बालकाण्ड, सर्ग 13
पुनः प्राप्ते वसन्ते तु पूर्णः संवत्सरोऽभवत् । प्रसवार्थं गतो यष्टुं हयमेधेन वीर्यवान् ॥ १ ॥
भावार्थ
वर्तमान वसन्त ऋतुके वीतनेपर जब पुनः दूसरा वसन्त आया, तबतक एक वर्षका समय पूरा हो गया । उस समय शक्तिशाली राजा दशरथ संतानके लिये अश्वमेध यज्ञकी दीक्षा लेनेके निमित्त वसिष्ठजीके समीप गये ॥ १ ॥
अभिवाद्य वसिष्ठं च न्यायतः प्रतिपूज्य च । अब्रवीत् प्रश्रितं वाक्यं प्रसवार्थं द्विजोत्तमम् ॥ २ ॥
भावार्थ
वसिष्ठजीको प्रणाम करके राजाने न्यायतः उनका पूजन किया और पुत्र-प्राप्तिका उद्देश्य लेकर उन द्विजश्रेष्ठ मुनिसे यह विनययुक्त बात कही—॥ २ ॥
यज्ञो मे क्रियतां ब्रह्मन् यथोक्तं मुनिपुङ्गव । यथा न विघ्नाः क्रियन्ते यज्ञाङ्गेषु विधीयताम् ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘ब्रह्मन् ! मुनिप्रवर ! आप शास्त्रविधिके अनुसार मेरा यज्ञ करावें और यज्ञके अङ्गभूत अश्व-संचारण आदिमें ब्रह्मराक्षस आदि जिस तरह विघ्न न डाल सकें, वैसा उपाय कीजिये ॥ ३ ॥
भवान् स्निग्धः सुहृन्मह्यं गुरुश्च परमो महान् । वोढव्यो भवता चैव भारो यज्ञस्य चोद्यतः ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘आपका मुझपर विशेष स्नेह है, आप मेरे सुहृद्--अकारण हितैषी, गुरु और परम महान् हैं । यह जो यज्ञका भार उपस्थित हुआ है, इसको आप ही वहन कर सकते हैं’ ॥ ४ ॥
तथेति च स राजानमब्रवीद् द्विजसत्तमः । करिष्ये सर्वमेवैतद् भवता यत् समर्थितम् ॥ ५ ॥
भावार्थ
तब ‘बहुत अच्छा’ कहकर विप्रवर वसिष्ठ मुनि राजासे इस प्रकार बोले—‘नरेश्वर ! तुमने जिसके लिये प्रार्थना की है, वह सब मैं करूँगा’ ॥ ५ ॥
ततोऽब्रवीद् द्विजान् वृद्धान् यज्ञकर्मसुनिष्ठितान् । स्थापत्ये निष्ठितांश्चैव वृद्धान् परमधार्मिकान् ॥ ६ ॥ कर्मान्तिकाञ्शिल्पकारान् वर्धकीन् खनकानपि । गणकाञ्शिल्पिनश्चैव तथैव नटनर्तकान् ॥ ७ ॥ तथा शुचीञ्शास्त्रविदः पुरुषान् सुबहुश्रुतान् । यज्ञकर्म समीहन्तां भवन्तो राजशासनात् ॥ ८ ॥
भावार्थ
तदनन्तर वसिष्ठजीने यज्ञसम्बन्धी कर्मोंमें निपुण तथा यज्ञविषयक शिल्पकर्ममें कुशल, परम धर्मात्मा, बूढ़े ब्राह्मणों, यज्ञकर्म समाप्त होनेतक उसमें सेवा करनेवाले सेवकों, शिल्प-कारों, बढ़इयों, भूमि खोदनेवालों, ज्योतिषियों, कारीगरों, नटों, नर्तकों, विशुद्ध शास्त्रवेत्ताओं तथा बहुश्रुत पुरुषोंको बुलाकर उनसे कहा—‘तुमलोग महाराजकी आज्ञासे यज्ञकर्मके लिये आवश्यक प्रबन्ध करो ॥ ६–८ ॥
इष्टका बहुसाहस्री शीघ्रमानीयतामिति । उपकार्याः क्रियन्तां च राज्ञो बहुगुणान्विताः ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘शीघ्र ही कई हजार ईंटें लायी जायँ । राजाओंके ठहरनेके लिये उनके योग्य अन्न-पान आदि अनेक उपकरणोंसे युक्त बहुत-से महल बनाये जायँ ॥ ९ ॥
ब्राह्मणावसथाश्चैव कर्तव्याः शतशः शुभाः । भक्ष्यान्नपानैर्बहुभिः समुपेताः सुनिष्ठिताः ॥ १० ॥
भावार्थ
‘ब्राह्मणोंके रहनेके लिये भी सैकड़ों सुन्दर घर बनाये जाने चाहिये । वे सभी गृह बहुत-से भोजनीय अन्न-पान आदि उपकरणोंसे युक्त तथा आँधी-पानी आदिके निवारणमें समर्थ हों ॥ १० ॥
तथा पौरजनस्यापि कर्तव्याश्च सुविस्तराः । आगतानां सुदूराच्च पार्थिवानां पृथक् पृथक् ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘इसी तरह पुरवासियोंके लिये भी विस्तृत मकान बनने चाहिये । दूरसे आये हुए भूपालोंके लिये पृथक्-पृथक् महल बनाये जायँ ॥ ११ ॥
वाजिवारणशालाश्च तथा शय्यागृहाणि च । भटानां महदावासा वैदेशिकनिवासिनाम् ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘घोड़े और हाथियोंके लिये भी शालाएँ बनायी जायँ । साधारण लोगोंके सोनेके लिये भी घरोंकी व्यवस्था हो । विदेशी सैनिकोंके लिये भी बड़ी-बड़ी छावनियाँ बननी चाहिये ॥ १२ ॥
आवासा बहुभक्ष्या वै सर्वकामैरुपस्थिताः । तथा पौरजनस्यापि जनस्य बहुशोभनम् ॥ १३ ॥ दातव्यमन्नं विधिवत् सत्कृत्य न तु लीलया ।
भावार्थ
‘जो घर बनाये जायँ, उनमें खाने-पीनेकी प्रचुर सामग्री संचित रहे। उनमें सभी मनोवाञ्छित पदार्थ सुलभ हों तथा नगरवासियोंको भी बहुत सुन्दर अन्न भोजनके लिये देना चाहिये । वह भी विधिवत् सत्कारपूर्वक दिया जाय, अवहेलना करके नहीं ॥ १३½ ॥
सर्वे वर्णा यथा पूजां प्राप्नुवन्ति सुसत्कृताः ॥ १४ ॥ न चावज्ञा प्रयोक्तव्या कामक्रोधवशादपि ।
भावार्थ
‘ऐसी व्यवस्था होनी चाहिये, जिससे सभी वर्णके लोग भलीभाँति सत्कृत हो सम्मान प्राप्त करें । काम और क्रोधके वशीभूत होकर भी किसीका अनादर नहीं करना चाहिये॥१४½॥
यज्ञकर्मसु ये व्यग्राः पुरुषाः शिल्पिनस्तथा ॥ १५ ॥ तेषामपि विशेषेण पूजा कार्या यथाक्रमम् ।
भावार्थ
‘जो शिल्पी मनुष्य यज्ञकर्मकी आवश्यक तैयारीमें लगे हों, उनका तो बड़े-छोटेका खयाल रखकर विशेषरूपसे समादर करना चाहिये ॥ १५½ ॥
ये स्युः सम्पूजिताः सर्वे वसुभिर्भोजनेन च ॥ १६ ॥ यथा सर्वं सुविहितं न किंचित् परिहीयते । तथा भवन्तः कुर्वन्तु प्रीतियुक्तेन चेतसा ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘जो सेवक या कारीगर धन और भोजन आदिके द्वारा सम्मानित किये जाते हैं, वे सब परिश्रमपूर्वक कार्य करते हैं । उनका किया हुआ सारा कार्य सुन्दर ढंगसे सम्पन्न होता है । उनका कोई काम बिगड़ने नहीं पाता; अतः तुम सब लोग प्रसन्नचित्त होकर ऐसा ही करो’ ॥ १६-१७ ॥
ततः सर्वे समागम्य वसिष्ठमिदमब्रुवन् । यथेष्टं तत् सुविहितं न किंचित् परिहीयते ॥ १८ ॥ यथोक्तं तत् करिष्यामो न किंचित् परिहास्यते ।
भावार्थ
तब वे सब लोग वसिष्ठजीसे मिलकर बोले—‘आपको जैसा अभीष्ट है, उसके अनुसार ही करनेके लिये अच्छी व्यवस्था की जायगी । कोई भी काम बिगड़ने नहीं पायेगा । आपने जैसा कहा है, हमलोग वैसा ही करेंगे । उसमें कोई त्रुटि नहीं आने देंगे’ ॥ १८½ ॥
ततः सुमन्त्रमाहूय वसिष्ठो वाक्यमब्रवीत् ॥१९॥ निमन्त्रयस्व नृपतीन् पृथिव्यां ये च धार्मिकाः । ब्राह्मणान् क्षत्रियान् वैश्याञ्शूद्रांश्चैव सहस्रशः॥२०॥ समानयस्व सत्कृत्य सर्वदेशेषु मानवान् । मिथिलाधिपतिं शूरं जनकं सत्यवादिनम् ॥ २१ ॥ तमानय महाभागं स्वयमेव सुसत्कृतम् । पूर्वं सम्बन्धिनं ज्ञात्वा ततः पूर्वं ब्रवीमि ते ॥ २२ ॥
भावार्थ
तदनन्तर वसिष्ठजीने सुमन्त्रको बुलाकर कहा—‘इस पृथ्वीपर जो-जो धार्मिक राजा, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और सहस्रों शूद्र हैं, उन सबको इस यज्ञमें आनेके लिये निमन्त्रित करो ॥ ‘सब देशोंके अच्छे लोगोंको सत्कारपूर्वक यहाँ ले आओ । मिथिलाके स्वामी शूरवीर महाभाग जनक सत्यवादी नरेश हैं । उनको अपना पुराना सम्बन्धी जानकर तुम स्वयं ही जाकर उन्हें बड़े आदर-सत्कारके साथ यहाँ ले आओ; इसीलिये पहले तुम्हें यह बात बता देता हूँ ॥ २१-२२ ॥
तथा काशिपतिं स्निग्धं सततं प्रियवादिनम् । सद्वृत्तं देवसंकाशं स्वयमेवानयस्व ह ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘इसी प्रकार काशीके राजा अपने स्नेही मित्र हैं और सदा प्रिय वचन बोलनेवाले हैं । वे सदाचारी तथा देवताओंके तुल्य तेजस्वी हैं; अतः उन्हें भी स्वयं ही जाकर ले आओ ॥२३॥
तथा केकयराजानं वृद्धं परमधार्मिकम् । श्वशुरं राजसिंहस्य सपुत्रं तमिहानय ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘केकयदेशके बूढ़े राजा बड़े धर्मात्मा हैं, वे राजसिंह महाराज दशरथके श्वशुर हैं; अतः उन्हें भी पुत्रसहित यहाँ ले आओ ॥ २४ ॥
अङ्गेश्वरं महेष्वासं रोमपादं सुसत्कृतम् । वयस्यं राजसिंहस्य सपुत्रं तमिहानय ॥ २५ ॥
भावार्थ
‘अङ्गदेशके स्वामी महाधनुर्धर राजा रोमपाद हमारे महाराजके मित्र हैं, अतः उन्हें पुत्रसहित यहाँ सत्कारपूर्वक ले आओ ॥ २५ ॥
तथा कोसलराजानं भानुमन्तं सुसत्कृतम् । मगधाधिपतिं शूरं सर्वशास्त्रविशारदम् ॥ २६ ॥ प्राप्तिज्ञं परमोदारं सत्कृतं पुरुषर्षभम् ।
भावार्थ
‘कोशलराज भानुमान्को भी सत्कारपूर्वक ले आओ । मगधदेशके राजा प्राप्तिज्ञको, जो शूरवीर, सर्वशास्त्रविशारद, परम उदार तथा पुरुषोंमें श्रेष्ठ हैं, स्वयं जाकर सत्कारपूर्वक बुला ले आओ ॥ २६½ ॥
राज्ञः शासनमादाय चोदयस्व नृपर्षभान् । प्राचीनान् सिन्धुसौवीरान् सौराष्ट्रेयांश्च पार्थिवान् ॥
भावार्थ
‘महाराजकी आज्ञा लेकर तुम पूर्वदेशके श्रेष्ठ नरेशोंको तथा सिन्धु-सौवीर एवं सुराष्ट्र देशके भूपालोंको यहाँ आनेके लिये निमन्त्रण दो ॥ २७ ॥
दाक्षिणात्यान् नरेन्द्रांश्च समस्तानानयस्व ह । सन्ति स्निग्धाश्च ये चान्ये राजानः पृथिवीतले ॥२८॥ तानानय यथा क्षिप्रं सानुगान् सहबान्धवान् । पतान् दूतैर्महाभागैरानयस्व नृपाज्ञया ॥ २९ ॥
भावार्थ
‘दक्षिण भारतके समस्त नरेशोंको भी आमन्त्रित करो । इस भूतलपर और भी जो-जो नरेश महाराजके प्रति स्नेह रखते हैं, उन सबको सेवकों और सगे-सम्बन्धियोंसहित यथा-सम्भव शीघ्र बुला लो । महाराजकी आज्ञासे बड़भागी दूतोंद्वारा इन सबके पास बुलावा भेज दो’ ॥ २८-२९ ॥
वसिष्ठवाक्यं तच्छ्रुत्वा सुमन्त्रस्त्वरितं तदा । व्यादिशत् पुरुषांस्तत्र राज्ञामानयने शुभान् ॥ ३० ॥
भावार्थ
वसिष्ठका यह वचन सुनकर सुमन्त्रने तुरंत ही अच्छे पुरुषोंको राजाओंकी बुलाहटके लिये जानेका आदेश दे दिया ॥ ३० ॥
स्वयमेव हि धर्मात्मा प्रयातो मुनिशासनात् । सुमन्त्रस्त्वरितो भूत्वा समानेतुं महामतिः ॥ ३१ ॥
भावार्थ
परम बुद्धिमान् धर्मात्मा सुमन्त्र वसिष्ठ मुनिकी आज्ञासे खास-खास राजाओंको बुलानेके लिये स्वयं ही गये ॥ ३१ ॥
ते च कर्मान्तिकाः सर्वे वसिष्ठाय महर्षये । सर्वे निवेदयन्ति स्म यज्ञे यदुपकल्पितम् ॥ ३२ ॥
भावार्थ
यज्ञकर्मकी व्यवस्थाके लिये जो सेवक नियुक्त किये गये थे, उन सबने आकर उस समयतक यज्ञसम्बन्धी जो-जो कार्य सम्पन्न हो गया था, उस सबकी सूचना महर्षि वसिष्ठको दी ॥ ३२ ॥
ततः प्रीतो द्विजश्रेष्ठस्तान् सर्वान् मुनिरब्रवीत् । अवज्ञया न दातव्यं कस्यचिल्लीलयापि वा ॥ ३३ ॥ अवज्ञया कृतं हन्याद् दातारं नात्र संशयः ।
भावार्थ
यह सुनकर वे द्विजश्रेष्ठ मुनि बड़े प्रसन्न हुए और उन सबसे बोले—‘भद्र पुरुषो ! किसीको जो कुछ देना हो, उसे अवहेलना या अनादरपूर्वक नहीं देना चाहिये; क्योंकि अनादरपूर्वक दिया हुआ दान दाताको नष्ट कर देता है— इसमें संशय नहीं है’ ॥ ३३½ ॥
ततः कैश्चिदहोरात्रैरुपयाता महीक्षितः ॥ ३४ ॥ बहूनि रत्नान्यादाय राज्ञो दशरथस्य ह ।
भावार्थ
तदनन्तर कुछ दिनोंके बाद राजा लोग महाराज दशरथके लिये बहुत-से रत्नोंकी भेंट लेकर अयोध्यामें आये ॥ ३४½ ॥
ततो वसिष्ठः सुप्रीतो राजानमिदमब्रवीत् ॥ ३५ ॥ उपयाता नरव्याघ्र राजानस्त्व शासनात् । मयापि सत्कृताः सर्वे यथार्हं राजसत्तम॥ ३६ ॥
भावार्थ
इससे वसिष्ठजीको बड़ी प्रसन्नता हुई । उन्होंने राजासे कहा—‘पुरुषसिंह ! तुम्हारी आज्ञासे राजालोग यहाँ आ गये । नृपश्रेष्ठ ! मैंने भी यथायोग्य उन सबका सत्कार किया है ॥ ३५-३६ ॥
यज्ञियं च कृतं सर्वं पुरुषैः सुसमाहितैः । निर्यातु च भवान् यष्टुं यज्ञायतनमन्तिकात् ॥ ३७ ॥
भावार्थ
‘हमारे कार्यकर्ताओंने पूर्णतः सावधान रहकर यज्ञके लिये सारी तैयारी की है । अब तुम भी यज्ञ करनेके लिये यज्ञमण्डपके समीप चलो ॥ ३७ ॥
सर्वकामैरुपहृतैरुपेतं वै समन्ततः । द्रष्टुमर्हसि राजेन्द्र मनसेव विनिर्मितम् ॥ ३८ ॥ तथा वसिष्ठवचनादृष्यशृङ्गस्य चोभयोः । दिवसे शुभनक्षत्रे निर्यातो जगतीपतिः ॥ ३९ ॥
भावार्थ
‘राजेन्द्र ! यज्ञमण्डपमें सब ओर सभी वाञ्छनीय वस्तुएँ एकत्र कर दी गयी हैं । आप स्वयं चलकर देखें । यह मण्डप इतना शीघ्र तैयार किया गया है, मानो मनके संकल्पसे ही बन गया हो’ मुनिवर वसिष्ठ तथा ऋष्यशृङ्ग दोनोंके आदेशसे शुभ नक्षत्रवाले दिनको राजा दशरथ यज्ञके लिये राजभवनसे निकले ॥ ३९ ॥
ततो वसिष्ठप्रमुखाः सर्वे एव द्विजोत्तमाः । ऋष्यशृङ्गं पुरस्कृत्य यज्ञकर्मारभंस्तदा ॥ ४० ॥ यज्ञवाटं गताः सर्वे यथाशास्त्रं यथाविधि । श्रीमांश्च सहपत्नीभी राजा दीक्षामुपाविशत् ॥ ४१ ॥
भावार्थ
तत्पश्चात् वसिष्ठ आदि सभी श्रेष्ठ द्विजोंने यज्ञमण्डपमें जाकर ऋष्यशृङ्गको आगे करके शास्त्रोक्त विधिके अनुसार यज्ञकर्मका आरम्भ किया । पत्नियोंसहित श्रीमान् अवध-नरेशने यज्ञकी दीक्षा ली ॥ ४०-४१ ॥
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