अयोध्याकाण्ड, सर्ग 98
निवेश्य सेनां तु विभुः पद्भ्यां पादवतां वरः । अभिगन्तुं स काकुत्स्थमियेष गुरुवर्तकम् ॥ १ ॥ निविष्टमात्रे सैन्ये तु यथोद्देशं विनीतवत् । भरतो भ्रातरं वाक्यं शत्रुघ्नमिदमब्रवीत् ॥ २ ॥
भावार्थ
इस प्रकार सेनाको ठहराकर जंगम प्राणियोंमें श्रेष्ठ एवं प्रभावशाली भरतने गुरुसेवापरायण ( एवं पिताके आज्ञापालक ) श्रीरामचन्द्रजीके पास जानेका विचार किया । जब सारी सेना विनीत भावसे यथास्थान ठहर गयी, तब भरतने अपने भाई शत्रुघ्नसे इस प्रकार कहा—॥ १-२ ॥
क्षिप्रं वनमिदं सौम्य नरसंघैः समन्ततः । लुब्धैश्च सहितैरेभिस्त्वमन्वेषितुमर्हसि ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘सौम्य ! बहुत-से मनुष्योंके साथ इन निषादोंको भी साथ लेकर तुम्हें शीघ्र ही इस वनमें चारों ओर श्रीरामचन्द्रजीकी खोज करनी चाहिये ॥ ३ ॥
गुहो ज्ञातिसहस्रेण शरचापासिपाणिना । समन्वेषतु काकुत्स्थावस्मिन् परिवृतः स्वयम् ॥४॥
भावार्थ
‘निषादराज गुह स्वयं भी धनुष-बाण और तलवार धारण करनेवाले अपने सहस्रों बन्धु-बान्धवोंसे घिरे हुए जायँ और इस वनमें ककुत्स्थवंशी श्रीराम और लक्ष्मणका अन्वेषण करें ॥ ४ ॥
अमात्यैः सह पौरैश्च गुरुभिश्च द्विजातिभिः । सह सर्वे चरिष्यामि पद्भ्यां परिवृतः स्वयम् ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘मैं स्वयं भी मन्त्रियों, पुरवासियों, गुरुजनों तथा ब्राह्मणोंके साथ उन सबसे घिरा रहकर पैदल ही सारे वनमें विचरण करूँगा ॥ ५ ॥
यावन्न रामं द्रक्ष्यामि लक्ष्मणं वा महाबलम् । वैदेहीं वा महाभागां न मे शान्तिर्भविष्यति ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘जबतक श्रीराम, महाबली लक्ष्मण अथवा महाभागा विदेहराजकुमारी सीताको न देख लूँगा, तबतक मुझे शान्ति नहीं मिलेगी ॥ ६ ॥
यावन्न चन्द्रसंकाशं तद् द्रक्ष्यामि शुभाननम् । भ्रातुः पद्मविशालाक्षं न मे शान्तिर्भविष्यति ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘जबतक अपने पूज्य भ्राता श्रीरामके कमलदलके सदृश विशाल नेत्रोंवाले सुन्दर मुखचन्द्रका दर्शन न कर लूँगा, तबतक मेरे मनको शान्ति नहीं प्राप्त होगी ॥ ७ ॥
सिद्धार्थः खलु सौमित्रिर्यश्चन्द्रविमलोपमम् । मुखं पश्यति रामस्य राजीवाक्षं महाद्युति ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘निश्चय ही सुमित्राकुमार लक्ष्मण कृतार्थ हो गये, जो श्रीरामचन्द्रजीके उस कमल-सदृश नेत्रवाले महातेजस्वी मुखका निरन्तर दर्शन करते हैं, जो चन्द्रमाके समान निर्मल एवं आह्लाद प्रदान करनेवाला है ॥ ८ ॥
यावन्न चरणौ भ्रातुः पार्थिवव्यञ्जनान्वितौ । शिरसा प्रग्रहीष्यामि न मे शान्तिर्भविष्यति ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘जबतक भाई श्रीरामके राजोचित लक्षणोंसे युक्त चरणारविन्दोंको अपने सिरपर नहीं रक्खूँगा, तबतक मुझे शान्ति नहीं मिलेगी ॥ ९ ॥
यावन्न राज्ये राज्यार्हः पितृपैतामहे स्थितः । अभिषिक्तो जलक्लिन्नो न मे शान्तिर्भविष्यति ।१०।
भावार्थ
‘जबतक राज्यके सच्चे अधिकारी आर्य श्रीराम पिता-पितामहोंके राज्यपर प्रतिष्ठित हो अभिषेकके जलसे आर्द्र नहीं हो जायँगे, तबतक मेरे मनको शान्ति नहीं प्राप्त होगी ॥ १० ॥
कृतकृत्या महाभागा वैदेही जनकात्मजा । भर्तारं सागरान्तायाः पृथिव्या यानुगच्छति ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘जो समुद्रपर्यन्त पृथ्वीके स्वामी अपने पतिदेव श्रीरामचन्द्रजीका अनुसरण करती हैं, वे जनककिशोरी विदेहराजनन्दिनी महाभागा सीता अपने इस सत्कर्मसे कृतार्थ हो गयीं ॥ ११ ॥
सुशुभश्चित्रकूटोऽसौ गिरिराजसमो गिरिः । यस्मिन् वसति काकुत्स्थः कुबेर इव नन्दने ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘जैसे नन्दनवनमें कुबेर निवास करते हैं, उसी प्रकार जिसके वनमें ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरामचन्द्रजी विराज रहे हैं, वह चित्रकूट परम मङ्गलकारी तथा गिरिराज हिमालय एवं वेंकटाचलके समान श्रेष्ठ पर्वत है ॥ १२ ॥
कृतकार्यमिदं दुर्गवनं ध्यालनिषेवितम् । यदध्यास्ते महाराजो रामः शस्त्रभृतां वरः ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘यह सर्वसेवित दुर्गम वन भी कृतार्थ हो गया, जहाँ शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ महाराज श्रीराम निवास करते हैं’ ॥ १३ ॥
एवमुक्त्वा महाबाहुर्भरतः पुरुषर्षभः । पद्भ्यामेव महातेजाः प्रविवेश महद् वनम् ॥ १४ ॥
भावार्थ
ऐसा कहकर महातेजस्वी पुरुषप्रवर महाबाहु भरतने उस विशाल वनमें पैदल ही प्रवेश किया ॥ १४ ॥
स तानि द्रुमजालानि जातानि गिरिसानुषु । पुष्पिताग्राणि मध्येन जगाम वदतां वरः ॥ १५ ॥
भावार्थ
वक्ताओंमें श्रेष्ठ भरत पर्वतशिखरोंपर उत्पन्न हुए वृक्षसमूहोंके, जिनकी शाखाओंके अग्रभाग फूलोंसे भरे थे, बीचसे निकले ॥ १५ ॥
स गिरेश्चित्रकूटस्य सालमारुह्य सत्वरम् । रामाश्रमगतस्याग्नेर्ददर्श ध्वजमुच्छ्रितम् ॥ १६ ॥
भावार्थ
आगे जाकर वे बड़ी तेजीसे चित्रकूटपर्वतके एक शालवृक्षपर चढ़ गये और वहाँसे उन्होंने श्रीरामचन्द्रजीके आश्रमपर सुलगती हुई आगका ऊपर उठता हुआ धुआँ देखा ॥ १६ ॥
तं दृष्ट्वा भरतः श्रीमान् मुमोद सहबान्धवः । अत्र राम इति ज्ञात्वा गतः पारमिवाम्भसः ॥ १७ ॥
भावार्थ
उस धूमको देखकर श्रीमान् भरतको अपने भाई शत्रुघ्नसहित बड़ी प्रसन्नता हुई और ‘यहीं श्रीराम हैं’ यह जानकर उन्हें अथाह जलसे पार हो जानेके समान संतोष प्राप्त हुआ ॥ १७ ॥
स चित्रकूटे तु गिरौ निशम्य रामाश्रमं पुण्यजनोपपन्नम् । गुहेन सार्धं त्वरितो जगाम पुनर्निवेद्यैव चमूं महात्मा ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘इस प्रकार चित्रकूट पर्वतपर पुण्यात्मा महर्षियोंसे युक्त श्रीरामचन्द्रजीका आश्रम देखकर महात्मा भरतने ढूँढ़नेके लिये आयी हुई सेनाको पुनः पूर्वस्थानपर ठहरा दिया और वे स्वयं गुहके साथ शीघ्रतापूर्वक आश्रमकी ओर चल दिये ॥ १८ ॥
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