रीवः परमोद्विग्नः सर्वैस्तैर्वानरैः सह ॥ ४ ॥

भावार्थ

सुग्रीव धर्मात्मा थे—उन्हें राजधर्मका ज्ञान था । उन्होंने मन्त्रियोंके साथ विचारकर अपनी दुर्बलता और शत्रुपक्षकी प्रबलताका निश्चय किया । तत्पश्चात् वे समस्त वानरोंके साथ अत्यन्त उद्विग्न हो उठे ॥ ४ ॥

ततः स सचिवेभ्यस्तु सुग्रीवः प्लवगाधिपः । शशंस परमोद्विग्नः पश्यंस्तौ रामलक्ष्मणौ ॥ ५ ॥

भावार्थ

वानरराज सुग्रीवके हृदयमें बड़ा उद्वेग हो गया था । वे श्रीराम और लक्ष्मणकी ओर देखते हुए अपने मन्त्रियोंसे इस प्रकार बोले—॥ ५ ॥

एतौ वनमिदं दुर्गं वालिप्रणिहितौ ध्रुवम् । छद्मना चीरवसनौ प्रचरन्ताविहागतौ ॥ ६ ॥ ततः सुग्रीवसचिवा दृष्ट्वा परमधन्विनौ । जग्मुर्गिरितटात् तस्मादन्यच्छिखरमुत्तमम् ॥ ७ ॥

भावार्थ

‘निश्चय ही ये दोनों वीर वालीके भेजे हुए ही इस दुर्गम वनमें विचरते हुए यहाँ आये हैं । इन्होंने छलसे चीर वस्त्र धारण कर लिये हैं, जिससे हम इन्हें पहचान न सकें’ ॥ उधर सुग्रीवके सहायक दूसरे-दूसरे वानरोंने जब उन महाधनुर्धर श्रीराम और लक्ष्मणको देखा, तब वे उस पर्वत-तटसे भागकर दूसरे उत्तम शिखरपर जा पहुँचे ॥ ७ ॥

ते क्षिप्रमभिगम्याथ यूथपा यूथपर्षभम् । हरयो वानरश्रेष्ठं परिवार्योपतस्थिरे ॥ ८ ॥

भावार्थ

वे यूथपति वानर शीघ्रतापूर्वक जाकर यूथपतियोंके सरदार वानरशिरोमणि सुग्रीवको चारों ओरसे घेरकर उनके पास खड़े हो गये ॥ ८ ॥

प्लवमाना गिरेर्गिरिम् । एवमेकायनगताः प्रकम्पयन्तो वेगेन गिरीणां शिखराणि च ॥ ९ ॥ ततः शाखामृगाः सर्वे प्लवमाना महाबलाः । बभञ्जुश्च नगांस्तत्र पुष्पितान् दुर्गमाश्रितान् ॥ १० ॥

भावार्थ

इस तरह एक पर्वतसे दूसरे पर्वतपर उछलते-कूदते और अपने वेगसे उन पर्वत-शिखरोंको प्रकम्पित करते हुए वे समस्त महाबली वानर एक मार्गपर आ गये । उन सबने उछल-कूदकर उस समय वहाँ दुर्गम स्थानोंमें स्थित हुए पुष्पशोभित बहुसंख्यक वृक्षोंको तोड़ डाला था ॥९-१०॥

आप्लवन्तो हरिवराः सर्वतस्तं महागिरिम् । मृगमार्जारशार्दूलांस्त्रासयन्तो ययुस्तदा ॥ ११ ॥

भावार्थ

उस बेलामें चारों ओरसे उस महान् पर्वतपर उछलकर आते हुए वे श्रेष्ठ वानर वहाँ रहनेवाले मृगों, बिलावों तथा व्याघ्रोंको भयभीत करते हुए जा रहे थे ॥ ११ ॥

ततः सुग्रीवसचिवाः पर्वतेन्द्रे समाहिताः । संगम्य कपिमुख्येन सर्वे प्राञ्जलयः स्थिताः ॥ १२ ॥

भावार्थ

इस प्रकार सुग्रीवके सभी सचिव पर्वतराज ऋष्यमूकपर आ पहुँचे और एकाग्रचित्त हो उन वानरराजसे मिलकर उनके सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गये ॥ १२ ॥

ततस्तु भयसंत्रस्तं वालिकिल्बिषशङ्कितम् । उवाच हनुमान् वाक्यं सुग्रीवं वाक्यकोविदः ॥ १३ ॥

भावार्थ

तदनन्तर वालीसे बुराईकी आशङ्का करके सुग्रीवको भयभीत देख बातचीत करनेमें कुशल हनुमान्जी बोले–॥१३॥

सम्भ्रमस्त्यज्यतामेष सर्वैर्वालिकृते महान् । मलयोऽयं गिरिवरो भयं नेहास्ति वालिनः ॥ १४ ॥

भावार्थ

‘आप सब लोग वालीके कारण होनेवाली इस भारी घबराहटको छोड़ दीजिये । यह मलयनामक श्रेष्ठ पर्वत है । यहाँ वालीसे कोई भय नहीं है ॥ १४ ॥

यस्मादुद्विग्नचेतास्त्वं विद्रुतो हरिपुङ्गव । तं क्रूरदर्शनं क्रूरं नेह पश्यामि वालिनम् ॥ १५ ॥

भावार्थ

‘वानरशिरोमणे ! जिससे उद्विग्नचित्त होकर आप भागे हैं, उस क्रूर दिखायी देनेवाले निर्दय वालीको मैं यहाँ नहीं देखता हूँ ॥ १५ ॥

यस्मात् तव भयं सौम्य पूर्वजात् पापकर्मणः । स नेह वाली दुष्टात्मा न ते पश्याम्यहं भयम् ॥ १६ ॥ अहो शाखामृगत्वं ते व्यक्तमेव प्लवङ्गम । लघुचित्ततयाऽऽत्मानं न स्थापयसि यो मतौ ॥ १७ ॥

भावार्थ

‘सौम्य ! आपको अपने जिस पापाचारी बड़े भाईसे भय प्राप्त हुआ है, वह दुष्टात्मा वाली यहाँ नहीं आ सकता; अतः मुझे आपके भयका कोई कारण नहीं दिखायी देता ॥ ‘आश्चर्य है कि इस समय आपने अपनी वानरोचित चपलताको ही प्रकट किया है । वानरप्रवर ! आपका चित्त चञ्चल है । इसलिये आप अपनेको विचार-मार्गपर स्थिर नहीं रख पाते हैं ॥ १७ ॥

बुद्धिविज्ञानसम्पन्न इङ्गितैः सर्वमाचर । नह्यबुद्धि गतो राजा सर्वभूतानि शास्ति हि ॥ १८ ॥

भावार्थ

‘बुद्धि और विज्ञानसे सम्पन्न होकर आप दूसरोंकी चेष्टाओंके द्वारा उनका मनोभाव समझें और उसीके अनुसार सभी आवश्यक कार्य करें; क्योंकि जो राजा बुद्धि-बलका आश्रय नहीं लेता, वह सम्पूर्ण प्रजापर शासन नहीं कर सकता’ ॥ १८ ॥

सुग्रीवस्तु शुभं वाक्यं श्रुत्वा सर्वं हनूमतः । ततः शुभतरं वाक्यं हनूमन्तमुवाच ह ॥ १९ ॥

भावार्थ

हनुमान्जीके मुखसे निकले हुए इन सभी श्रेष्ठ वचनोंको सुनकर सुग्रीवने उनसे बहुत ही उत्तम बात कही—॥ १९ ॥

दीर्घबाहू विशालाक्षौ शरचापासिधारिणौ । कस्य न स्याद् भयं दृष्ट्वा ह्येतौ सुरसुतोपमौ ॥ २० ॥

भावार्थ

‘इन दोनों वीरोंकी भुजाएँ लंबी और नेत्र बड़े-बड़े हैं । ये धनुष, बाण और तलवार धारण किये देवकुमारोंके समान शोभा पा रहे हैं । इन दोनोंको देखकर किसके मनमें भयका संचार न होगा ॥ २० ॥

वालिप्रणिहितावेव शङ्केऽहं पुरुषोत्तमौ । राजानो बहुमित्राश्च विश्वासो नात्र हि क्षमः ॥ २१ ॥

भावार्थ

‘मेरे मनमें संदेह है कि ये दोनों श्रेष्ठ पुरुष वालीके ही भेजे हुए हैं; क्योंकि राजाओंके बहुत-से मित्र होते हैं । अतः उनपर विश्वास करना उचित नहीं है ॥ २१ ॥

अरयश्च मनुष्येण विज्ञेयाश्छद्मचारिणः । विश्वस्तानामविश्वस्ताश्छिद्रेषु प्रहरन्त्यपि ॥ २२ ॥

भावार्थ

‘प्राणीमात्रको छद्मवेषमें विचरनेवाले शत्रुओंको विशेषरूपसे पहचाननेकी चेष्टा करनी चाहिये; क्योंकि वे दूसरोंपर अपना विश्वास जमा लेते हैं, परंतु स्वयं किसीका विश्वास नहीं करते और अवसर पाते ही उन विश्वासी पुरुषोंपर ही प्रहार कर बैठते हैं ॥ २२ ॥

कृत्येषु वाली मेधावी राजानो बहुदर्शिनः । भवन्ति परहन्तारस्ते ज्ञेयाः प्राकृतैर्नरैः ॥ २३ ॥

भावार्थ

‘वाली इन सब कार्योंमें बड़ा कुशल है । राजालोग बहुदर्शी होते हैं—वञ्चनाके अनेक उपाय जानते हैं, इसीलिये शत्रुओंका विध्वंस कर डालते हैं । ऐसे शत्रुभूत राजाओंको प्राकृत वेशभूषावाले मनुष्यों ( गुप्तचरों ) द्वारा जाननेका प्रयत्न करना चाहिये ॥ २३ ॥

तौ त्वया प्राकृतेनैव गत्वा ज्ञेयौ प्लवंगम । इङ्गितानां प्रकारैश्च रूपव्याभाषणेन च ॥ २४ ॥

भावार्थ

‘अतः कपिश्रेष्ठ ! तुम भी एक साधारण पुरुषकी भाँति यहाँसे जाओ और उनकी चेष्टाओंसे, रूपसे तथा बातचीतके तौर-तरीकोंसे उन दोनोंका यथार्थ परिचय प्राप्त करो ॥२४॥

लक्षयस्व तयोर्भावं प्रहृष्टमनसौ यदि । विश्वासयन् प्रशंसाभिरिङ्गितैश्च पुनः पुनः ॥ २५ ॥

भावार्थ

‘उनके मनोभावोंको समझो । यदि वे प्रसन्नचित्त जान पड़ें तो बारंबार मेरी प्रशंसा करके तथा मेरे अभिप्रायको सूचित करनेवाली चेष्टाओंद्वारा मेरे प्रति उनका विश्वास उत्पन्न करो ॥ २५ ॥

ममैवाभिमुखं स्थित्वा पृच्छ त्वं हरिपुङ्गव । प्रयोजनं प्रवेशस्य वनस्यास्य धनुर्धरौ ॥ २६ ॥

भावार्थ

‘वानरशिरोमणे ! तुम मेरी ही ओर मुँह करके खड़ा होना और उन धनुर्धर वीरोंसे इस वनमें प्रवेश करनेका कारण पूछना ॥ २६ ॥

शुद्धात्मानौ यदि त्वेतौ जानीहि त्वं प्लवङ्गम । व्याभाषितैर्वा रूपैर्वा विज्ञेया दुष्टतानयोः ॥ २७ ॥ इत्येवं कपिराजेन संदिष्टो मारुतात्मजः । चकार गमने बुद्धिं यत्र तौ रामलक्ष्मणौ ॥ २८ ॥

भावार्थ

‘यदि उनका हृदय शुद्ध जान पड़े तो भी तरह-तरहकी बातों और आकृतिके द्वारा यह जाननेकी विशेष चेष्टा करनी चाहिये कि वे दोनों कोई दुर्भावना लेकर तो नहीं आये हैं’ ॥ वानरराज सुग्रीवके इस प्रकार आदेश देनेपर पवनकुमार हनुमान्जीने उस स्थानपर जानेका विचार किया, जहाँ श्रीराम और लक्ष्मण विद्यमान थे ॥ २८ ॥

तथेति सम्पूज्य वचस्तु तस्य कपेः सुभीतस्य दुरासदस्य । महानुभावो हनुमान् ययौ तदा स यत्र रामोऽतिबली सलक्ष्मणः ॥ २९ ॥

भावार्थ

अत्यन्त डरे हुए दुर्जय वानर सुग्रीवके उस वचनका आदर करके ‘बहुत अच्छा कहकर’ महानुभाव हनुमान्जी जहाँ अत्यन्त बलशाली श्रीराम और लक्ष्मण थे, उस स्थानके लिये तत्काल चल दिये ॥ २९ ॥

Ramayan appFree. No ads. Works offline.Install

गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें