बालकाण्ड, सर्ग 52
तं दृष्ट्वा परमप्रीतो विश्वामित्रो महाबलः । प्रणतो विनयाद् वीरो वसिष्ठं जपतां वरम् ॥ १ ॥
भावार्थ
‘जप करनेवालोंमें श्रेष्ठ वसिष्ठका दर्शन करके महाबली वीर विश्वामित्र बड़े प्रसन्न हुए और विनयपूर्वक उन्होंने उनके चरणोंमें प्रणाम किया ॥ १ ॥
स्वागतं तव चेत्युक्तो वसिष्ठेन महात्मना । आसनं चास्य भगवान् वसिष्ठो व्यादिदेश ह ॥ २ ॥
भावार्थ
‘तब महात्मा वसिष्ठने कहा—‘राजन् ! तुम्हारा स्वागत है ।’ ऐसा कहकर भगवान् वसिष्ठने उन्हें बैठनेके लिये आसन दिया ॥ २ ॥
उपविष्टाय च तदा विश्वामित्राय धीमते । यथान्यायं मुनिवरः फलमूलमुपाहरत् ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘जब बुद्धिमान् विश्वामित्र आसनपर विराजमान हुए, तब मुनिवर वसिष्ठने उन्हें विधिपूर्वक फल-मूलका उपहार अर्पित किया ॥ ३ ॥
प्रतिगृह्य तु तां पूजां वसिष्ठाद् राजसत्तमः । तपोऽग्निहोत्रशिष्येषु कुशलं पर्यपृच्छत ॥ ४ ॥ विश्वामित्रो महातेजा वनस्पतिगणे तदा । सर्वत्र कुशलं प्राह वसिष्ठो राजसत्तमम् ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘वसिष्ठजीसे वह आतिथ्य-सत्कार ग्रहण करके राजशिरोमणि महातेजस्वी विश्वामित्रने उनके तप, अग्निहोत्र, शिष्यवर्ग और लता-वृक्ष आदिका कुशल-समाचार पूछा । फिर वसिष्ठजीने उन नृपश्रेष्ठसे सबके सकुशल होनेकी बात बतायी ॥४-५॥
सुखोपविष्टं राजानं विश्वामित्रं महातपाः । पप्रच्छ जपतां श्रेष्ठो वसिष्ठो ब्रह्मणः सुतः ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘फिर जप करनेवालोंमें श्रेष्ठ ब्रह्मकुमार महातपस्वी वसिष्ठने वहाँ सुखपूर्वक बैठे हुए राजा विश्वामित्रसे इस प्रकार पूछा—॥ ६ ॥
कच्चित्ते कुशलं राजन् कच्चिद् धर्मेण रञ्जयन् । प्रजाः पालयसे राजन् राजवृत्तेन धार्मिक ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘‘राजन् ! तुम सकुशल तो हो न ? धर्मात्मा नरेश ! क्या तुम धर्मपूर्वक प्रजाको प्रसन्न रखते हुए राजोचित रीति-नीतिसे प्रजावर्गका पालन करते हो ? ॥ ७ ॥
कच्चित्ते सम्भृता भृत्याः कच्चित् तिष्ठन्ति शासने । कच्चित्ते विजिताः सर्वे रिपवो रिपुसूदन ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘‘शत्रुसूदन ! क्या तुमने अपने भृत्योंका अच्छी तरह भरण-पोषण किया है ? क्या वे तुम्हारी आज्ञाके अधीन रहते हैं ? क्या तुमने समस्त शत्रुओंपर विजय पा ली है ? ॥ ८ ॥
कच्चिद् बलेषु कोशेषु मित्रेषु च परंतप । कुशलं ते नरव्याघ्र पुत्रपौत्रे तथानघ ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘‘शत्रुओंको संताप देनेवाले पुरुषसिंह निष्पाप नरेश ! क्या तुम्हारी सेना, कोश, मित्रवर्ग तथा पुत्र-पौत्र आदि सब सकुशल हैं ?’ ॥ ९ ॥
सर्वत्र कुशलं राजा वसिष्ठं प्रत्युदाहरत् । विश्वामित्रो महातेजा वसिष्ठं विनयान्वितम् ॥ १० ॥
भावार्थ
‘तब महातेजस्वी राजा विश्वामित्रने विनयशील महर्षि वसिष्ठको उत्तर दिया—‘हाँ भगवन् ! मेरे यहाँ सर्वत्र कुशल है ?’ ॥ १० ॥
कृत्वा तौ सुचिरं कालं धर्मिष्ठौ ताः कथास्तदा । मुदा परमया युक्तौ प्रीयेतां तौ परस्परम् ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘तत्पश्चात् वे दोनों धर्मात्मा पुरुष बड़ी प्रसन्नताके साथ बहुत देरतक परस्पर वार्तालाप करते रहे । उस समय एकका दूसरेके साथ बड़ा प्रेम हो गया ॥ ११ ॥
ततो वसिष्ठो भगवान् कथान्ते रघुनन्दन । विश्वामित्रमिदं वाक्यमुवाच प्रहसन्निव ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘रघुनन्दन ! बातचीत करनेके पश्चात् भगवान् वसिष्ठने विश्वामित्रसे हँसते हुए-से इस प्रकार कहा—॥ १२ ॥
आतिथ्यं कर्तुमिच्छामि बलस्यास्य महाबल । तव चैवाप्रमेयस्य यथार्हं सम्प्रतीच्छ मे ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘‘महाबली नरेश ! तुम्हारा प्रभाव असीम है । मैं तुम्हारा और तुम्हारी इस सेनाका यथायोग्य आतिथ्य-सत्कार करना चाहता हूँ । तुम मेरे इस अनुरोधको स्वीकार करो ॥ १३ ॥
सत्क्रियां हि भवानेतां प्रतीच्छतु मया कृताम् । राजंस्त्वमतिथिश्रेष्ठः पूजनीयः प्रयत्नतः ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘‘राजन् ! तुम अतिथियोंमें श्रेष्ठ हो, इसलिये यत्नपूर्वक तुम्हारा सत्कार करना मेरा कर्तव्य है । अतः मेरे द्वारा किये गये इस सत्कारको तुम ग्रहण करो’ ॥ १४ ॥
एवमुक्तो वसिष्ठेन विश्वामित्रो महामतिः । कृतमित्यब्रवीद् राजा पूजावाक्येन मे त्वया ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘वसिष्ठके ऐसा कहनेपर महाबुद्धिमान् राजा विश्वामित्रने कहा—‘मुने ! आपके सत्कारपूर्ण वचनोंसे ही मेरा पूर्ण सत्कार हो गया ॥ १५ ॥
फलमूलेन भगवन् विद्यते यत् तवाश्रमे । पाद्येनाचमनीयेन भगवद्दर्शनेन च ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘‘भगवन् ! आपके आश्रमपर जो विद्यमान हैं, उन फल-मूल, पाद्य और आचमनीय आदि वस्तुओंसे मेरा भलीभाँति आदर-सत्कार हुआ है । सबसे बढ़कर जो आपका दर्शन हुआ, इसीसे मेरी पूजा हो गयी ॥ १६ ॥
सर्वथा च महाप्राज्ञ पूजार्हेण सुपूजितः । नमस्तेऽस्तु गमिष्यामि मैत्रेणेक्षस्व चक्षुषा ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘महाज्ञानी महर्षे ! आप सर्वथा मेरे पूजनीय हैं तो भी आपने मेरा भलीभाँति पूजन किया । आपको नमस्कार है । अब मैं यहाँसे जाऊँगा । आप मैत्रीपूर्ण दृष्टिसे मेरी ओर देखिये’ ॥ १७ ॥
एवं ब्रुवन्तं राजानं वसिष्ठं पुनरेव हि । न्यमन्त्रयत धर्मात्मा पुनः पुनरुदारधीः ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘ऐसा कहते हुए राजा विश्वामित्रसे उदारचेता धर्मात्मा वसिष्ठने निमन्त्रण स्वीकार करनेके लिये बारंबार आग्रह किया ॥ १८ ॥
बाढमित्येव गाधेयो वसिष्ठं प्रत्युवाच ह । यथाप्रियं भगवतस्तथास्तु मुनिपुङ्गव ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘तब गाधिनन्दन विश्वामित्रने उन्हें उत्तर देते हुए कहा—‘बहुत अच्छा । मुझे आपकी आज्ञा स्वीकार है । मुनिप्रवर ! आप मेरे पूज्य हैं । आपकी जैसी रुचि हो—आपको जो प्रिय लगे, वही हो’ ॥ १९ ॥
एवमुक्तस्तथा तेन वसिष्ठो जपतां वरः । आजुहाव ततः प्रीतः कल्माषीं धूतकल्मषाम् ॥ २० ॥
भावार्थ
‘राजाके ऐसा कहनेपर जप करनेवालोंमें श्रेष्ठ मुनिवर वसिष्ठ बड़े प्रसन्न हुए । उन्होंने अपनी उस चितकबरी होम-धेनुको बुलाया, जिसके पाप ( अथवा मैल ) धुल गये थे ( वह कामधेनु थी ) ॥ २० ॥
एह्येहि शबले क्षिप्रं शृणु चापि वचो मम । सबलस्यास्य राजर्षेः कर्तुं व्यवसितोऽस्म्यहम् । भोजनेन महार्हेण सत्कारं संविधत्स्व मे ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘( उसे बुलाकर ऋषिने कहा—) ‘शबले ! शीघ्र आओ, आओ और मेरी यह बात सुनो—मैंने सेनासहित इन राजर्षिका महाराजाओंके योग्य उत्तम भोजन आदिके द्वारा आतिथ्य-सत्कार करनेका निश्चय किया है । तुम मेरे इस मनोरथको सफल करो ॥ २१ ॥
यस्य यस्य यथाकामं षड्रसेष्वभिपूजितम् । तत् सर्वं कामधुग् दिव्ये अभिवर्ष कृते मम ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘‘षड्रस भोजनोंमेंसे जिसको जो-जो पसंद हो, उसके लिये वह सब प्रस्तुत कर दो । दिव्य कामधेनो ! आज मेरे कहनेसे इन अतिथियोंके लिये अभीष्ट वस्तुओंकी वर्षा करो ॥ २२ ॥
रसेनान्नेन पानेन लेह्यचोष्येण संयुतम् । अन्नानां निचयं सर्वं सृजस्व शबले त्वर ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘शबले ! सरस पदार्थ, अन्न, पान, लेह्य ( चटनी आदि ) और चोष्य ( चूसनेकी वस्तु ) से युक्त भाँति-भाँतिके अन्नोंकी ढेरी लगा दो । सभी आवश्यक वस्तुओंकी सृष्टि कर दो । शीघ्रता करो—विलम्ब न होने पावे’ ॥ २३ ॥
गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें