बालकाण्ड, सर्ग 55
ततस्तानाकुलान् दृष्ट्वा विश्वामित्रास्त्रमोहितान् । वसिष्ठश्चोदयामास कामधुक् सृज योगतः ॥ १ ॥
भावार्थ
‘विश्वामित्रके अस्त्रोंसे घायल होकर उन्हें व्याकुल हुआ देख वसिष्ठजीने फिर आज्ञा दी—‘कामधेनो ! अब योगबलसे दूसरे सैनिकोंकी सृष्टि करो’ ॥ १ ॥
तस्या हुंकारतो जाताः काम्बोजा रविसंनिभाः । ऊधसश्चाथ सम्भूता बर्बराः शस्त्रपाणयः ॥ २ ॥
भावार्थ
‘तब उस गौने फिर हुंकार किया । उसके हुंकारसे सूर्यके समान तेजस्वी काम्बोज उत्पन्न हुए । थनसे शस्त्रधारी बर्बर प्रकट हुए ॥ २ ॥
योनिदेशाच्च यवनाः शकृद्देशाच्छकाः स्मृताः । रोमकूपेषु म्लेच्छाश्च हारीताः सकिरातकाः ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘योनिदेशसे यवन और शकृद्देश ( गोबरके स्थान )से शक उत्पन्न हुए । रोमकूपोंसे म्लेच्छ, हारीत और किरात प्रकट हुए ॥ ३ ॥
तैस्तन्निषूदितं सर्वं विश्वामित्रस्य तत्क्षणात् । सपदातिगजं साश्वं सरथं रघुनन्दन ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘रघुनन्दन ! उन सब वीरोंने पैदल, हाथी, घोड़े और रथसहित विश्वामित्रकी सारी सेनाका तत्काल संहार कर डाला ॥ ४ ॥
दृष्ट्वा निषूदितं सैन्यं वसिष्ठेन महात्मना । विश्वामित्रसुतानां तु शतं नानाविधायुधम् ॥ ५ ॥ अभ्यधावत् सुसंक्रुद्धं वसिष्ठं जपतां वरम् । हुंकारेणैव तान् सर्वान् निर्ददाह महानृषिः ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘महात्मा वसिष्ठद्वारा अपनी सेनाका संहार हुआ देख विश्वामित्रके सौ पुत्र अत्यन्त क्रोधमें भर गये और नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लेकर जप करनेवालोंमें श्रेष्ठ वसिष्ठमुनि-पर टूट पड़े । तब उन महर्षिने हुंकारमात्रसे उन सबको जलाकर भस्म कर डाला ॥ ५-६ ॥
ते साश्वरथपादाता वसिष्ठेन महात्मना । भस्मीकृता मुहूर्तेन विश्वामित्रसुतास्तथा ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘महात्मा वसिष्ठद्वारा विश्वामित्रके वे सभी पुत्र दो ही घड़ीमें घोड़े, रथ और पैदल सैनिकोंसहित जलाकर भस्म कर डाले गये ॥ ७ ॥
दृष्ट्वा विनाशितान् सर्वान् बलं च सुमहायशाः । सव्रीडं चिन्तयाविष्टो विश्वामित्रोऽभवत् तदा ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘अपने समस्त पुत्रों तथा सारी सेनाका विनाश हुआ देख महायशस्वी विश्वामित्र लज्जित हो बड़ी चिन्तामें पड़ गये ॥८॥
समुद्र इव निर्वेगो भग्नदंष्ट्र इवोरगः । उपरक्त इवादित्यः सद्यो निष्प्रभतां गतः ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘समुद्रके समान उनका सारा वेग शान्त हो गया। जिसके दाँत तोड़ लिये गये हों उस सर्पके समान तथा राहुग्रस्त सूर्यकी भाँति वे तत्काल ही निस्तेज हो गये ॥ ९ ॥
हतपुत्रबलो दीनो लूनपक्ष इव द्विजः । हतसर्वबलोत्साहो निर्वेदं समपद्यत ॥ १० ॥
भावार्थ
‘पुत्र और सेना दोनोंके मारे जानेसे वे पंख कटे हुए पक्षीके समान दीन हो गये । उनका सारा बल और उत्साह नष्ट हो गया । वे मन-ही-मन बहुत खिन्न हो उठे ॥ १० ॥
स पुत्रमेकं राज्याय पालयेति नियुज्य च । पृथिवीं क्षत्रधर्मेण वनमेवाभ्यपद्यत ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘उनके एक ही पुत्र बचा था, उसको उन्होंने राजाके पदपर अभिषिक्त करके राज्यकी रक्षाके लिये नियुक्त कर दिया और क्षत्रिय-धर्मके अनुसार पृथ्वीके पालनकी आज्ञा देकर वे वनमें चले गये ॥ ११ ॥
स गत्वा हिमवत्पार्श्वे किंनरोरगसेवितम् । महादेवप्रसादार्थं तपस्तेपे महातपाः ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘हिमालयके पार्श्वभागमें, जो किन्नरों और नागोंसे सेवित प्रदेश है, वहाँ जाकर महादेवजीकी प्रसन्नताके लिये महान् तपस्याका आश्रय ले वे तपमें ही संलग्न हो गये ॥ १२ ॥
केनचित् त्वथ कालेन देवेशो वृषभध्वजः । दर्शयामास वरदो विश्वामित्रं महामुनिम् ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘कुछ कालके पश्चात् वरदायक देवेश्वर भगवान् वृषभध्वज ( शिव ) ने महामुनि विश्वामित्रको दर्शन दिया और कहा—॥ १३ ॥
किमर्थं तप्यसे राजन् ब्रूहि यत् ते विवक्षितम् । वरदोऽस्मि वरो यस्ते काङ्क्षितः सोऽभिधीयताम् ॥१४॥
भावार्थ
‘‘राजन् ! किसलिये तप करते हो ? बताओ क्या कहना चाहते हो ? मैं तुम्हें वर देनेके लिये आया हूँ । तुम्हें जो वर पाना अभीष्ट हो, उसे कहो’ ॥ १४ ॥
एवमुक्तस्तु देवेन विश्वामित्रो महातपाः । प्रणिपत्य महादेवं विश्वामित्रोऽब्रवीदिदम् ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘महादेवजीके ऐसा कहनेपर महातपस्वी विश्वामित्रने उन्हें प्रणाम करके इस प्रकार कहा—॥ १५ ॥
यदि तुष्टो महादेव धनुर्वेदो ममानघ । साङ्गोपाङ्गोपनिषदः सरहस्यः प्रदीयताम् ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘‘निष्पाप महादेव ! यदि आप संतुष्ट हों तो अङ्ग, उपाङ्ग, उपनिषद् और रहस्योंसहित धनुर्वेद मुझे प्रदान कीजिये ॥ १६ ॥
यानि देवेषु चास्त्राणि दानवेषु महर्षिषु । गन्धर्वयक्षरक्षःसु प्रतिभान्तु ममानघ ॥ १७ ॥ तव प्रसादाद् भवतु देवदेव ममेप्सितम् ।
भावार्थ
‘‘अनघ ! देवताओं, दानवों, महर्षियों, गन्धर्वों, यक्षों तथा राक्षसोंके पास जो-जो अस्त्र हों, वे सब आपकी कृपासे मेरे हृदयमें स्फुरित हो जायँ । देवदेव ! यही मेरा मनोरथ है, जो मुझे प्राप्त होना चाहिये’ ॥ १७½ ॥
एवमस्त्विति देवेशो वाक्यमुक्त्वा गतस्तदा ॥ १८ ॥ प्राप्य चास्त्राणि देवेशाद् विश्वामित्रो महाबलः । दर्पेण महता युक्तो दर्पपूर्णोऽभवत् तदा ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘तब ‘एवमस्तु’ कहकर देवेश्वर भगवान् शङ्कर वहाँसे चले गये । देवेश्वर महादेवसे वे अस्त्र पाकर महाबली विश्वामित्रको बड़ा घमंड हो गया । वे अभिमानमें भर गये ॥१८-१९॥
विवर्धमानो वीर्येण समुद्र इव पर्वणि । हतं मेने तदा राम वसिष्ठमृषिसत्तमम् ॥ २० ॥ ततो गत्वाऽऽश्रमपदं मुमोचास्त्राणि पार्थिवः । यैस्तत् तपोवनं नाम निर्दग्धं चास्त्रतेजसा ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘जैसे पूर्णिमाको समुद्र बढ़ने लगता है, उसी प्रकार वे पराक्रमद्वारा अपनेको बहुत बढ़ा-चढ़ा मानने लगे । श्रीराम ! उन्होंने मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठको उस समय मरा हुआ ही समझा ॥ ‘फिर तो वे पृथ्वीपति विश्वामित्र वसिष्ठके आश्रमपर जाकर भाँति-भाँतिके अस्त्रोंका प्रयोग करने लगे । जिनके तेजसे वह सारा तपोवन दग्ध होने लगा ॥ २१ ॥
उदीर्यमाणमस्त्रं तद् विश्वामित्रस्य धीमतः । दृष्ट्वा विप्रद्रुता भीता मुनयः शतशो दिशः ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘बुद्धिमान् विश्वामित्रके उस बढ़ते हुए अस्त्र-तेजको देखकर वहाँ रहनेवाले सैकड़ों मुनि भयभीत हो सम्पूर्ण दिशाओंमें भाग चले ॥ २२ ॥
वसिष्ठस्य च ये शिष्या ये च वै मृगपक्षिणः । विद्रवन्ति भयाद् भीता नानादिग्भ्यः सहस्रशः॥ २३ ॥
भावार्थ
‘वसिष्ठजीके जो शिष्य थे, जो वहाँके पशु और पक्षी थे, वे सहस्रों प्राणी भयभीत हो नाना दिशाओंकी ओर भाग गये ॥ २३ ॥
वसिष्ठस्याश्रमपदं शून्यमासीन्महात्मनः । मुहूर्तमिव निःशब्दमासीदीरिणसंनिभम् ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘महात्मा वसिष्ठका वह आश्रम सूना हो गया । दो ही घड़ीमें ऊसर भूमिके समान उस स्थानपर सन्नाटा छा गया॥२४॥
वदतो वै वसिष्ठस्य मा भैरिति मुहुर्मुहुः । नाशयाम्यद्य गाधेयं नीहारमिव भास्करः ॥ २५ ॥
भावार्थ
‘वसिष्ठजी बार-बार कहने लगे–‘डरो मत, मैं अभी इस गाधिपुत्रको नष्ट किये देता हूँ । ठीक उसी तरह, जैसे सूर्य कुहासेको मिटा देता है’ ॥ २५ ॥
एवमुक्त्वा महातेजा वसिष्ठो जपतां वरः । विश्वामित्रं तदा वाक्यं सरोषमिदमब्रवीत् ॥ २६ ॥
भावार्थ
‘जपनेवालोंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी वसिष्ठ ऐसा कहकर उस समय विश्वामित्रजीसे रोषपूर्वक बोले—॥ २६ ॥
आश्रमं चिरसंवृद्धं यद् विनाशितवानसि । दुराचारो हि यन्मूढस्तस्मात् त्वं न भविष्यसि॥२७॥
भावार्थ
“अरे ! तूने चिरकालसे पाले-पोसे तथा हरे-भरे किये हुए इस आश्रमको नष्ट कर दिया—उजाड़ डाला, इसलिये तू दुराचारी और विवेकशून्य है और इस पापके कारण तू कुशलसे नहीं रह सकता’ ॥ २७ ॥
इत्युक्त्वा परमक्रुद्धो दण्डमुद्यम्य सत्वरः । विधूम इव कालाग्निर्यमदण्डमिवापरम् ॥ २८ ॥
भावार्थ
‘ऐसा कहकर वे अत्यन्त क्रुद्ध हो धूमरहित कालाग्निके समान उद्दीप्त हो उठे और दूसरे यमदण्डके समान भयंकर डंडा हाथमें उठाकर तुरंत उनका सामना करनेके लिये तैयार हो गये’ ॥ २८ ॥
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