अयोध्याकाण्ड, सर्ग 65
अथ रात्र्यां व्यतीतायां प्रातरेवापरेऽहनि । वन्दिनः पर्युपातिष्ठंस्तत्पार्थिवनिवेशनम् ॥ १ ॥ सूताः परमसंस्कारा मागधाश्चोत्तमश्रुताः । गायकाः श्रुतिशीलाश्च निगदन्तः पृथकपृथक् ॥ २ ॥
भावार्थ
तदनन्तर रात बीतनेपर दूसरे दिन सबेरे ही वन्दीजन ( महाराजकी स्तुति करनेके लिये ) राजमहलमें उपस्थित हुए॥ व्याकरण-ज्ञानसे सम्पन्न ( अथवा उत्तम अलङ्कारोंसे विभूषित ) सूत, उत्तमरूपसे वंशपरम्पराका श्रवण करानेवाले मागध और सङ्गीतशास्त्रका अनुशीलन करनेवाले गायक अपने-अपने मार्गके अनुसार पृथक्-पृथक् यशोगान करते हुए वहाँ आये ॥ २ ॥
राजानं स्तुवतां तेषामुदात्ताभिहिताशिषाम् । प्रासादाभोगविस्तीर्णः स्तुतिशब्दो ह्यवर्तत ॥ ३ ॥
भावार्थ
उच्चस्वरसे आशीर्वाद देते हुए राजाकी स्तुति करनेवाले उन सूत-मागध आदिका शब्द राजमहलोंके भीतरी भागमें फैलकर गूँजने लगा ॥ ३ ॥
ततस्तु स्तुवतां तेषां सूतानां पाणिवादकाः । अपदानान्युदाहृत्य पाणिवादान्यवादयन् ॥ ४ ॥
भावार्थ
वे सूतगण स्तुति कर रहे थे; इतनेहीमें पाणिवादक ( हाथोंसे ताल देकर गानेवाले ) वहाँ आये और राजाओंके बीते हुए अद्भुत कर्मोंका बखान करते हुए तालगतिके अनुसार तालियाँ बजाने लगे ॥ ४ ॥
तेन शब्देन विहगाः प्रतिबुद्धाश्च सस्वनुः । शाखास्थाः पञ्जरस्थाश्च ये राजकुलगोचराः ॥ ५ ॥
भावार्थ
उस शब्दसे वृक्षोंकी शाखाओंपर बैठे हुए तथा राजकुलमें ही विचरनेवाले पिंजड़ेमें बंद शुक आदि पक्षी जागकर चहचहाने लगे ॥ ५ ॥
व्याहृताः पुण्यशब्दाश्च वीणानां चापि निःस्वनाः । आशीर्गेयं च गाथानां पूरयामास वेश्म तत् ॥ ६ ॥
भावार्थ
शुक आदि पक्षियों तथा ब्राह्मणोंके मुखसे निकले हुए पवित्र शब्द, वीणाओंके मधुर नाद तथा गाथाओंके आशीर्वाद-युक्त गानसे वह सारा भवन गूँज उठा ॥ ६ ॥
ततः शुचिसमाचाराः पर्युपस्थानकोविदाः । स्त्रीवर्षवरभूयिष्ठा उपतस्थुर्यथापुरा ॥ ७ ॥
भावार्थ
तदनन्तर सदाचारी तथा परिचर्याकुशल सेवक, जिनमें स्त्रियों और खोजोंकी संख्या अधिक थी, पहलेकी भाँति उस दिन भी राजभवनमें उपस्थित हुए ॥ ७ ॥
हरिचन्दनसम्पृक्तमुदकं काञ्चनैर्घटैः । आनिन्युः स्नानशिक्षाज्ञा यथाकालं यथाविधि ॥ ८ ॥
भावार्थ
स्नानविधिके ज्ञाता भृत्यजन विधिपूर्वक सोनेके घड़ोंमें चन्दनमिश्रित जल लेकर ठीक समयपर आये ॥ ८ ॥
मङ्गलालम्भनीयानि प्राशनीयान्युपस्करान् । उपानिन्युस्तथा पुण्याः कुमारीबहुलाः स्त्रियः ॥ ९ ॥
भावार्थ
पवित्र आचार-विचारवाली स्त्रियाँ, जिनमें कुमारी कन्याओंकी संख्या अधिक थी, मङ्गलके लिये स्पर्श करने योग्य गौ आदि, पीने योग्य गङ्गाजल आदि तथा अन्य उपकरण—दर्पण, आभूषण और वस्त्र आदि ले आयीं ॥ ९ ॥
सर्वलक्षणसम्पन्नं सर्वं विधिवदर्चितम् । सर्वं सुगुणलक्ष्मीवत् तदभूदाभिहारिकम् ॥ १० ॥
भावार्थ
प्रातःकाल राजाओंके मङ्गलके लिये जो-जो वस्तुएँ लायी जाती हैं, उनका नाम आभिहारिक है। वहाँ लायी गयी सारी आभिहारिक सामग्री समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न, विधिके अनुरूप, आदर और प्रशंसाके योग्य उत्तम गुणसे युक्त तथा शोभायमान थी ॥ १० ॥
ततः सूर्योदयं यावत् सर्वं परिसमुत्सुकम् । तस्थावनुपसम्प्राप्तं किस्विदित्युपशङ्कितम् ॥ ११ ॥
भावार्थ
सूर्योदय होनेतक राजाकी सेवाके लिये उत्सुक हुआ सारा परिजनवर्ग वहाँ आकर खड़ा हो गया। जब उस समयतक राजा बाहर नहीं निकले, तब सबके मनमें यह शङ्का हो गयी कि महाराजके न आनेका क्या कारण हो सकता है ? ॥ ११ ॥
अथ याः कोसलेन्द्रस्य शयनं प्रत्यनन्तराः । ताः स्त्रियस्तु समागम्य भर्तारं प्रत्यबोधयन् ॥ १२ ॥
भावार्थ
तदनन्तर जो कोसलनरेश दशरथके समीप रहनेवाली स्त्रियाँ थीं, वे उनकी शय्याके पास जाकर अपने स्वामीको जगाने लगीं ॥ १२ ॥
अथाप्युचितवृत्तास्ता विनयेन नयेन च । नह्यस्य शयनं स्पृष्ट्वा किंचिदप्युपलेभिरे ॥ १३ ॥
भावार्थ
वे स्त्रियाँ उनका स्पर्श आदि करनेके योग्य थीं; अतः विनीतभावसे युक्तिपूर्वक उन्होंने उनकी शय्याका स्पर्श किया। स्पर्श करके भी वे उनमें जीवनका कोई चिह्न नहीं पा सकीं ॥ १३ ॥
ताः स्त्रियः स्वप्नशीलज्ञाश्चैषां संचलनादिषु । ता वेपथुपरीताश्च राज्ञः प्राणेषु शङ्किताः ॥ १४ ॥
भावार्थ
सोये हुए पुरुषकी जैसी स्थिति होती है, उसको भी वे स्त्रियाँ अच्छी तरह समझती थीं; अतः उन्होंने हृदय एवं हाथके मूलभागमें चलनेवाली नाड़ियोंकी भी परीक्षा की, किंतु वहाँ भी कोई चेष्टा नहीं प्रतीत हुई। फिर तो वे काँप उठीं। उनके मनमें राजाके प्राणोंके निकल जानेकी आशङ्का हो गयी ॥ १४ ॥
प्रतिस्रोतस्तृणाग्राणां सदृशं संचकाशिरे । अथ संदेहमानानां स्त्रीणां दृष्ट्वा च पार्थिवम् । यत् तदाशङ्कितं पापं तदा जज्ञे विनिश्चयः ॥ १५ ॥
भावार्थ
वे जलके प्रवाहके सम्मुख पड़े हुए तिनकोंके अग्रभागकी भाँति काँपती हुई प्रतीत होने लगीं। संशयमें पड़ी हुई उन स्त्रियोंको राजाकी ओर देखकर उनकी मृत्युके विषयमें जो शङ्का हुई थी, उसका उस समय उन्हें पूरा निश्चय हो गया ॥ १५ ॥
कौसल्या च सुमित्रा च पुत्रशोकपराजिते । प्रसुप्ते न प्रबुध्येते यथा कालसमन्विते ॥ १६ ॥
भावार्थ
पुत्रशोकसे आक्रान्त हुई कौसल्या और सुमित्रा उस समय मरी हुईके समान सो गयी थीं और उस समयतक उनकी नींद नहीं खुल पायी थी ॥ १६ ॥
निष्प्रभासा विवर्णा च सन्ना शोकेन संनता। न व्यराजत कौसल्या तारेव तिमिरावृता ॥ १७ ॥
भावार्थ
सोयी हुई कौसल्या श्रीहीन हो गयी थीं। उनके शरीरका रंग बदल गया था। वे शोकसे पराजित एवं पीड़ित हो अन्धकारसे आच्छादित हुई तारिकाके समान शोभा नहीं पा रही थीं ॥ १७ ॥
कौसल्यानन्तरं राज्ञः सुमित्रा तदनन्तरम्। न स्म विभ्राजते देवी शोकाश्रुलुलितानना ॥ १८ ॥
भावार्थ
राजाके पास कौसल्या थीं और कौसल्याके समीप देवी सुमित्रा थीं। दोनों ही निद्रामग्न हो जानेके कारण शोभाहीन प्रतीत होती थीं। उन दोनोंके मुखपर शोकके आँसू फैले हुए थे ॥ १८ ॥
ते च दृष्ट्वा तदा सुप्ते उभे देव्यौ च तं नृपम्। सुप्तमेवोद्गतप्राणमन्तःपुरमम न्यत ॥ १९ ॥
भावार्थ
उस समय उन दोनों देवियोंको निद्रामग्न देख अन्तःपुरकी अन्य स्त्रियोंने यही समझा कि सोते अवस्थामें ही महाराजके प्राण निकल गये हैं ॥ १९ ॥
ततः प्रचुक्रुशुर्दीनाः सस्वरं ता वराङ्गनाः। करेणव इवारण्ये स्थानप्रच्युतयूथपाः ॥ २० ॥
भावार्थ
फिर तो जैसे जंगलमें यूथपति गजराजके अपने वास-स्थानसे अन्यत्र चले जानेपर हथिनियाँ करुण चीत्कार करने लगती हैं, उसी प्रकार वे अन्तःपुरकी सुन्दरी रानियाँ अत्यन्त दुखी हो उच्चस्वरसे आर्तनाद करने लगीं ॥ २० ॥
तासामाक्रन्दशब्देन सहसोद्गतचेतने। कौसल्या च सुमित्रा च त्यक्तनिद्रे बभूवतुः ॥ २१ ॥
भावार्थ
उनके रोनेकी आवाजसे कौसल्या और सुमित्राकी भी नींद टूट गयी और वे दोनों सहसा जाग उठीं ॥ २१ ॥
कौसल्या च सुमित्रा च दृष्ट्वा स्पृष्ट्वा च पार्थिवम्। हा नाथेति परिक्रुश्य पेततुर्धरणीतले ॥ २२ ॥
भावार्थ
कौसल्या और सुमित्राने राजाको देखा, उनके शरीरका स्पर्श किया और ‘हा नाथ !’ की पुकार मचाती हुई वे दोनों रानियाँ पृथ्वीपर गिर पड़ीं ॥ २२ ॥
सा कोसलेन्द्रदुहिता चेष्टमाना महीतले। न भ्राजते रजोध्वस्ता तारेव गगनच्युता ॥ २३ ॥
भावार्थ
कोसलराजकुमारी कौसल्या धरतीपर लोटने और छटपटाने लगीं। उनका धूलि-धूसरित शरीर शोभाहीन दिखायी देने लगा, मानो आकाशसे टूटकर गिरी हुई कोई तारा धूलमें लोट रही हो ॥ २३ ॥
नृपे शान्तगुणे जाते कौसल्यां पतितां भुवि। अपश्यंस्ताः स्त्रियः सर्वा हतां नागवधूमिव ॥ २४ ॥
भावार्थ
राजा दशरथके शरीरकी उष्णता शान्त हो गयी थी। इस प्रकार उनका जीवन शान्त हो जानेपर भूमिपर अचेत पड़ी हुई कौसल्याको अन्तःपुरकी उन सारी स्त्रियोंने मरी हुई नागिनके समान देखा ॥ २४ ॥
ततः सर्वा नरेन्द्रस्य कैकेयीप्रमुखाः स्त्रियः। रुदत्यः शोकसंतप्ता निपेतुर्गतचेतनाः ॥ २५ ॥
भावार्थ
तदनन्तर पीछे आयी हुई महाराजकी कैकेयी आदि सारी रानियाँ शोकसे संतप्त होकर रोने लगीं और अचेत होकर गिर पड़ीं ॥ २५ ॥
ताभिः स बलवान् नादः क्रोशन्तीभिरनुद्रुतः। येन स्फीतीकृतो भूयस्तद् गृहं समनादयत् ॥ २६ ॥
भावार्थ
उन क्रन्दन करती हुई रानियोंने वहाँ पहलेसे होनेवाले प्रबल आर्तनादको और भी बढ़ा दिया। उस बढ़े हुए आर्तनादसे वह सारा राजमहल पुनः बड़े जोरसे गूँज उठा ॥ २६ ॥
तत् परित्रस्तसम्भ्रान्तपर्युत्सुकजनाकुलम्। सर्वतस्तुमुलाक्रन्दं परितापार्तबान्धवम् ॥ २७ ॥ सद्योनिपतितानन्दं दीनं विक्लवदर्शनम्। बभूव नरदेवस्य सद्म दिष्टान्तमीयुषः ॥ २८ ॥
भावार्थ
कालधर्मको प्राप्त हुए राजा दशरथका वह भवन डरे, घबराये और अत्यन्त उत्सुक हुए मनुष्योंसे भर गया। सब ओर रोने-चिल्लानेका भयंकर शब्द होने लगा। वहाँ राजाके सभी बन्धु-बान्धव शोक-संतापसे पीड़ित होकर जुट गये। वह सारा भवन तत्काल आनन्दशून्य हो दीन-दुखी एवं व्याकुल दिखायी देने लगा ॥ २७-२८ ॥
अतीतमाज्ञाय तु पार्थिवर्षभं यशस्विनं तं परिवार्य पत्नयः। भृशं रुदत्यः करुणं सुदुःखिताः प्रगृह्य बाहू व्यलपन्ननाथवत् ॥ २९ ॥
भावार्थ
उन यशस्वी भूपालशिरोमणिको दिवङ्गत हुआ जान उनकी सारी पत्नियाँ उन्हें चारों ओरसे घेरकर अत्यन्त दुखी हो जोर-जोरसे रोने लगीं और उनकी दोनों बाँहें पकड़कर अनाथकी भाँति करुण-विलाप करने लगीं ॥ २९ ॥
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