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बालकाण्ड, सर्ग 9

एतच्छ्रुत्वा रहः सूतो राजानमिदमब्रवीत् । श्रूयतां तत् पुरावृत्तं पुराणे च मया श्रुतम् ॥ १ ॥

भावार्थ

पुत्रके लिये अश्वमेध यज्ञ करनेकी बात सुनकर सुमन्त्रने राजासे एकान्तमें कहा—‘‘महाराज ! एक पुराना इतिहास सुनिये । मैंने पुराणमें भी इसका वर्णन सुना है ॥ १ ॥

ऋत्विग्भिरुपदिष्टोऽयं पुरावृत्तो मया श्रुतः । सनत्कुमारो भगवान् पूर्वं कथितवान् कथाम् ॥ २ ॥ ऋषीणां संनिधौ राजंस्तव पुत्रागमं प्रति ।

भावार्थ

‘ऋत्विजोंने पुत्र-प्राप्तिके लिये इस अश्वमेधरूप उपायका उपदेश किया है; परंतु मैंने इतिहासके रूपमें कुछ विशेष बात सुनी है । राजन् ! पूर्वकालमें भगवान् सनत्कुमारने ऋषियोंके निकट एक कथा सुनायी थी । वह आपकी पुत्रप्राप्तिसे सम्बन्ध रखनेवाली है ॥ २½ ॥

काश्यपस्य च पुत्रोऽस्ति विभाण्डक इति श्रुतः ॥ ३ ॥ ऋष्यशृङ्ग इति ख्यातस्तस्य पुत्रो भविष्यति । स वने नित्यसंवृद्धो मुनिर्वनचरः सदा ॥ ४ ॥

भावार्थ

‘‘उन्होंने कहा था, मुनिवरो ! महर्षि काश्यपके विभाण्डक नामसे प्रसिद्ध एक पुत्र हैं । उनके भी एक पुत्र होगा, जिसकी लोगोंमें ऋष्यशृङ्ग नामसे प्रसिद्धि होगी । वे ऋष्यशृङ्ग मुनि सदा वनमें ही रहेंगे और वनमें ही सदा लालन-पालन पाकर वे बड़े होंगे ॥ ३-४ ॥

नान्यं जानाति विप्रेन्द्रो नित्यं पित्रनुवर्तनात् । द्वैविध्यं ब्रह्मचर्यस्य भविष्यति महात्मनः ॥ ५ ॥ लोकेषु प्रथितं राजन् विप्रैश्च कथितं सदा ।

भावार्थ

‘‘सदा पिताके ही साथ रहनेके कारण विप्रवर ऋष्यशृङ्ग दूसरे किसीको नहीं जानेंगे । राजन् ! लोकमें ब्रह्मचर्यके दो रूप विख्यात हैं और ब्राह्मणोंने सदा उन दोनों स्वरूपोंका वर्णन किया है । एक तो है दण्ड, मेखला आदि धारणरूप मुख्य ब्रह्मचर्य और दूसरा है ऋतुकालमें पत्नी-समागमरूप गौण ब्रह्मचर्य । उन महात्माके द्वारा उक्त दोनों प्रकारके ब्रह्मचर्योंका पालन होगा ॥ ५½ ॥

तस्यैवं वर्तमानस्य कालः समभिवर्तत ॥ ६ ॥ अग्निं शुश्रूषमाणस्य पितरं च यशस्विनम् ।

भावार्थ

‘‘इस प्रकार रहते हुए मुनिका समय अग्नि तथा यशस्वी पिताकी सेवामें ही व्यतीत होगा ॥ ६½ ॥

एतस्मिन्नेव काले तु रोमपादः प्रतापवान् ॥ ७ ॥ अङ्गेषु प्रथितो राजा भविष्यति महाबलः । तस्य व्यतिक्रमाद् राज्ञो भविष्यति सुदारुणा ॥ ८ ॥ अनावृष्टिः सुघोरा वै सर्वलोकभयावहा ।

भावार्थ

‘उसी समय अङ्गदेशमें रोमपाद नामक एक बड़े प्रतापी और बलवान् राजा होंगे; उनके द्वारा धर्मका उल्लङ्घन हो जानेके कारण उस देशमें घोर अनावृष्टि हो जायगी, जो सब लोगोंको अत्यन्त भयभीत कर देगी ॥ ७-८½ ॥

अनावृष्ट्यां तु वृत्तायां राजा दुःखसमन्वितः ॥ ९ ॥ ब्राह्मणाञ्छ्रुतसंवृद्धान् समानीय प्रवक्ष्यति । भवन्तेः श्रुतकर्माणो लोकचारित्रवेदिनः ॥ १० ॥ समादिशन्तु नियमं प्रायश्चित्तं यथा भवेत् ।

भावार्थ

‘‘वर्षा बंद हो जानेसे राजा रोमपादको भी बहुत दुःख होगा । वे शास्त्रज्ञानमें बढ़े-चढ़े ब्राह्मणोंको बुलाकर कहेंगे— ‘विप्रवरो ! आपलोग वेद-शास्त्रके अनुसार कर्म करनेवाले तथा लोगोंके आचार-विचारको जाननेवाले हैं; अतः कृपा करके मुझे ऐसा कोई नियम बताइये, जिससे मेरे पापका प्रायश्चित्त हो जाय’ ॥ ९-१०½ ॥

इत्युक्तास्ते ततो राज्ञा सर्वे ब्राह्मणसत्तमाः ॥ ११ ॥ वक्ष्यन्ति ते महीपालं ब्राह्मणा वेदपारगाः ।

भावार्थ

‘राजाके ऐसा कहनेपर वे वेदोंके पारङ्गत विद्वान्—सभी श्रेष्ठ ब्राह्मण उन्हें इस प्रकार सलाह देंगे—॥ ११½ ॥

विभाण्डकसुतं राजन् सर्वोपायैरिहानय ॥ १२ ॥ आनाय्य तु महीपाल ऋष्यशृङ्गं सुसत्कृतम् । विभाण्डकसुतं राजन् ब्राह्मणं वेदपारगम् । प्रयच्छ कन्यां शान्तां वै विधिना सुसमाहितः ॥ १३ ॥

भावार्थ

‘राजन् ! विभाण्डकके पुत्र ऋष्यशृङ्ग वेदोंके पारगामी विद्वान् हैं । भूपाल ! आप सभी उपायोंसे उन्हें यहाँ ले आइये । बुलाकर उनका भलीभाँति सत्कार कीजिये । फिर एकाग्रचित्त हो वैदिक विधिके अनुसार उनके साथ अपनी कन्या शान्ताका विवाह कर दीजिये’ ॥ १२-१३ ॥

तेषां तु वचनं श्रुत्वा राजा चिन्तां प्रपत्स्यते । केनोपायेन वै शक्यमिहानेतुं स वीर्यवान् ॥ १४ ॥

भावार्थ

उनकी बात सुनकर राजा इस चिन्तामें पड़ जायँगे कि किस उपायसे उन शक्तिशाली महर्षिको यहाँ लाया जा सकता है ॥ १४ ॥

ततो राजा विनिश्चित्य सह मन्त्रिभिरात्मवान् । पुरोहितममात्यांश्च प्रेषयिष्यति सत्कृतान् ॥ १५ ॥

भावार्थ

‘‘फिर वे मनस्वी नरेश मन्त्रियोंके साथ निश्चय करके अपने पुरोहित और मन्त्रियोंको सत्कारपूर्वक वहाँ भेजेंगे ॥१५॥

ते तु राज्ञो वचः श्रुत्वा व्यथिता विनताननाः । न गच्छेम ऋषेर्भीता अनुनेष्यन्ति तं नृपम् ॥ १६ ॥

भावार्थ

‘राजाकी बात सुनकर वे मन्त्री और पुरोहित मुँह लटकाकर दुखी हो यों कहने लगेंगे कि ‘हम महर्षिसे डरते हैं, इसलिये वहाँ नहीं जायँगे ।’ यों कहकर वे राजासे बड़ी अनुनय-विनय करेंगे ॥ १६ ॥

वक्ष्यन्ति चिन्तयित्वा ते तस्योपायांश्च तान् क्षमान् । आनेष्यामो वयं विप्रं न च दोषो भविष्यति ॥ १७ ॥

भावार्थ

‘‘इसके बाद सोच-विचारकर वे राजाको योग्य उपाय बतायेंगे और कहेंगे कि ‘हम उन ब्राह्मणकुमारको किसी उपायसे यहाँ ले आयेंगे । ऐसा करनेसे कोई दोष नहीं घटित होगा’ ॥ १७ ॥

एवमङ्गाधिपेनैव गणिकाभिर्ऋषेः सुतः । आनीतोऽवर्षयद् देवः शान्ता चास्मै प्रदीयते ॥ १८ ॥

भावार्थ

‘‘इस प्रकार वेश्याओंकी सहायतासे अङ्गराज मुनिकुमार ऋष्यशृङ्गको अपने यहाँ बुलायेंगे । उनके आते ही इन्द्रदेव उस राज्यमें वर्षा करेंगे । फिर राजा उन्हें अपनी पुत्री शान्ता समर्पित कर देंगे ॥ १८ ॥

ऋष्यशृङ्गस्तु जामाता पुत्रांस्तव विधास्यति । सनत्कुमारकथितमेतावद् व्याहृतं मया ॥ १९ ॥

भावार्थ

‘‘इस तरह ऋष्यशृङ्ग आपके जामाता हुए । वे ही आपके लिये पुत्रोंको सुलभ करानेवाले यज्ञकर्मका सम्पादन करेंगे । यह सनत्कुमारजीकी कही हुई बात मैंने आपसे निवेदन की है’ ॥ १९ ॥

अथ हृष्टो दशरथः सुमन्त्रं प्रत्यभाषत । यथर्ष्यशृङ्गस्त्वानीतो येनोपायेन सोच्यताम् ॥ २० ॥

भावार्थ

यह सुनकर राजा दशरथको बड़ी प्रसन्नता हुई । उन्होंने सुमन्त्रसे कहा—‘मुनिकुमार ऋष्यशृङ्गको वहाँ जिस प्रकार और जिस उपायसे बुलाया गया, वह स्पष्टरूपसे बताओ’ ॥ २० ॥

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