बालकाण्ड, सर्ग 30
अथ तौ देशकालज्ञौ राजपुत्रावरिंदमौ । देशे काले च वाक्यज्ञावब्रूतां कौशिकं वचः ॥ १ ॥ भगवञ्छ्रोतुमिच्छावो यस्मिन् काले निशाचरौ । संरक्षणीयौ तौ ब्रूहि नातिवर्तेत तत्क्षणम् ॥ २ ॥
भावार्थ
तदनन्तर देश और कालको जाननेवाले शत्रुदमन राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मण जो देश और कालके अनुसार बोलने योग्य वचनके मर्मज्ञ थे, कौशिक मुनिसे इस प्रकार बोले—॥ ‘भगवन् ! अब हम दोनों यह सुनना चाहते हैं कि किस समय उन दोनों निशाचरोंका आक्रमण होता है ? जब कि हमें उन दोनोंको यज्ञभूमिमें आनेसे रोकना है । कहीं ऐसा न हो, असावधानीमें ही वह समय हाथसे निकल जाय; अतः उसे बता दीजिये’ ॥ २ ॥
एवं ब्रुवाणौ काकुत्स्थौ त्वरमाणौ युयुत्सया । सर्वे ते मुनयः प्रीताः प्रशशंसुर्नृपात्मजौ ॥ ३ ॥
भावार्थ
ऐसी बात कहकर युद्धकी इच्छासे उतावले हुए उन दोनों ककुत्स्थवंशी राजकुमारोंकी ओर देखकर वे सब मुनि बड़े प्रसन्न हुए और उन दोनों बन्धुओंकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे ॥ ३ ॥
अद्यप्रभृति षड्रात्रं रक्षतां राघवौ युवाम् । दीक्षां गतो ह्येष मुनिर्मौनित्वं च गमिष्यति ॥ ४ ॥
भावार्थ
वे बोले—‘ये मुनिवर विश्वामित्रजी यज्ञकी दीक्षा ले चुके हैं; अतः अब मौन रहेंगे । आप दोनों रघुवंशी वीर सावधान होकर आजसे छः रातोंतक इनके यज्ञकी रक्षा करते रहें’ ॥ ४ ॥
तौ तु तद्वचनं श्रुत्वा राजपुत्रौ यशस्विनौ । अनिद्रं षडहोरात्रं तपोवनमरक्षताम् ॥ ५ ॥
भावार्थ
मुनियोंका यह वचन सुनकर वे दोनों यशस्वी राजकुमार लगातार छः दिन और छः राततक उस तपोवनकी रक्षा करते रहे; इस बीचमें उन्होंने नींद भी नहीं ली ॥ ५ ॥
उपासांचक्रतुर्वीरौ यत्तौ परमधन्विनौ । ररक्षतुर्मुनिवरं विश्वामित्रमरिंदमौ ॥ ६ ॥
भावार्थ
शत्रुओंका दमन करनेवाले वे परम धनुर्धर वीर सतत सावधान रहकर मुनिवर विश्वामित्रके पास खड़े हो उनकी ( और उनके यज्ञकी ) रक्षामें लगे रहे ॥ ६ ॥
अथ काले गते तस्मिन् षष्ठेऽहनि तदागते । सौमित्रिमब्रवीद् रामो यत्तो भव समाहितः ॥ ७ ॥
भावार्थ
इस प्रकार कुछ काल बीत जानेपर जब छठा दिन आया, तब श्रीरामने सुमित्राकुमार लक्ष्मणसे कहा—‘सुमित्रानन्दन ! तुम अपने चित्तको एकाग्र करके सावधान हो जाओ’ ॥ ७ ॥
रामस्यैवं ब्रुवाणस्य त्वरितस्य युयुत्सया । प्रजज्वाल ततो वेदिः सोपाध्यायपुरोहिता ॥ ८ ॥
भावार्थ
युद्धकी इच्छासे शीघ्रता करते हुए श्रीराम इस प्रकार कह ही रहे थे कि उपाध्याय ( ब्रह्मा ), पुरोहित ( उपद्रष्टा ) तथा अन्यान्य ऋत्विजोंसे घिरी हुई यज्ञकी वेदी सहसा प्रज्वलित हो उठी ( वेदीका यह जलना राक्षसोंके आगमनका सूचक उत्पात था ) ॥ ८ ॥
सदर्भचमसस्रुक्का ससमित्कुसुमोच्चया । विश्वामित्रेण सहिता वेदिर्जज्वाल सर्त्विजा ॥ ९ ॥
भावार्थ
इसके बाद कुश, चमस, स्रुक्, समिधा और फूलोंके ढेरसे सुशोभित होनेवाली विश्वामित्र तथा ऋत्विजोंसहित जो यज्ञकी वेदी थी, उसपर आहवनीय अग्नि प्रज्वलित हुई ( अग्निका यह प्रज्वलन यज्ञके उद्देश्यसे हुआ था ) ॥ ९ ॥
मन्त्रवच्च यथान्यायं यज्ञोऽसौ सम्प्रवर्तते । आकाशे च महाञ्छब्दः प्रादुरासीद् भयानकः ॥ १० ॥
भावार्थ
फिर तो शास्त्रीय विधिके अनुसार वेद-मन्त्रोंके उच्चारणपूर्वक उस यज्ञका कार्य आरम्भ हुआ । इसी समय आकाशमें बड़े जोरका शब्द हुआ, जो बड़ा ही भयानक था ॥ १० ॥
आवार्य गगनं मेघो यथा प्रावृषि दृश्यते । तथा मायां विकुर्वाणौ राक्षसावभ्यधावताम् ॥ ११ ॥ मारीचश्च सुबाहुश्च तयोरनुचरास्तथा । आगम्य भीमसंकाशा रुधिरौघानवासृजन् ॥ १२ ॥
भावार्थ
जैसे वर्षाकालमें मेघोंकी घटा सारे आकाशको घेरकर छायी हुई दिखायी देती है, उसी प्रकार मारीच और सुबाहु नामक राक्षस सब ओर अपनी माया फैलाते हुए यज्ञमण्डपकी ओर दौड़े आ रहे थे । उनके अनुचर भी साथ थे । उन भयंकर राक्षसोंने वहाँ आकर रक्तकी धाराएँ बरसाना आरम्भ कर दिया ॥ ११-१२ ॥
तां तेन रुधिरौघेण वेदीं वीक्ष्य समुक्षिताम् । सहसाभिद्रुतो रामस्तानपश्यत् ततो दिवि ॥ १३ ॥ तावापतन्तौ सहसा दृष्ट्वा राजीवलोचनः । लक्ष्मणं त्वभिसम्प्रेक्ष्य रामो वचनमब्रवीत् ॥ १४ ॥
भावार्थ
रक्तके उस प्रवाहसे यज्ञ-वेदीके आस-पासकी भूमिको भीगी हुई देख श्रीरामचन्द्रजी सहसा दौड़े और इधर-उधर दृष्टि डालनेपर उन्होंने उन राक्षसोंको आकाशमें स्थित देखा । मारीच और सुबाहुको सहसा आते देख कमलनयन श्रीरामने लक्ष्मणकी ओर देखकर कहा—॥ १३-१४ ॥
पश्य लक्ष्मण दुर्वृत्तान् राक्षसान् पिशिताशनान् । मानवास्त्रसमाधूताननिलेन यथा घनान् ॥ १५ ॥ करिष्यामि न संदेहो नोत्सहे हन्तुमीदृशान् ।
भावार्थ
‘लक्ष्मण ! वह देखो, मांसभक्षण करनेवाले दुराचारी राक्षस आ पहुँचे । मैं मानवास्त्रसे इन सबको उसी प्रकार मार भगाऊँगा, जैसे वायुके वेगसे बादल छिन्न-भिन्न हो जाते हैं । मेरे इस कथनमें तनिक भी संदेह नहीं है । ऐसे कायरोंको मैं मारना नहीं चाहता’ ॥ १५½ ॥
इत्युक्त्वा वचनं रामश्चापे संधाय वेगवान् ॥ १६ ॥ मानवं परमोदारमस्त्रं परमभास्वरम् । चिक्षेप परमक्रुद्धो मारीचोरसि राघवः ॥ १७ ॥
भावार्थ
ऐसा कहकर वेगशाली श्रीरामने अपने धनुषपर परम उदार मानवास्त्रका संधान किया । वह अस्त्र अत्यन्त तेजस्वी था । श्रीरामने बड़े रोषमें भरकर मारीचकी छातीमें उस बाणका प्रहार किया ॥ १६-१७ ॥
स तेन परमास्त्रेण मानवेन समाहतः । सम्पूर्णं योजनशतं क्षिप्तः सागरसम्प्लवे ॥ १८ ॥
भावार्थ
उस उत्तम मानवास्त्रका गहरा आघात लगनेसे मारीच पूरे सौ योजनकी दूरीपर समुद्रके जलमें जा गिरा ॥ १८ ॥
विचेतनं विघूर्णन्तं शीतेषुबलपीडितम् । निरस्तं दृश्य मारीचं रामो लक्ष्मणमब्रवीत् ॥ १९ ॥
भावार्थ
शीतेषु नामक मानवास्त्रसे पीड़ित हो मारीच अचेत-सा होकर चक्कर काटता हुआ दूर चला जा रहा है । यह देख श्रीरामने लक्ष्मणसे कहा—॥ १९ ॥
पश्य लक्ष्मण शीतेषुं मानवं मनुसंहितम् । मोहयित्वा नयत्येनं न च प्राणैर्वियुज्यते ॥ २० ॥
भावार्थ
‘लक्ष्मण ! देखो, मनुके द्वारा प्रयुक्त शीतेषु नामक मानवास्त्र इस राक्षसको मूर्छित करके दूर लिये जा रहा है, किंतु उसके प्राण नहीं ले रहा है ॥ २० ॥
इमानपि वधिष्यामि निर्घृणान् दुष्टचारिणः । राक्षसान् पापकर्मस्थान् यज्ञघ्नान् रुधिराशनान्॥२१॥
भावार्थ
‘अब यज्ञमें विघ्न डालनेवाले इन दूसरे निर्दय, दुराचारी, पापकर्मी एवं रक्तभोजी राक्षसोंको भी मार गिराता हूँ’ ॥ २१ ॥
इत्युक्त्वा लक्ष्मणं चाशु लाघवं दर्शयन्निव । विगृह्य सुमहदास्त्रमाग्नेयं रघुनन्दनः ॥ २२ ॥ सुबाहुरसि चिक्षेप स विद्धः प्रापतद् भुवि । शेषान् वायव्यमादाय निजघान महायशाः । राघवः परमोदारो मुनीनां मुदमावहन् ॥ २३ ॥
भावार्थ
लक्ष्मणसे ऐसा कहकर रघुनन्दन श्रीरामने अपने हाथकी फुर्ती दिखाते हुए-से शीघ्र ही महान् आग्नेयास्त्रका संधान करके उसे सुबाहुकी छातीपर चलाया । उसकी चोट लगते ही वह मरकर पृथ्वीपर गिर पड़ा । फिर महायशस्वी परम उदार रघुवीरने वायव्यास्त्र लेकर शेष निशाचरोंका भी संहार कर डाला और मुनियोंको परम आनन्द प्रदान किया ॥२२-२३॥
स हत्वा राक्षसान् सर्वान् यज्ञघ्नान् रघुनन्दनः । ऋषिभिः पूजितस्तत्र यथेन्द्रो विजये पुरा ॥ २४ ॥
भावार्थ
इस प्रकार रघुकुलनन्दन श्रीराम यज्ञमें विघ्न डालनेवाले समस्त राक्षसोंका वध करके वहाँ ऋषियोंद्वारा उसी प्रकार सम्मानित हुए जैसे पूर्वकालमें देवराज इन्द्र असुरोंपर विजय पाकर महर्षियोंद्वारा पूजित हुए थे ॥ २४ ॥
अथ यज्ञे समाप्ते तु विश्वामित्रो महामुनिः । निरीतिका दिशो दृष्ट्वा काकुत्स्थमिदमब्रवीत् ॥ २५ ॥ कृतार्थोऽस्मि महाबाहो कृतं गुरुवचस्त्वया । सिद्धाश्रममिदं सत्यं कृतं वीर महायशः । स हि रामं प्रशस्यैवं ताभ्यां संध्यामुपागमत् ॥ २६ ॥
भावार्थ
यज्ञ समाप्त होनेपर महामुनि विश्वामित्रने सम्पूर्ण दिशाओंको विघ्न-बाधाओंसे रहित देख श्रीरामचन्द्रजीसे कहा—॥ ‘महाबाहो ! मैं तुम्हें पाकर कृतार्थ हो गया । तुमने गुरुकी आज्ञाका पूर्णरूपसे पालन किया । महायशस्वी वीर ! तुमने इस सिद्धाश्रमका नाम सार्थक कर दिया।’ इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजीकी प्रशंसा करके मुनिने उन दोनों भाइयोंके साथ संध्योपासना की ॥ २६ ॥
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