अयोध्याकाण्ड, सर्ग 96
तां तदा दर्शयित्वा तु मैथिलीं गिरिनिम्नगाम् । निषसाद गिरिप्रस्थे सीतां मांसेन छन्दयन् ॥ १ ॥
भावार्थ
इस प्रकार मिथिलेशकुमारी सीताको मन्दाकिनी नदीका दर्शन कराकर उस समय श्रीरामचन्द्रजी पर्वतके समतल प्रदेशमें उनके साथ बैठ गये और तपस्वी-जनोंके उपभोगमें आने योग्य फल-मूलके गूदेसे उनकी मानसिक प्रसन्नताको बढ़ाने— उनका लालन करने लगे ॥ १ ॥
इदं मेध्यमिदं स्वादु निष्टप्तमिदमग्निना । एवमास्ते स धर्मात्मा सीतया सह राघवः ॥ २ ॥
भावार्थ
धर्मात्मा रघुनन्दन सीताजीके साथ इस प्रकारकी बातें कर रहे थे—‘प्रिये ! यह फल परम पवित्र है। यह बहुत स्वादिष्ट है तथा इस कन्दको अच्छी तरह आगपर सेंका गया है’ ॥ २ ॥
तथा तत्रासतस्तस्य भरतस्योपयायिनः । सैन्यरेणुश्च शब्दश्च प्रादुरास्तां नभस्पृशौ ॥ ३ ॥
भावार्थ
इस प्रकार वे उस पर्वतीय प्रदेशमें बैठे हुए ही थे कि उनके पास आनेवाली भरतकी सेनाकी धूल और कोलाहल दोनों एक साथ प्रकट हुए और आकाशमें फैलने लगे ॥ ३ ॥
एतस्मिन्नन्तरे त्रस्ताः शब्देन महता ततः । अर्दिता यूथपा मत्ताः सयूथाद् दुद्रुवुर्दिशः ॥ ४ ॥
भावार्थ
इसी बीचमें सेनाके महान् कोलाहलसे भयभीत एवं पीड़ित हो हाथियोंके कितने ही मतवाले यूथपति अपने यूथोंके साथ सम्पूर्ण दिशाओंमें भागने लगे ॥ ४ ॥
स तं सैन्यसमुद्भूतं शब्दं शुश्राव राघवः । तांश्च विप्रद्रुतान् सर्वान् यूथपानन्ववैक्षत ॥ ५ ॥ तांश्च विप्रद्रुतान् दृष्ट्वा तं च श्रुत्वा महास्वनम् । उवाच रामः सौमित्रिं लक्ष्मणं दीप्ततेजसम् ॥ ६ ॥
भावार्थ
श्रीरामचन्द्रजीने सेनासे प्रकट हुए उस महान् कोलाहलको सुना तथा भागे जाते हुए उन समस्त यूथपतियोंको भी देखा ॥ उन भागे हुए हाथियोंको देखकर और उस महाभयंकर शब्दको सुनकर श्रीरामचन्द्रजी उद्दीप्त तेजवाले सुमित्राकुमार लक्ष्मणसे बोले—॥ ६ ॥
हन्त लक्ष्मण पश्येह सुमित्रा सुप्रजास्त्वया । भीमस्तनितगम्भीरं तुमुलः श्रूयते स्वनः ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘लक्ष्मण ! इस जगत्में तुमसे ही माता सुमित्रा श्रेष्ठ पुत्रवाली हुई हैं । देखो तो सही—यह भयंकर गर्जनाके साथ कैसा गम्भीर तुमुल नाद सुनायी देता है ॥ ७ ॥
गजयूथानि वारण्ये महिषा वा महावने । वित्रासिता मृगाः सिंहैः सहसा प्रद्रुता दिशः ॥ ८ ॥ राजा वा राजपुत्रो वा मृगयामटते वने । अन्यद्वा श्वापदं किंचित् सौमित्रे ज्ञातुमर्हसि ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘सुमित्रानन्दन ! पता तो लगाओ, इस विशाल वनमें ये जो हाथियोंके झुंड अथवा भैंसे या मृग जो सहसा सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर भाग चले हैं, इसका क्या कारण है ? इन्हें सिंहोंने तो नहीं डरा दिया है अथवा कोई राजा या राजकुमार इस वनमें आकर शिकार तो नहीं खेल रहा है या दूसरा कोई हिंसक जन्तु तो नहीं प्रकट हो गया है ? ॥ ८-९ ॥
सुदुश्चरो गिरिश्चायं पक्षिणामपि लक्ष्मण । सर्वमेतद् यथातत्त्वमभिज्ञातुमिहार्हसि ॥ १० ॥
भावार्थ
‘लक्ष्मण ! इस पर्वतपर अपरिचित पक्षियोंका आना-जाना भी अत्यन्त कठिन है ( फिर यहाँ किसी हिंसक जन्तु वा राजाका आक्रमण कैसे सम्भव है ) । अतः इन सारी बातोंकी ठीक-ठीक जानकारी प्राप्त करो’ ॥ १० ॥
स लक्ष्मणः संत्वरितः सालमारुह्य पुष्पितम् । प्रेक्षमाणो दिशः सर्वाः पूर्वां दिशमवैक्षत ॥ ११ ॥ उदङ्मुखः प्रेक्षमाणो ददर्श महतीं चमूम् । गजाश्वरथसम्बाधां यत्तैर्युक्तां पदातिभिः ॥ १२ ॥
भावार्थ
भगवान् श्रीरामकी आज्ञा पाकर लक्ष्मण तुरंत ही फूलोंसे भरे हुए एक शाल-वृक्षपर चढ़ गये और सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर देखते हुए उन्होंने पूर्व दिशाकी ओर दृष्टिपात किया ॥ तत्पश्चात् उत्तरकी ओर मुँह करके देखनेपर उन्हें एक विशाल सेना दिखायी दी, जो हाथी, घोड़े और रथोंसे परिपूर्ण तथा प्रयत्नशील पैदल सैनिकोंसे संयुक्त थी ॥ १२ ॥
तामश्वरथसम्पूर्णां रथध्वजविभूषिताम् । शशंस सेनां रामाय वचनं चेदमब्रवीत् ॥ १३ ॥
भावार्थ
घोड़ों और रथोंसे भरी हुई तथा रथकी ध्वजासे विभूषित उस सेनाकी सूचना उन्होंने श्रीरामचन्द्रजीको दी और यह बात कही—॥ १३ ॥
अग्निं संशमयत्वार्यः सीता च भजतां गुहाम् । सज्यं कुरुष्व चापं च शरांश्च कवचं तथा ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘आर्य ! अब आप आग बुझा दें ( अन्यथा धुआँ देखकर यह सेना यहीं चली आयगी ); देवी सीता गुफामें जा बैठें । आप अपने धनुषपर प्रत्यञ्चा चढ़ा लें और बाण तथा कवच धारण कर लें’ ॥ १४ ॥
तं रामः पुरुषव्याघ्रो लक्ष्मणं प्रत्युवाच ह । अङ्गावेक्षस्व सौमित्रे कस्येमां मन्यसे चमूम् ॥ १५ ॥
भावार्थ
यह सुनकर पुरुषसिंह श्रीरामने लक्ष्मणसे कहा—‘प्रिय सुमित्राकुमार ! अच्छी तरह देखो तो सही, तुम्हारी समझमें यह किसकी सेना हो सकती है ?’ ॥ १५ ॥
एवमुक्तस्तु रामेण लक्ष्मणो वाक्यमब्रवीत् । दिधक्षन्निव तां सेनां रुषितः पावको यथा ॥ १६ ॥
भावार्थ
श्रीरामके ऐसा कहनेपर लक्ष्मण रोषसे प्रज्वलित हुए अग्निदेवकी भाँति उस सेनाकी ओर इस तरह देखने लगे, मानो उसे जलाकर भस्म कर देना चाहते हों और इस प्रकार बोले—॥ १६ ॥
सम्पन्नं राज्यमिच्छंस्तु व्यक्तं प्राप्याभिषेचनम् । आवां हन्तुं समभ्येति कैकेय्या भरतः सुतः ॥ १७ ॥ एष वै सुमहाञ्छ्रीमान् विटपी सम्प्रकाशते । विराजत्युज्ज्वलस्कन्धः कोविदारध्वजो रथे ॥ १८ ॥ भजन्त्येते यथाकाममश्वानारुह्य शीघ्रगान् । एते भ्राजन्ति संहृष्टा गजानारुह्य सादिनः ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘भैया ! निश्चय ही यह कैकेयीका पुत्र भरत है, जो अयोध्यामें अभिषिक्त होकर अपने राज्यको निष्कण्टक बनानेकी इच्छासे हम दोनोंको मार डालनेके लिये यहाँ आ रहा है॥ ‘सामनेकी ओर यह जो बहुत बड़ा शोभासम्पन्न वृक्ष दिखायी देता है, उसके समीप जो रथ है, उसपर उज्ज्वल तनेसे युक्त कोविदार वृक्षसे चिह्नित ध्वज शोभा पा रहा है ॥ ‘ये घुड़सवार सैनिक इच्छानुसार शीघ्रगामी घोड़ोंपर आरूढ़ हो इधर ही आ रहे हैं और ये हाथीसवार भी बड़े हर्षसे हाथियोंपर चढ़कर आते हुए प्रकाशित हो रहे हैं॥१९॥
गृहीतधनुषावावां गिरिं वीर श्रयावहे । अथवेहैव तिष्ठावः संनद्धावुद्यतायुधौ ॥ २० ॥
भावार्थ
‘वीर ! हम दोनोंको धनुष लेकर पर्वतके शिखरपर चलना चाहिये अथवा कवच बाँधकर अस्त्र-शस्त्र धारण किये यहीं डटे रहना चाहिये ॥ २० ॥
अपि नौ वशमागच्छेत् कोविदारध्वजो रणे । अपि द्रक्ष्यामि भरतं यत्कृते व्यसनं महत् ॥ २१ ॥ त्वया राघव सम्प्राप्तं सीतया च मया तथा । यन्निमित्तं भवान् राज्याच्च्युतो राघव शाश्वतात् ॥ सम्प्राप्तोऽयमरिर्वीर भरतो वध्य एव हि। भरतस्य वधे दोषं नाहं पश्यामि राघव ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘रघुनन्दन ! आज यह कोविदारके चिह्नसे युक्त ध्वज-वाला रथ रणभूमिमें हम दोनोंके अधिकारमें आ जायगा और आज मैं अपनी इच्छाके अनुसार उस भरतको भी सामने देखूँगा कि जिसके कारण आपको, सीताको और मुझे भी महान् संकटका सामना करना पड़ा है तथा जिसके कारण आप अपने सनातन राज्याधिकारसे वञ्चित किये गये हैं ॥ ‘वीर रघुनाथजी ! यह भरत हमारा शत्रु है और सामने आ गया है; अतः वधके ही योग्य है । भरतका वध करनेमें मुझे कोई दोष नहीं दिखायी देता ॥ २३ ॥
पूर्वोपकारिणं हत्वा न ह्यधर्मेण युज्यते । पूर्वोपकारी भरतस्त्यागेऽधर्मश्च राघव ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘रघुनन्दन ! जो पहलेका अपकारी रहा हो, उसको मारकर कोई अधर्मका भागी नहीं होता है । भरतने पहले हमलोगोंका अपकार किया है, अतः उसे मारनेमें नहीं, जीवित छोड़ देनेमें ही अधर्म है ॥ २४ ॥
एतस्मिन् निहते कृत्स्नामनुशाधि वसुंधराम् । अद्य पुत्रं हतं संख्ये कैकेयी राज्यकामुका ॥ २५ ॥ मया पश्येत् सुदुःखार्ता हस्तिभिन्नमिव द्रुमम् ।
भावार्थ
‘इस भरतके मारे जानेपर आप समस्त वसुधाका शासन करें । जैसे हाथी किसी वृक्षको तोड़ डालता है, उसी प्रकार राज्यका लोभ करनेवाली कैकेयी आज अत्यन्त दुःखसे आर्त हो इसे मेरे द्वारा युद्धमें मारा गया देखे ॥ २५½ ॥
कैकेयीं च वधिष्यामि सानुबन्धां सबान्धवाम् ॥ २६ ॥ कलुषेणाद्य महता मेदिनी परिमुच्यताम् ।
भावार्थ
‘मैं कैकेयीका भी उसके सगे-सम्बन्धियों एवं बन्धु-बान्धवोंसहित वध कर डालूँगा । आज यह पृथ्वी कैकेयीरूप महान् पापसे मुक्त हो जाय ॥ २६½ ॥
अद्येमं संयतं क्रोधमसत्कारं च मानद ॥ २७ ॥ मोक्ष्यामि शत्रुसैन्येषु कक्षेष्विव हुताशनम् ।
भावार्थ
‘मानद ! आज मैं अपने रोके हुए क्रोध और तिरस्कार-को शत्रुकी सेनाओंपर उसी प्रकार छोड़ूँगा, जैसे सूखे घास-फूँसके ढेरमें आग लगा दी जाय ॥ २७½ ॥
अद्यैव चित्रकूटस्य काननं निशितैः शरैः ॥ २८ ॥ छिन्दञ्छत्रुशरीराणि करिष्ये शोणितोक्षितम् । शरैर्निर्भिन्नहृदयान् कुञ्जरांस्तुरगांस्तथा ॥ २९ ॥ श्वापदाः परिकर्षन्तु नरांश्च निहतान् मया ।
भावार्थ
‘अपने तीखे बाणोंसे शत्रुओंके शरीरोंके टुकड़े-टुकड़े करके मैं अभी चित्रकूटके इस वनको रक्तसे सींच दूँगा ॥ ‘मेरे बाणोंसे विदीर्ण हुए हृदयवाले हाथियों और घोड़ोंको तथा मेरे हाथसे मारे गये मनुष्योंको भी गीदड़ आदि मांसभक्षी जन्तु इधर-उधर घसीटें ॥ २९½ ॥
शराणां धनुषश्चाहमनृणोऽस्मिन् महावने । ससैन्यं भरतं हत्वा भविष्यामि न संशयः ॥ ३० ॥
भावार्थ
‘इस महान् वनमें सेनासहित भरतका वध करके मैं धनुष और बाणके ऋणसे उऋण हो जाऊँगा—इसमें संशय नहीं है’ ॥ ३० ॥
गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें