अयोध्याकाण्ड, सर्ग 93
तया महत्या यायिन्या ध्वजिन्या वनवासिनः। अर्दिता यूथपा मत्ताः सयूथाः सम्प्रदुद्रुवुः ॥ १ ॥
भावार्थ
यात्रा करनेवाली उस विशाल वाहिनीसे पीड़ित हो वनवासी यूथपति मतवाले हाथी आदि अपने यूथोंके साथ भाग चले ॥ १ ॥
ऋक्षाः पृषतमुख्याश्च रुरवश्च समन्ततः। दृश्यन्ते वनवाटेषु गिरिष्वपि नदीषु च ॥ २ ॥
भावार्थ
रीछ, चितकबरे मृग तथा रुरु नामक मृग वनप्रदेशोंमें, पर्वतोंमें और नदियोंके तटोंपर चारों ओर उस सेनासे पीड़ित दिखायी देते थे ॥ २ ॥
स सम्प्रतस्थे धर्मात्मा प्रीतो दशरथात्मजः। वृतो महत्या नादिन्या सेनया चतुरङ्गया ॥ ३ ॥
भावार्थ
महान् कोलाहल करनेवाली उस विशाल चतुरंगिणी सेनासे घिरे हुए धर्मात्मा दशरथनन्दन भरत बड़ी प्रसन्नताके साथ यात्रा कर रहे थे ॥ ३ ॥
सागरौघनिभा सेना भरतस्य महात्मनः। महीं संछादयामास प्रावृषि द्यामिवाम्बुदः ॥ ४ ॥
भावार्थ
जैसे वर्षा-ऋतुमें मेघोंकी घटा आकाशको ढक लेती है, उसी प्रकार महात्मा भरतकी समुद्र-जैसी उस विशाल सेनाने दूरतकके भूभागको आच्छादित कर लिया था ॥ ४ ॥
तुरंगौघैरवतता वारणैश्च महाबलैः। अनालक्ष्या चिरं कालं तस्मिन् काले बभूव सा ॥ ५ ॥
भावार्थ
घोड़ोंके समूहों तथा महाबली हाथियोंसे भरी और दूरतक फैली हुई वह सेना उस समय बहुत देरतक दृष्टिमें ही नहीं आती थी ॥ ५ ॥
स गत्वा दूरमध्वानं सम्परिश्रान्तवाहनः। उवाच वचनं श्रीमान् वसिष्ठं मन्त्रिणां वरम् ॥ ६ ॥
भावार्थ
दूरतकका रास्ता तै कर लेनेपर जब भरतकी सवारियाँ बहुत थक गयीं, तब श्रीमान् भरतने मन्त्रियोंमें श्रेष्ठ वसिष्ठजीसे कहा—॥ ६ ॥
यादृशं लक्ष्यते रूपं यथा चैव मया श्रुतम् । व्यक्तं प्राप्ताः स्म तं देशं भरद्वाजो यमब्रवीत् ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘ब्रह्मन् ! मैंने जैसा सुन रखा था और जैसा इस देशका स्वरूप दिखायी देता है, इससे स्पष्ट जान पड़ता है कि भरद्वाजजीने जहाँ पहुँचनेका आदेश दिया था, उस देशमें हमलोग आ पहुँचे हैं ॥ ७ ॥
अयं गिरिश्चित्रकूटस्तथा मन्दाकिनी नदी । एतत् प्रकाशते दूरान्नीलमेघनिभं वनम् ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘जान पड़ता है यही चित्रकूट पर्वत है तथा वह मन्दाकिनी नदी बह रही है । यह पर्वतके आस-पासका वन दूरसे नील मेघके समान प्रकाशित हो रहा है ॥ ८ ॥
गिरेः सानूनि रम्याणि चित्रकूटस्य सम्प्रति । वारणैरवमृद्यन्ते मामकैः पर्वतोपमैः ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘इस समय मेरे पर्वताकार हाथी चित्रकूटके रमणीय शिखरोंका अवमर्दन कर रहे हैं ॥ ९ ॥
मुञ्चन्ति कुसुमान्येते नगाः पर्वतसानुषु । नीला इवातपापाये तोयं तोयधरा घनाः ॥ १० ॥
भावार्थ
‘ये वृक्ष पर्वतशिखरोंपर उसी प्रकार फूलोंकी वर्षा कर रहे हैं, जैसे वर्षाकालमें नील जलधर मेघ उनपर जलकी वृष्टि करते हैं’ ॥ १० ॥
किंनराचरितं देशं पश्य शत्रुघ्न पर्वते । हयैः समन्तादाकीर्णं मकरैरिव सागरम् ॥ ११ ॥
भावार्थ
( इसके बाद भरत शत्रुघ्नसे कहने लगे—) ‘शत्रुघ्न ! देखो, इस पर्वतकी उपत्यकामें जो देश है, जहाँपर किन्नर विचरा करते हैं, वही प्रदेश हमारी सेनाके घोड़ोंसे व्याप्त होकर मगरोंसे भरे हुए समुद्रके समान प्रतीत होता है ॥ ११ ॥
एते मृगगणा भान्ति शीघ्रवेगाः प्रचोदिताः । वायुप्रविद्धाः शरदि मेघजाला इवाम्बरे ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘सैनिकोंके खदेड़े हुए ये मृगोंके झुंड तीव्र वेगसे भागते हुए वैसी ही शोभा पा रहे हैं, जैसे शरत्-कालके आकाशमें हवासे उड़ाये गये बादलोंके समूह सुशोभित होते हैं ॥ १२ ॥
कुर्वन्ति कुसुमापीडाञ्छिरःसु सुरमीनमी । मेघप्रकाशैः फलकैर्दाक्षिणात्या नरा यथा ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘ये सैनिक अथवा वृक्ष मेघके समान कान्तिवाली ढालोंसे उपलक्षित होनेवाले दक्षिण भारतीय मनुष्योंके समान अपने मस्तकों अथवा शाखाओंपर सुगन्धित पुष्प-गुच्छमय आभूषणोंको धारण करते हैं ॥ १३ ॥
निष्कूजमिव भूत्वेदं वनं घोरप्रदर्शनम् । अयोध्येव जनाकीर्णा सम्प्रति प्रतिभाति मे ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘यह वन जो पहले जनरव-शून्य होनेके कारण अत्यन्त भयंकर दिखायी देता था, वही इस समय हमारे साथ आये हुए लोगोंसे व्याप्त होनेके कारण मुझे अयोध्या पुरीके समान प्रतीत होता है ॥ १४ ॥
खुरैरुदीरितो रेणुर्दिवं प्रच्छाद्य तिष्ठति । तं वहत्यनिलः शीघ्रं कुर्वन्निव मम प्रियम् ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘घोड़ोंकी टापोंसे उड़ी हुई धूल आकाशको आच्छादित करके स्थित होती है, परंतु उसे हवा मेरा प्रिय करती हुई-सी शीघ्र ही अन्यत्र उड़ा ले जाती है ॥ १५ ॥
स्यन्दनांस्तुरगोपेतान् सूतमुख्यैरधिष्ठितान् । एतान् सम्पततः शीघ्रं पश्य शत्रुघ्न कानने ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘शत्रुघ्न ! देखो, इस वनमें घोड़ोंसे जुते हुए और श्रेष्ठ सारथियोंद्वारा संचालित हुए ये रथ कितनी शीघ्रतासे आगे बढ़ रहे हैं ॥ १६ ॥
एतान् वित्रासितान् पश्य बर्हिणः प्रियदर्शनान् । एवमापततः शैलमधिवासं पतत्रिणः ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘जो देखनेमें बड़े प्यारे लगते हैं उन मोरोंको तो देखो । ये हमारे सैनिकोंके भयसे कितने डरे हुए हैं । इसी प्रकार अपने आवास-स्थान पर्वतकी ओर उड़ते हुए अन्य पक्षियोंपर भी दृष्टिपात करो ॥ १७ ॥
अतिमात्रमयं देशो मनोज्ञः प्रतिभाति मे । तापसानां निवासोऽयं व्यक्तं स्वर्गपथोऽनघ ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘निष्पाप शत्रुघ्न ! यह देश मुझे बड़ा ही मनोहर प्रतीत होता है । तपस्वी जनोंका यह निवासस्थान वास्तवमें स्वर्गीय पथ है ॥ १८ ॥
मृगा मृगीभिः सहिता बहवः पृषता वने । मनोज्ञरूपा लक्ष्यन्ते कुसुमैरिव चित्रिताः ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘इस वनमें मृगियोंके साथ विचरनेवाले बहुत-से चितकबरे मृग ऐसे मनोहर दिखायी देते हैं, मानो इन्हें फूलोंसे चित्रित—सुसज्जित किया गया हो ॥ १९ ॥
साधु सैन्याः प्रतिष्ठन्तां विचिन्वन्तु च काननम् । यथा तौ पुरुषव्याघ्रौ दृश्येते रामलक्ष्मणौ ॥ २० ॥
भावार्थ
‘मेरे सैनिक यथोचित रूपसे आगे बढ़ें और वनमें सब ओर खोजें, जिससे उन दोनों पुरुषसिंह श्रीराम और लक्ष्मणका पता लग जाय’ ॥ २० ॥
भरतस्य वचः श्रुत्वा पुरुषाः शस्त्रपाणयः। विविशुस्तद्वनं शूरा धूमाग्रं ददृशुस्ततः ॥ २१ ॥
भावार्थ
भरतका यह वचन सुनकर बहुत-से शूरवीर पुरुषोंने हाथोंमें हथियार लेकर उस वनमें प्रवेश किया । तदनन्तर आगे जानेपर उन्हें कुछ दूरपर ऊपरको धुआँ उठता दिखायी दिया ॥ २१ ॥
ते समालोक्य धूमाग्रमूचुर्भरतमागताः। नामनुष्ये भवत्यग्निर्व्यक्तमत्रैव राघवौ ॥ २२ ॥
भावार्थ
उस धूमशिखाको देखकर वे लौट आये और भरतसे बोले—‘प्रभो ! जहाँ कोई मनुष्य नहीं होता, वहाँ आग नहीं होती। अतः श्रीराम और लक्ष्मण अवश्य यहीं होंगे ॥ २२ ॥
अथ नात्र नरव्याघ्रौ राजपुत्रौ परंतपौ। अन्ये रामोपमाः सन्ति व्यक्तमत्र तपस्विनः ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘यदि शत्रुओंको संताप देनेवाले पुरुषसिंह राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मण यहाँ न हों तो भी श्रीराम-जैसे तेजस्वी दूसरे कोई तपस्वी तो अवश्य ही होंगे’ ॥ २३ ॥
तच्छ्रुत्वा भरतस्तेषां वचनं साधुसम्मतम्। सैन्यानुवाच सर्वांस्तानमित्रबलमर्दनः ॥ २४ ॥
भावार्थ
उनकी बातें श्रेष्ठ पुरुषोंद्वारा मानने योग्य थीं, उन्हें सुनकर शत्रुसेनाका मर्दन करनेवाले भरतने उन समस्त सैनिकोंसे कहा— ॥ २४ ॥
यत्ता भवन्तस्तिष्ठन्तु नेतो गन्तव्यमग्रतः। अहमेव गमिष्यामि सुमन्त्रो धृतिरेव च ॥ २५ ॥
भावार्थ
‘तुम सब लोग सावधान होकर यहीं ठहरो ! यहाँसे आगे न जाना । अब मैं ही वहाँ जाऊँगा । मेरे साथ सुमन्त्र और धृति भी रहेंगे’ ॥ २५ ॥
एवमुक्तास्ततः सैन्यास्तत्र तस्थुः समन्ततः। भरतो यत्र धूमाग्रं तत्र दृष्टिं समादधत् ॥ २६ ॥
भावार्थ
उनकी ऐसी आज्ञा पाकर समस्त सैनिक वहीं सब ओर फैलकर खड़े हो गये और भरतने जहाँ धुआँ उठ रहा था, उस ओर अपनी दृष्टि स्थिर की ॥ २६ ॥
व्यवस्थिता या भरतेन सा चमू- र्निरीक्षमाणापि च भूमिमग्रतः। बभूव हृष्टा नचिरेण जानती प्रियस्य रामस्य समागमं तदा ॥ २७ ॥
भावार्थ
भरतके द्वारा वहाँ ठहरायी गयी वह सेना आगेकी भूमिका निरीक्षण करती हुई भी वहाँ हर्षपूर्वक खड़ी रही; क्योंकि उस समय उसे मालूम हो गया था कि अब शीघ्र ही श्रीरामचन्द्रजीसे मिलनेका अवसर आनेवाला है ॥२७॥
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