Ramayana.com

बालकाण्ड, सर्ग 15

मेधावी तु ततो ध्यात्वा स किञ्चिदिदमुत्तरम् । लब्धसंज्ञस्ततस्तं तु वेदज्ञो नृपमब्रवीत् ॥ १ ॥

भावार्थ

महात्मा ऋष्यशृङ्ग बड़े मेधावी और वेदोंके ज्ञाता थे । उन्होंने थोड़ी देरतक ध्यान लगाकर अपने भावी कर्तव्यका निश्चय किया । फिर ध्यानसे विरत हो वे राजासे इस प्रकार बोले—॥ १ ॥

इष्टिं तेऽहं करिष्यामि पुत्रीयां पुत्रकारणात् । अथर्वशिरसि प्रोक्तैर्मन्त्रैः सिद्धां विधानतः ॥ २ ॥

भावार्थ

‘महाराज ! मैं आपको पुत्रकी प्राप्ति करानेके लिये अथर्ववेदके मन्त्रोंसे पुत्रेष्टि नामक यज्ञ करूँगा । वेदोक्त विधिके अनुसार अनुष्ठान करनेपर वह यज्ञ अवश्य सफल होगा’ ॥ २ ॥

ततः प्राक्रमदिष्टिं तां पुत्रीयां पुत्रकारणात् । जुहावाग्नौ च तेजस्वी मन्त्रदृष्टेन कर्मणा ॥ ३ ॥

भावार्थ

यह कहकर उन तेजस्वी ऋषिने पुत्रप्राप्तिके उद्देश्यसे पुत्रेष्टि नामक यज्ञ प्रारम्भ किया और श्रौतविधिके अनुसार अग्निमें आहुति डाली ॥ ३ ॥

ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः । भागप्रतिग्रहार्थं वै समवेता यथाविधि ॥ ४ ॥

भावार्थ

तब देवता, सिद्ध, गन्धर्व और महर्षिगण विधिके अनुसार अपना-अपना भाग ग्रहण करनेके लिये उस यज्ञमें एकत्र हुए ॥ ४ ॥

ताः समेत्य यथान्यायं तस्मिन् सदसि देवताः । अब्रुवँल्लोककर्तारं ब्रह्माणं वचनं ततः ॥ ५ ॥

भावार्थ

उस यज्ञ-सभामें क्रमशः एकत्र होकर ( दूसरोंकी दृष्टिसे अदृश्य रहते हुए ) सब देवता लोककर्ता ब्रह्माजीसे इस प्रकार बोले—॥ ५ ॥

भगवंस्त्वत्प्रसादेन रावणो नाम राक्षसः । सर्वान् नो बाधते वीर्याच्छासितुं तं न शक्नुमः ॥ ६ ॥

भावार्थ

‘भगवन् ! रावण नामक राक्षस आपका कृपाप्रसाद पाकर अपने बलसे हम सब लोगोंको बड़ा कष्ट दे रहा है। हममें इतनी शक्ति नहीं है कि अपने पराक्रमसे उसको दबा सकें ॥ ६ ॥

त्वया तस्मै वरो दत्तः प्रीतेन भगवंस्तदा । मानयन्तश्च तं नित्यं सर्वं तस्य क्षमामहे ॥ ७ ॥

भावार्थ

‘प्रभो ! आपने प्रसन्न होकर उसे वर दे दिया है । तबसे हमलोग उस वरका सदा समादर करते हुए उसके सारे अपराधोंको सहते चले आ रहे हैं ॥ ७ ॥

उद्वेजयति लोकांस्त्रीनुच्छ्रितान् द्वेष्टि दुर्मतिः । शक्रं त्रिदशराजानं प्रधर्षयितुमिच्छति ॥ ८ ॥

भावार्थ

‘उसने तीनों लोकोंके प्राणियोंका नाकों दम कर रखा है । वह दुष्टात्मा जिनको कुछ ऊँची स्थितिमें देखता है, उन्हींके साथ द्वेष करने लगता है । देवराज इन्द्रको परास्त करनेकी अभिलाषा रखता है ॥ ८ ॥

ऋषीन् यक्षान् सगन्धर्वान् ब्राह्मणानसुरांस्तदा । अतिक्रामति दुर्धर्षो वरदानेन मोहितः ॥९॥

भावार्थ

‘आपके वरदानसे मोहित होकर वह इतना उद्दण्ड हो गया है कि ऋषियों, यक्षों, गन्धर्वों, असुरों तथा ब्राह्मणोंको पीड़ा देता और उनका अपमान करता फिरता है ॥ ९ ॥

नैनं सूर्यः प्रतपति पार्श्वे वाति न मारुतः । चलोर्मिमाली तं दृष्ट्वा समुद्रोऽपि न कम्पते ॥ १० ॥

भावार्थ

‘सूर्य उसको ताप नहीं पहुँचा सकते । वायु उसके पास जोरसे नहीं चलती तथा जिसकी उत्ताल तरङ्गें सदा ऊपर-नीचे होती रहती हैं, वह समुद्र भी रावणको देखकर भयके मारे स्तब्ध-सा हो जाता है—उसमें कम्पन नहीं होता ॥ १० ॥

तन्महन्नो भयं तस्माद् राक्षसाद् घोरदर्शनात् । वधार्थं तस्य भगवन्नुपायं कर्तुमर्हसि ॥ ११ ॥

भावार्थ

‘वह राक्षस देखनेमें भी बड़ा भयंकर है । उससे हमें महान् भय प्राप्त हो रहा है; अतः भगवन् ! उसके वधके लिये आपको कोई-न-कोई उपाय अवश्य करना चाहिये’ ॥११॥

एवमुक्तः सुरैः सर्वैश्चिन्तयित्वा ततोऽब्रवीत् । हन्तायं विदितस्तस्य वधोपायो दुरात्मनः ॥ १२ ॥ तेन गन्धर्वयक्षाणां देवतानां च रक्षसाम् । अवध्योऽस्मीति वागुक्ता तथेत्युक्तं च तन्मया ॥ १३ ॥

भावार्थ

समस्त देवताओंके ऐसा कहनेपर ब्रह्माजी कुछ सोचकर बोले—‘देवताओ ! लो, उस दुरात्माके वधका उपाय मेरी समझमें आ गया । उसने वर माँगते समय यह बात कही थी कि मैं गन्धर्व, यक्ष, देवता तथा राक्षसोंके हाथसे न मारा जाऊँ । मैंने भी ‘तथास्तु’ कहकर उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली ॥ १२-१३ ॥

नाकीर्तयदवज्ञानात् तद् रक्षो मानुषांस्तदा । तस्मात् स मानुषाद् वध्यो मृत्युर्नान्योऽस्य विद्यते१४

भावार्थ

‘मनुष्योंको तो वह तुच्छ समझता था, इसलिये उनके प्रति अवहेलना होनेके कारण उनसे अवध्य होनेका वरदान नहीं माँगा । इसलिये अब मनुष्यके हाथसे ही उसका वध होगा । मनुष्यके सिवा दूसरा कोई उसकी मृत्युका कारण नहीं है’ ॥ १४ ॥

एतच्छ्रुत्वा प्रियं वाक्यं ब्रह्मणा समुदाहृतम् । देवा महर्षयः सर्वे प्रहृष्टास्तेऽभवंस्तदा ॥ १५ ॥

भावार्थ

ब्रह्माजीकी कही हुई यह प्रिय बात सुनकर उस समय समस्त देवता और महर्षि बड़े प्रसन्न हुए ॥ १५ ॥

एतस्मिन्नन्तरे विष्णुरुपयातो महाद्युतिः । शङ्खचक्रगदापाणिः पीतवासा जगत्पतिः ॥ १६ ॥ वैनतेयं समारुह्य भास्करस्तोयदं यथा । तप्तहाटककेयूरो वन्द्यमानः सुरोत्तमैः ॥ १७ ॥ ब्रह्मणा च समागत्य तत्र तस्थौ समाहितः ।

भावार्थ

इसी समय महान् तेजस्वी जगत्पति भगवान् विष्णु भी मेघके ऊपर स्थित हुए सूर्यकी भाँति गरुड़पर सवार हो वहाँ आ पहुँचे । उनके शरीरपर पीताम्बर और हाथोंमें शङ्ख, चक्र एवं गदा आदि आयुध शोभा पा रहे थे । उनकी दोनों भुजाओंमें तपाये हुए सुवर्णके बने केयूर प्रकाशित हो रहे थे । उस समय सम्पूर्ण देवताओंने उनकी वन्दना की और वे ब्रह्माजीसे मिलकर सावधानीके साथ सभामें विराजमान हो गये ॥ १६-१७½ ॥

तमब्रुवन् सुराः सर्वे समभिष्टूय संनताः ॥ १८ ॥ त्वां नियोक्ष्यामहे विष्णो लोकानां हितकाम्यया । राज्ञो दशरथस्य त्वमयोध्याधिपतेर्विभो ॥ १९ ॥ धर्मज्ञस्य वदान्यस्य महर्षिसमतेजसः । अस्य भार्यासु तिसृषु ह्रीश्रीकीर्त्युपमासु च ॥ २० ॥ विष्णो पुत्रत्वमागच्छ कृत्वाऽऽत्मानं चतुर्विधम् । तत्र त्वं मानुषो भूत्वा प्रवृद्धं लोककण्टकम् ॥ २१ ॥ अवध्यं दैवतैर्विष्णो समरे जहि रावणम् ।

भावार्थ

तब समस्त देवताओंने विनीत भावसे उनकी स्तुति करके कहा—‘सर्वव्यापी परमेश्वर ! हम तीनों लोकोंके हितकी कामनासे आपके ऊपर एक महान् कार्यका भार दे रहे हैं ॥ ‘प्रभो ! अयोध्याके राजा दशरथ धर्मज्ञ, उदार तथा महर्षियोंके समान तेजस्वी हैं । उनके तीन रानियाँ हैं, जो ह्री, श्री और कीर्ति—इन तीन देवियोंके समान हैं । विष्णुदेव ! आप अपने चार स्वरूप बनाकर राजाकी उन तीनों रानियोंके गर्भसे पुत्ररूपमें अवतार ग्रहण कीजिये । इस प्रकार मनुष्यरूपमें प्रकट होकर आप संसारके लिये प्रबल कण्टकरूप रावणको, जो देवताओंके लिये अवध्य है, समरभूमिमें मार डालिये ॥ १९-२१½ ॥

स हि देवान् सगन्धर्वान् सिद्धांश्च ऋषिसत्तमान् ॥ २२ ॥ राक्षसो रावणो मूर्खो वीर्योद्रेकेण बाधते । ऋषयश्च ततस्तेन गन्धर्वाप्सरसस्तथा ॥ २३ ॥ क्रीडन्तो नन्दनवने रौद्रेण विनिपातिताः ।

भावार्थ

‘वह मूर्ख राक्षस रावण अपने बढ़े हुए पराक्रमसे देवता, गन्धर्व, सिद्ध तथा श्रेष्ठ महर्षियोंको बहुत कष्ट दे रहा है ॥ ‘उस रौद्र निशाचरने ऋषियोंको तथा नन्दनवनमें क्रीड़ा करनेवाले गन्धर्वों और अप्सराओंको भी स्वर्गसे भूमिपर गिरा दिया है ॥ २३½ ॥

वधार्थं वयमायातास्तस्य वै मुनिभिः सह ॥ २४ ॥ सिद्धगन्धर्वयक्षाश्च ततस्त्वां शरणं गताः ।

भावार्थ

‘इसलिये मुनियोंसहित हम सब सिद्ध, गन्धर्व यक्ष, तथा देवता उसके वधके लिये आपकी शरणमें आये हैं ॥ २४½ ॥

त्वं गतिः परमा देव सर्वेषां नः परंतप ॥ २५ ॥ वधाय देवशत्रूणां नृणां लोके मनः कुरु । एवं स्तुतस्तु देवेशो विष्णुस्त्रिदशपुंगवः ॥ २६ ॥ पितामहपुरोगांस्तान् सर्वलोकनमस्कृतः । अब्रवीत् त्रिदशान् सर्वान् समेतान् धर्मसंहितान् ॥ २७ ॥

भावार्थ

‘शत्रुओंको संताप देनेवाले देव ! आप ही हम सब लोगोंकी परमगति हैं, अतः इन देवद्रोहियोंका वध करनेके लिये आप मनुष्यलोकमें अवतार लेनेका निश्चय कीजिये’ ॥ उनके इस प्रकार स्तुति करनेपर सर्वलोकवन्दित देवप्रवर देवाधिदेव भगवान् विष्णुने वहाँ एकत्र हुए उन समस्त ब्रह्मा आदि धर्मपरायण देवताओंसे कहा—॥ २६-२७ ॥

भयं त्यजत भद्रं वो हितार्थं युधि रावणम् । सपुत्रपौत्रं सामात्यं समन्त्रिज्ञातिबान्धवम् ॥ २८ ॥ हत्वा क्रूरं दुराधर्षं देवर्षीणां भयावहम् । दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च ॥ २९ ॥ वत्स्यामि मानुषे लोके पालयन् पृथिवीमिमाम् ।

भावार्थ

‘देवगण ! तुम्हारा कल्याण हो । तुम भयको त्याग दो । मैं तुम्हारा हित करनेके लिये रावणको पुत्र, पौत्र, अमात्य, मन्त्री और बन्धु-बान्धवोंसहित युद्धमें मार डालूँगा । देवताओं तथा ऋषियोंको भय देनेवाले उस क्रूर एवं दुर्धर्ष राक्षसका नाश करके मैं ग्यारह हजार वर्षोंतक इस पृथ्वीका पालन करता हुआ मनुष्यलोकमें निवास करूँगा’ ॥२८-२९½॥

एवं दत्त्वा वरं देवो देवानां विष्णुरात्मवान् ॥ ३० ॥ मानुष्ये चिन्तयामास जन्मभूमिमथात्मनः । ततः पद्मपलाशाक्षः कृत्वाऽऽत्मानं चतुर्विधम् ॥ ३१ ॥ पितरं रोचयामास तदा दशरथं नृपम् ।

भावार्थ

देवताओंको ऐसा वर देकर मनस्वी भगवान् विष्णुने मनुष्यलोकमें पहले अपनी जन्मभूमिके सम्बन्धमें विचार किया ॥ इसके बाद कमलनयन श्रीहरिने अपनेको चार स्वरूपोंमें प्रकट करके राजा दशरथको पिता बनानेका निश्चय किया ॥३१½॥

ततो देवर्षिगन्धर्वाः सरुद्राः साप्सरोगणाः । स्तुतिभिर्दिव्यरूपाभिस्तुष्टुवुर्मधुसूदनम् ॥ ३२ ॥

भावार्थ

तब देवता, ऋषि, गन्धर्व, रुद्र तथा अप्सराओंने दिव्य स्तुतियोंके द्वारा भगवान् मधुसूदनका स्तवन किया ॥ ३२ ॥

तमुद्धतं रावणमुग्रतेजसं प्रवृद्धदर्पं त्रिदशेश्वरद्विषम् । विरावणं साधुतपस्विकण्टकं तपस्विनामुद्धर तं भयावहम् ॥ ३३ ॥

भावार्थ

वे कहने लगे—‘प्रभो ! रावण बड़ा उद्दण्ड है । उसका तेज अत्यन्त उग्र और घमंड बहुत बढ़ा-चढ़ा है । वह देवराज इन्द्रसे सदा द्वेष रखता है । तीनों लोकोंको रुलाता है , साधुओं और तपस्वी जनोंके लिये तो वह बहुत बड़ा कण्टक है; अतः तापसोंको भय देनेवाले उस भयानक राक्षसकी आप जड़ उखाड़ डालिये ॥ ३३ ॥

तमेव हत्वा सबलं सबान्धवं विरावणं रावणमुग्रपौरुषम् । स्वर्लोकमागच्छ गतज्वरश्चिरं सुरेन्द्रगुप्तं गतदोषकल्मषम् ॥ ३४ ॥

भावार्थ

‘उपेन्द्र ! सारे जगत्को रुलानेवाले उस उग्र पराक्रमी रावणको सेना और बन्धु-बान्धवोंसहित नष्ट करके अपनी स्वाभाविक निश्चिन्तताके साथ अपने ही द्वारा सुरक्षित उस चिरन्तन वैकुण्ठधाममें आ जाइये; जिसे राग-द्वेष आदि दोषोंका कलुष कभी छू नहीं पाता है’ ॥ ३४ ॥

Ramayan appFree. No ads. Works offline.Install

गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें