बालकाण्ड, सर्ग 19
तच्छ्रुत्वा राजसिंहस्य वाक्यमद्भुतविस्तरम् । हृष्टरोमा महातेजा विश्वामित्रोऽभ्यभाषत ॥ १ ॥
भावार्थ
नृपश्रेष्ठ महाराज दशरथका यह अद्भुत विस्तारसे युक्त वचन सुनकर महातेजस्वी विश्वामित्र पुलकित हो उठे और इस प्रकार बोले—॥ १ ॥
सदृशं राजशार्दूल तवैव भुवि नान्यतः । महावंशप्रसूतस्य वसिष्ठव्यपदेशिनः ॥ २ ॥
भावार्थ
राजसिंह ! ये बातें आपके ही योग्य हैं । इस पृथ्वीपर दूसरेके मुखसे ऐसे उदार वचन निकलनेकी सम्भावना नहीं है । क्यों न हो, आप महान् कुलमें उत्पन्न हैं और वसिष्ठ-जैसे ब्रह्मर्षि आपके उपदेशक हैं ॥ २ ॥
यत् तु मे हृद्गतं वाक्यं तस्य कार्यस्य निश्चयम् । कुरुष्व राजशार्दूल भव सत्यप्रतिश्रवः ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘अच्छा, अब जो बात मेरे हृदयमें है, उसे सुनिये । नृपश्रेष्ठ ! सुनकर उस कार्यको अवश्य पूर्ण करनेका निश्चय कीजिये । आपने मेरा कार्य सिद्ध करनेको प्रतिज्ञा की है । इस प्रतिज्ञाको सत्य कर दिखाइये ॥ ३ ॥
अहं नियममातिष्ठे सिद्ध्यर्थं पुरुषर्षभ । तस्य विघ्नकरौ द्वौ तु राक्षसौ कामरूपिणौ ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘पुरुषप्रवर ! मैं सिद्धिके लिये एक नियमका अनुष्ठान करता हूँ । उसमें इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले दो राक्षस विघ्न डाल रहे हैं ॥ ४ ॥
व्रते तु बहुशश्चीर्णे समाप्त्यां राक्षसाविमौ । मारीचश्च सुबाहुश्च वीर्यवन्तौ सुशिक्षितौ ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘मेरे इस नियमका अधिकांश कार्य पूर्ण हो चुका है । अब उसकी समाप्तिके समय वे दो राक्षस आ धमके हैं । उनके नाम हैं मारीच और सुबाहु । वे दोनों बलवान् और सुशिक्षित हैं ॥ ५ ॥
तौ मांसरुधिरौघेण वेदिं तामभ्यवर्षताम् । अवधूते तथाभूते तस्मिन् नियमनिश्चये ॥ ६ ॥ कृतश्रमो निरुत्साहस्तस्माद् देशादपाक्रमे ।
भावार्थ
‘उन्होंने मेरी यज्ञवेदीपर रक्त और मांसकी वर्षा कर दी है । इस प्रकार उस समाप्तप्राय नियममें विघ्न पड़ जानेके कारण मेरा परिश्रम व्यर्थ गया और मैं उत्साहहीन होकर उस स्थानसे चला आया ॥ ६½ ॥
न च मे क्रोधमुत्स्रष्टुं बुद्धिर्भवति पार्थिव ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘पृथ्वीनाथ ! उनके ऊपर अपने क्रोधका प्रयोग करूँ— उन्हें शाप दे दूँ, ऐसा विचार मेरे मनमें नहीं आता है॥७॥
तथाभूता हि सा चर्या न शापस्तत्र मुच्यते । स्वपुत्रं राजशार्दूल रामं सत्यपराक्रमम् ॥ ८ ॥ काकपक्षधरं वीरं ज्येष्ठं मे दातुमर्हसि ।
भावार्थ
‘क्योंकि यह नियम ही ऐसा है, जिसको आरम्भ कर देनेपर किसीको शाप नहीं दिया जाता; अतः नृपश्रेष्ठ ! आप अपने काकपच्छधारी, सत्यपराक्रमी, शूरवीर ज्येष्ठ पुत्र श्रीरामको मुझे दे दें ॥ ८½ ॥
शक्तो ह्येष मया गुप्तो दिव्येन स्वेन तेजसा ॥ ९ ॥ राक्षसा ये विकर्तारस्तेषामपि विनाशने । श्रेयश्चास्मै प्रदास्यामि बहुरूपं न संशयः ॥ १० ॥
भावार्थ
‘ये मुझसे सुरक्षित रहकर अपने दिव्य तेजसे उन विघ्नकारी राक्षसोंका नाश करनेमें समर्थ हैं । मैं इन्हें अनेक प्रकारका श्रेय प्रदान करूँगा, इसमें संशय नहीं है ॥ ९-१० ॥
त्रयाणामपि लोकानां येन ख्यातिं गमिष्यति । न च तौ राममासाद्य शक्तो स्थातुं कथंचन ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘उस श्रेयको पाकर ये तीनों लोकोंमें विख्यात होंगे । श्रीरामके सामने आकर वे दोनों राक्षस किसी तरह ठहर नहीं सकते ॥ ११ ॥
न च तौ राघवादन्यो हन्तुमुत्सहते पुमान् । वीर्योत्सिक्तौ हि तौ पापौ कालपाशवशं गतौ ॥ १२ ॥ रामस्य राजशार्दूल न पर्याप्तौ महात्मनः ।
भावार्थ
‘इन रघुनन्दनके सिवा दूसरा कोई पुरुष उन राक्षसोंको मारनेका साहस नहीं कर सकता । नृपश्रेष्ठ ! अपने बलका घमंड रखनेवाले वे दोनों पापी निशाचर कालपाशके अधीन हो गये हैं; अतः महात्मा श्रीरामके सामने नहीं टिक सकते ॥१२½॥
न च पुत्रगतं स्नेहं कर्तुमर्हसि पार्थिव ॥ १३ ॥ अहं ते प्रतिजानामि हतौ तौ विद्धि राक्षसौ ।
भावार्थ
‘भूपाल ! आप पुत्रविषयक स्नेहको सामने न लाइये । मैं आपसे प्रतिज्ञापूर्वक कहता हूँ कि उन दोनों राक्षसोंको इनके हाथसे मरा हुआ ही समझिये ॥ १३½ ॥
अहं वेद्मि महात्मानं रामं सत्यपराक्रमम् ॥ १४ ॥ वसिष्ठोऽपि महातेजा ये चेमे तपसि स्थिताः । यदि ते धर्मलाभं तु यशश्च परमं भुवि ॥ १५ ॥ स्थिरमिच्छसि राजेन्द्र रामं मे दातुमर्हसि ।
भावार्थ
‘सत्यपराक्रमी महात्मा श्रीराम क्या हैं—यह मैं जानता हूँ । महातेजस्वी वसिष्ठजी तथा ये अन्य तपस्वी भी जानते हैं ॥ ‘राजेन्द्र ! यदि आप इस भूमण्डलमें धर्म-लाभ और उत्तम यशको स्थिर रखना चाहते हों तो श्रीरामको मुझे दे दीजिये ॥ १५½ ॥
यद्यभ्यनुज्ञां काकुत्स्थ ददते तव मन्त्रिणः ॥ १६ ॥ वसिष्ठप्रमुखाः सर्वे ततो रामं विसर्जय ।
भावार्थ
‘ककुत्स्थनन्दन ! यदि वसिष्ठ आदि आपके सभी मन्त्री आपको अनुमति दें तो आप श्रीरामको मेरे साथ विदा कर दीजिये ॥ १६½ ॥
अभिप्रेतमसंसक्तमात्मजं दातुमर्हसि ॥ १७ ॥ दशरात्रं हि यज्ञस्य रामं राजीवलोचनम् ।
भावार्थ
‘मुझे रामको ले जाना अभीष्ट है । ये भी बड़े होनेके कारण अब आसक्तिरहित हो गये हैं; अतः आप यज्ञके अवशिष्ट दस दिनोंके लिये अपने पुत्र कमलनयन श्रीरामको मुझे दे दीजिये ॥ १७½ ॥
नात्येति कालो यज्ञस्य यथायं मम राघव ॥ १८ ॥ तथा कुरुष्व भद्रं ते मा च शोके मनः कृथाः ।
भावार्थ
‘रघुनन्दन ! आप ऐसा कीजिये जिससे मेरे यज्ञका समय व्यतीत न हो जाय । आपका कल्याण हो । आप अपने मनको शोक और चिन्तामें न डालिये’ ॥ १८½ ॥
इत्येवमुक्त्वा धर्मात्मा धर्मार्थसहितं वचः ॥ १९ ॥ विरराम महातेजा विश्वामित्रो महामतिः ।
भावार्थ
यह धर्म और अर्थसे युक्त वचन कहकर धर्मात्मा, महातेजस्वी, परमबुद्धिमान् विश्वामित्रजी चुप हो गये ॥ १९½ ॥
स तन्निशम्य राजेन्द्रो विश्वामित्रवचः शुभम् ॥ २० ॥ शोकेन महताविष्टश्चचाल च मुमोह च ।
भावार्थ
विश्वामित्रका यह शुभ वचन सुनकर महाराज दशरथको पुत्र-वियोगकी आशङ्कासे महान् दुःख हुआ । वे उससे पीड़ित हो सहसा काँप उठे और बेहोश हो गये ॥ २०½ ॥
लब्धसंज्ञस्तदोत्थाय व्यषीदत भयान्वितः ॥ २१ ॥ इति हृदयमनोविदारणं मुनिवचनं तदतीव शुश्रुवान् नरपतिरभवन्महान् महात्मा व्यथितमनाः प्रचचाल चासनात् ॥ २२ ॥
भावार्थ
थोड़ी देर बाद जब उन्हें होश हुआ, तब वे भयभीत हो विषाद करने लगे । विश्वामित्र मुनिका वचन राजाके हृदय और मनको विदीर्ण करनेवाला था । उसे सुनकर उनके मनमें बड़ी व्यथा हुई । वे महामनस्वी महाराज अपने आसनसे विचलित हो मूर्च्छित हो गये ॥ २१-२२ ॥
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