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अयोध्याकाण्ड, सर्ग 82

तामार्यगणसम्पूर्णां भरतः प्रग्रहां सभाम् । ददर्श बुद्धिसम्पन्नः पूर्णचन्द्रां निशामिव ॥ १ ॥

भावार्थ

बुद्धिमान् भरतने उत्तम ग्रह-नक्षत्रोंसे सुशोभित और पूर्ण चन्द्रमण्डलसे प्रकाशित रात्रिकी भाँति उस सभाको देखा । वह श्रेष्ठ पुरुषोंकी मण्डलीसे भरी-पूरी तथा वसिष्ठ आदि श्रेष्ठ मुनियोंकी उपस्थितिसे शोभायमान थी ॥ १ ॥

आसनानि यथान्यायमार्याणां विशतां तदा । वस्त्राङ्गरागप्रभया द्योतिता सा सभोत्तमा ॥ २ ॥

भावार्थ

उस समय यथायोग्य आसनोंपर बैठे हुए आर्य पुरुषोंके वस्त्रों तथा अङ्गरागोंकी प्रभासे वह उत्तम सभा अधिक दीप्तिमती हो उठी थी ॥ २ ॥

सा विद्वज्जनसम्पूर्णा सभा सुरुचिरा तथा । अदृश्यत घनापाये पूर्णचन्द्रेव शर्वरी ॥ ३ ॥

भावार्थ

जैसे वर्षाकाल व्यतीत होनेपर शरद्ऋतुकी पूर्णिमाको पूर्ण चन्द्रमण्डलसे अलंकृत रजनी बड़ी मनोहर दिखायी देती है, उसी प्रकार विद्वानोंके समुदायसे भरी हुई वह सभा बड़ी सुन्दर दिखायी देती थी ॥ ३ ॥

राज्ञस्तु प्रकृतीः सर्वाः स सम्प्रेक्ष्य च धर्मवित् । इदं पुरोहितो वाक्यं भरतं मृदु चाब्रवीत् ॥ ४ ॥

भावार्थ

उस समय धर्मके ज्ञाता पुरोहित वसिष्ठजीने राजाकी सम्पूर्ण प्रकृतियोंको उपस्थित देख भरतसे यह मधुर वचन कहा—॥ ४ ॥

तात राजा दशरथः स्वर्गतो धर्ममाचरन् । धनधान्यवतीं स्फीतां प्रदाय पृथिवीं तव ॥ ५ ॥

भावार्थ

‘तात ! राजा दशरथ यह धन-धान्यसे परिपूर्ण समृद्धिशालिनी पृथिवी तुम्हें देकर स्वयं धर्मका आचरण करते हुए स्वर्गवासी हुए हैं ॥ ५ ॥

रामस्तथा सत्यवृत्तिः सतां धर्ममनुस्मरन् । नाजहात् पितुरादेशं शशी ज्योत्स्नामिवोदितः ॥ ६ ॥

भावार्थ

‘सत्यपूर्ण बर्ताव करनेवाले श्रीरामचन्द्रजीने सत्पुरुषोंके धर्मका विचार करके पिताकी आज्ञाका उसी प्रकार उल्लङ्घन नहीं किया, जैसे उदित चन्द्रमा अपनी चाँदनीको नहीं छोड़ता है ॥ ६ ॥

पित्रा भ्रात्रा च ते दत्तं राज्यं निहतकण्टकम् । तद् भुङ्क्ष्व मुदितामात्यः क्षिप्रमेवाभिषेचय ॥ ७ ॥ उदीच्याश्च प्रतीच्याश्च दाक्षिणात्याश्च केवलाः । कोट्यापरान्ताः सामुद्रा रत्नान्युपहरन्तु ते ॥ ८ ॥

भावार्थ

‘इस प्रकार पिता और ज्येष्ठ भ्राता—दोनोंने ही तुम्हें यह अकण्टक राज्य प्रदान किया है। अतः तुम मन्त्रियोंको प्रसन्न रखते हुए इसका पालन करो और शीघ्र ही अपना अभिषेक करा लो । जिससे उत्तर, पश्चिम, दक्षिण, पूर्व और अपरान्त देशके निवासी राजा तथा समुद्रमें जहाजोंद्वारा व्यापार करनेवाले व्यवसायी तुम्हें असंख्य रत्न प्रदान करें’ ॥ ७-८ ॥

तच्छ्रुत्वा भरतो वाक्यं शोकेनाभिपरिप्लुतः । जगाम मनसा रामं धर्मज्ञो धर्मकाङ्क्षया ॥ ९ ॥ सबाष्पकलया वाचा कलहंसस्वरो युवा । विललाप सभामध्ये जगर्हे च पुरोहितम् ॥ १० ॥

भावार्थ

यह बात सुनकर धर्मज्ञ भरत शोकमें डूब गये और धर्मपालनकी इच्छासे उन्होंने मन-ही-मन श्रीरामकी शरण ली ॥ नवयुवक भरत उस भरी सभामें आँसू बहाते हुए गद्गद वाणीद्वारा कलहंसके समान मधुर स्वरसे विलाप करने और पुरोहितजीको उपालम्भ देने लगे—॥ १० ॥

चरितब्रह्मचर्यस्य विद्यास्नातस्य धीमतः । धर्मे प्रयतमानस्य को राज्यं मद्विधो हरेत् ॥ ११ ॥

भावार्थ

‘गुरुदेव ! जिन्होंने ब्रह्मचर्यका पालन किया, जो सम्पूर्ण विद्याओंमें निष्णात हुए तथा जो सदा ही धर्मके लिये प्रयत्नशील रहते हैं, उन बुद्धिमान् श्रीरामचन्द्रजीके राज्यका मेरे-जैसा कौन मनुष्य अपहरण कर सकता है ? ॥ ११ ॥

कथं दशरथाज्जातो भवेद् राज्यापहारकः । राज्यं चाहं च रामस्य धर्मं वक्तुमिहार्हसि ॥ १२ ॥

भावार्थ

‘महाराज दशरथका कोई भी पुत्र बड़े भाईके राज्यका अपहरण कैसे कर सकता है ? यह राज्य और मैं दोनों ही श्रीरामके हैं; यह समझकर आपको इस सभामें धर्मसंगत बात कहनी चाहिये ( अन्याययुक्त नहीं ) ॥ १२ ॥

ज्येष्ठः श्रेष्ठश्च धर्मात्मा दिलीपनहुषोपमः । लब्धुमर्हति काकुत्स्थो राज्यं दशरथो यथा ॥ १३ ॥

भावार्थ

‘धर्मात्मा श्रीराम मुझसे अवस्थामें बड़े और गुणोंमें भी श्रेष्ठ हैं । वे दिलीप और नहुषके समान तेजस्वी हैं; अतः महाराज दशरथकी भाँति वे ही इस राज्यको पानेके अधिकारी हैं ॥ १३ ॥

अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यं कुर्यां पापमहं यदि । इक्ष्वाकूणामहं लोके भवेयं कुलपांसनः ॥ १४ ॥

भावार्थ

‘पापका आचरण तो नीच पुरुष करते हैं । वह मनुष्यको निश्चय ही नरकमें डालनेवाला है । यदि श्रीरामचन्द्रजीका राज्य लेकर मैं भी पापाचरण करूँ तो संसारमें इक्ष्वाकुकुलका कलंक समझा जाऊँगा ॥ १४ ॥

यद्द्भि मात्रा कृतं पापं नाहं तदपि रोचये । इहस्थो वनदुर्गस्थं नमस्यामि कृताञ्जलिः ॥१५॥ राममेवानुगच्छामि स राजा द्विपदां वरः । त्रयाणामपि लोकानां राघवो राज्यमर्हति ॥१६॥

भावार्थ

‘मेरी माताने जो पाप किया है, उसे मैं कभी पसंद नहीं करता; इसलिये यहाँ रहकर भी मैं दुर्गम वनमें निवास करनेवाले श्रीरामचन्द्रजीको हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ ॥ ‘मैं श्रीरामका ही अनुसरण करूँगा । मनुष्योंमें श्रेष्ठ श्रीरघुनाथजी ही इस राज्यके राजा हैं । वे तीनों ही लोकोंके राजा होने योग्य हैं’ ॥ १६ ॥

तद्वाक्यं धर्मसंयुक्तं श्रुत्वा सर्वे सभासदः । हर्षान्मुमुचुरश्रूणि रामे निहितचेतसः ॥ १७ ॥

भावार्थ

भरतका वह धर्मयुक्त वचन सुनकर सभी सभासद् श्रीराममें चित्त लगाकर हर्षके आँसू बहाने लगे ॥ १७ ॥

यदि त्वार्ये न शक्यामि विनिवर्तयितुं वनात् । वने तत्रैव वत्स्यामि यथार्यो लक्ष्मणस्तथा ॥ १८ ॥

भावार्थ

भरतने फिर कहा—‘यदि मैं आर्य श्रीरामको वनसे न लौटा सकूँगा तो स्वयं भी नरश्रेष्ठ लक्ष्मणकी भाँति वहीं निवास करूँगा ॥ १८ ॥

सर्वोपायं तु वर्तिष्ये विनिवर्तयितुं बलात् । समक्षमार्यमिश्राणां साधूनां गुणवर्तिनाम् ॥ १९ ॥

भावार्थ

‘मैं आप सभी सद्गुणयुक्त बर्ताव करनेवाले पूजनीय श्रेष्ठ सभासदोंके समक्ष श्रीरामचन्द्रजीको बलपूर्वक लौटा लानेके लिये सारे उपायोंसे चेष्टा करूँगा ॥ १९ ॥

विष्टिकर्मान्तिकाः सर्वे मार्गशोधकदक्षकाः । प्रस्थापिता मया पूर्वं यात्रा च मम रोचते ॥ २० ॥ एवमुक्त्वा तु धर्मात्मा भरतो भ्रातृवत्सलः । समीपस्थमुवाचेदं सुमन्त्रं मन्त्रकोविदम् ॥ २१ ॥

भावार्थ

‘मैंने मार्गशोधनमें कुशल सभी अवैतनिक तथा वेतनभोगी कार्यकर्ताओंको पहले ही यहाँसे भेज दिया है । अतः मुझे श्रीरामचन्द्रजीके पास चलना ही अच्छा जान पड़ता है’ ॥ सभासदोंसे ऐसा कहकर भ्रातृवत्सल धर्मात्मा भरत पास बैठे हुए मन्त्रवेत्ता सुमन्त्रसे इस प्रकार बोले—॥ २१ ॥

तूर्णमुत्थाय गच्छ त्वं सुमन्त्र मम शासनात् । यात्रामाज्ञापय क्षिप्रं बलं चैव समानय ॥ २२ ॥

भावार्थ

‘सुमन्त्रजी ! आप जल्दी उठकर जाइये और मेरी आज्ञासे सबको वनमें चलनेका आदेश सूचित कर दीजिये और सेनाको भी शीघ्र ही बुला भेजिये’ ॥ २२ ॥

एवमुक्तः सुमन्त्रस्तु भरतेन महात्मना । प्रहृष्टः सोऽदिशत् सर्वं यथासंदिष्टमिष्टवत् ॥ २३ ॥

भावार्थ

महात्मा भरतके ऐसा कहनेपर सुमन्त्रने बड़े हर्षके साथ सबको उनके कथनानुसार वह प्रिय संदेश सुना दिया ॥२३॥

ताः प्रहृष्टाः प्रकृतयो बलाध्यक्षा बलस्य च । श्रुत्वा यात्रां समाज्ञप्तां राघवस्य निवर्तने ॥ २४ ॥

भावार्थ

‘श्रीरामचन्द्रजीको लौटा लानेके लिये भरत जायँगे और उनके साथ जानेके लिये सेनाको भी आदेश प्राप्त हुआ है’— यह समाचार सुनकर वे सभी प्रजाजन तथा सेनापतिगण बहुत प्रसन्न हुए ॥ २४ ॥

ततो योधाङ्गनाः सर्वा भर्तॄन् सर्वान् गृहे गृहे । यात्रागमनमाज्ञाय त्वरयन्ति स्म हर्षिताः ॥ २५ ॥

भावार्थ

तदनन्तर उस यात्राका समाचार पाकर सैनिकोंकी सभी स्त्रियाँ घर-घरमें हर्षसे खिल उठीं और अपने पतियोंको जल्दी तैयार होनेके लिये प्रेरित करने लगीं ॥ २५ ॥

ते हयैर्गोरथैः शीघ्रं स्यन्दनैश्च मनोजवैः । सह योषिद्बलाध्यक्षा बलं सर्वमचोदयन् ॥ २६ ॥

भावार्थ

सेनापतियोंने घोड़ों, बैलगाड़ियों तथा मनके समान वेगशाली रथोंसहित सम्पूर्ण सेनाको स्त्रियोंसहित यात्राके लिये शीघ्र तैयार होनेकी आज्ञा दी ॥ २६ ॥

सज्जं तु तद् बलं दृष्ट्वा भरतो गुरुसंनिधौ । रथं मे त्वरयस्वेति सुमन्त्रं पार्श्वतोऽब्रवीत् ॥ २७ ॥

भावार्थ

सेनाको कूँचके लिये उद्यत देख भरतने गुरुके समीप ही बगलमें खड़े हुए सुमन्त्रसे कहा—‘आप मेरे रथको शीघ्र तैयार करके लाइये’ ॥ २७ ॥

भरतस्य तु तस्याज्ञां परिगृह्य प्रहर्षितः । रथं गृहीत्वोपययौ युक्तं परमवाजिभिः ॥ २८ ॥

भावार्थ

भरतकी उस आज्ञाको शिरोधार्य करके सुमन्त्र बड़े हर्षके साथ गये और उत्तम घोड़ोंसे जुता हुआ रथ लेकर लौट आये ॥ २८ ॥

स राघवः सत्यधृतिः प्रतापवान् ब्रुवन् सुयुक्तं दृढसत्यविक्रमः । गुरुं महारण्यगतं यशस्विनं प्रसादयिष्यन् भरतोऽब्रवीत् तदा ॥ २९ ॥

भावार्थ

तब सुदृढ़ एवं सत्य पराक्रमवाले सत्यपरायण प्रतापी भरत विशाल वनमें गये हुए अपने बड़े भाई यशस्वी श्रीरामको लौटा लानेके निमित्त राजी करनेके लिये यात्राके उद्देश्यसे उस समय इस प्रकार बोले—॥ २९ ॥

तूर्णं त्वमुत्थाय सुमन्त्र गच्छ बलस्य योगाय बलप्रधानान् । आनेतुमिच्छामि हि तं वनस्थं प्रसाद्य रामं जगतो हिताय ॥ ३० ॥

भावार्थ

‘सुमन्त्रजी ! आप शीघ्र उठकर सेनापतियोंके पास जाइये और उनसे कहकर सेनाको कल कूँच करनेके लिये तैयार होनेका प्रबन्ध कीजिये; क्योंकि मैं सारे जगत्का कल्याण करनेके लिये उन वनवासी श्रीरामको प्रसन्न करके यहाँ ले आना चाहता हूँ’ ॥ ३० ॥

स सूतपुत्रो भरतेन सम्य- गाज्ञापितः सम्परिपूर्णकामः । शशास सर्वान् प्रकृतिप्रधानान् बलस्य मुख्यांश्च सुहृज्जनं च ॥ ३१ ॥

भावार्थ

भरतकी यह उत्तम आज्ञा पाकर सूतपुत्र सुमन्त्रने अपना मनोरथ सफल हुआ समझा और उन्होंने प्रजावर्गके सभी प्रधान व्यक्तियों, सेनापतियों तथा सुहृदोंको भरतका आदेश सुना दिया ॥ ३१ ॥

ततः समुत्थाय कुले कुले ते राजन्यवैश्या वृषलाश्च विप्राः । अयूयुजन्नुष्ट्ररथान् खरांश्च नागान् हयांश्चैव कुलप्रसूतान् ॥ ३२ ॥

भावार्थ

तब प्रत्येक घरके लोग ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र उठ-उठकर अच्छी जातिके घोड़े, हाथी, ऊँट, गधे तथा रथोंको जोतने लगे ॥ ३२ ॥

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