अयोध्याकाण्ड, सर्ग 52
प्रभातायां तु शर्वर्यां पृथुवक्षा महायशाः । उवाच रामः सौमित्रिं लक्ष्मणं शुभलक्षणम् ॥ १ ॥
भावार्थ
जब रात बीती और प्रभात हुआ, उस समय विशाल वक्षवाले महायशस्वी श्रीरामने शुभलक्षणसम्पन्न सुमित्राकुमार लक्ष्मणसे इस प्रकार कहा—॥ १ ॥
भास्करोदयकालोऽसौ गता भगवती निशा । असौ सुकृष्णो विहगः कोकिलस्तात कूजति ॥ २ ॥
भावार्थ
‘तात ! भगवती रात्रि व्यतीत हो गयी । अब सूर्योदयका समय आ पहुँचा है । वह अत्यन्त काले रंगका पक्षी कोकिल कुहू-कुहू बोल रहा है ॥ २ ॥
बर्हिणानां च निर्घोषः श्रूयते नदतां वने । तराम जाह्नवीं सौम्य शीघ्रगां सागरङ्गमाम् ॥ ३ ॥ विज्ञाय रामस्य वचः सौमित्रिर्मित्रनन्दनः । गुहमामन्त्र्य सूतं च सोऽतिष्ठद् भ्रातुरग्रतः ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘वनमें अव्यक्त शब्द करनेवाले मयूरोंकी केका वाणी भी सुनायी देती है; अतः सौम्य ! अब हमें तीव्र गतिसे बहनेवाली समुद्रगामिनी गङ्गाजीके पार उतरना चाहिये’ ॥ मित्रोंको आनन्दित करनेवाले सुमित्राकुमार लक्ष्मणने श्रीरामचन्द्रजीके कथनका अभिप्राय समझकर गुह और सुमन्त्रको बुलाकर पार उतरनेकी व्यवस्था करनेके लिये कहा और स्वयं वे भाईके सामने आकर खड़े हो गये ॥ ४ ॥
स तु रामस्य वचनं निशम्य प्रतिगृह्य च । स्थपतिस्तूर्णमाहूय सचिवानिदमब्रवीत् ॥ ५ ॥
भावार्थ
श्रीरामचन्द्रजीका वचन सुनकर उनका आदेश शिरोधार्य करके निषादराजने तुरंत अपने सचिवोंको बुलाया और इस प्रकार कहा—॥ ५ ॥
अस्यवाहनसंयुक्तां कर्णग्राहवतीं शुभाम् । सुप्रतारां दृढां तीर्थे शीघ्रं नावमुपाहर ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘तुम घाटपर शीघ्र ही एक ऐसी नाव ले आओ, जो मजबूत होनेके साथ ही सुगमतापूर्वक खेनेयोग्य हो, उसमें डाँड़ लगा हुआ हो, कर्णधार बैठा हो तथा वह नाव देखनेमें सुन्दर हो’ ॥ ६ ॥
तं निशम्य गुहादेशं गुहामात्यो गतो महान् । उपोह्य रुचिरां नावं गुहाय प्रत्यवेदयत् ॥ ७ ॥
भावार्थ
निषादराज गुहका वह आदेश सुनकर उसका महान् मन्त्री गया और एक सुन्दर नाव घाटपर पहुँचाकर उसने गुहको इसकी सूचना दी ॥ ७ ॥
ततः स प्राञ्जलिर्भूत्वा गुहो राघवमब्रवीत् । उपस्थितेयं नौर्देव भूयः किं करवाणि ते ॥ ८ ॥
भावार्थ
तब गुहने हाथ जोड़कर श्रीरामचन्द्रजीसे कहा—‘देव ! यह नौका उपस्थित है; बताइये, इस समय आपकी और क्या सेवा करूँ ? ॥ ८ ॥
तवामरसुतप्रख्य तर्तुं सागरगामिनीम् । नौरियं पुरुषव्याघ्र शीघ्रमारोह सुव्रत ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘देवकुमारके समान तेजस्वी तथा उत्तम व्रतका पालन करनेवाले पुरुषसिंह श्रीराम ! समुद्रगामिनी गङ्गानदीको पार करनेके लिये आपकी सेवामें यह नाव आ गयी है, अब आप शीघ्र इसपर आरूढ़ होइये’॥ ९ ॥
अथोवाच महातेजा रामो गुहमिदं वचः । कृतकामोऽस्मि भवता शीघ्रमारोप्यतामिति ॥ १० ॥
भावार्थ
तब महातेजस्वी श्रीराम गुहसे इस प्रकार बोले—‘सखे ! तुमने मेरा सारा मनोरथ पूर्ण कर दिया, अब शीघ्र ही सब सामान नावपर चढ़ाओ’ ॥ १० ॥
ततः कलापान् संनह्य खड्गौ बद्ध्वा च धन्विनौ । जग्मतुर्येन तां गङ्गां सीतया सह राघवौ ॥ ११ ॥
भावार्थ
यह कहकर श्रीराम और लक्ष्मणने कवच धारण करके तरकस एवं तलवार बाँधी तथा धनुष लेकर वे दोनों भाई जिस मार्गसे सब लोग घाटपर जाया करते थे, उसीसे सीताके साथ गङ्गाजीके तटपर गये ॥ ११ ॥
राममेवं तु धर्मज्ञमुपागत्य विनीतवत् । किमहं करवाणीति सूतः प्राञ्जलिरब्रवीत् ॥ १२ ॥
भावार्थ
उस समय धर्मके ज्ञाता भगवान् श्रीरामके पास जाकर सारथि सुमन्त्रने विनीतभावसे हाथ जोड़कर पूछा—‘प्रभो ! अब मैं आपकी क्या सेवा करूँ ?’ ॥ १२ ॥
ततोऽब्रवीद् दाशरथिः सुमन्त्रं स्पृशन् करेणोत्तमदक्षिणेन । सुमन्त्र शीघ्रं पुनरेव याहि राज्ञः सकाशे भव चाप्रमत्तः ॥ १३ ॥
भावार्थ
तब दशरथनन्दन श्रीरामने सुमन्त्रको उत्तम दाहिने हाथसे स्पर्श करते हुए कहा—‘सुमन्त्रजी ! अब आप शीघ्र ही पुनः महाराजके पास लौट जाइये और वहाँ सावधान होकर रहिये’ ॥ १३ ॥
निवर्तस्वेत्युवाचैनमेतावद्धि कृतं मम । रथं विहाय पद्भ्यां तु गमिष्यामो महावनम् ॥ १४ ॥
भावार्थ
उन्होंने फिर कहा—‘इतनी दूरतक महाराजकी आज्ञासे मैंने रथद्वारा यात्रा की है, अब हमलोग रथ छोड़कर पैदल ही महान् वनकी यात्रा करेंगे; अतः आप लौट जाइये’ ॥ १४ ॥
आत्मानं त्वभ्यनुज्ञातमवेक्ष्यार्तः स सारथिः । सुमन्त्रः पुरुषव्याघ्रमैक्ष्वाकमिदमब्रवीत् ॥ १५ ॥
भावार्थ
अपनेको घर लौटनेकी आज्ञा प्राप्त हुई देख सारथि सुमन्त्र शोकसे व्याकुल हो उठे और इक्ष्वाकुनन्दन पुरुषसिंह श्रीरामसे इस प्रकार बोले—॥ १५ ॥
नातिक्रान्तमिदं लोके पुरुषेणेह केनचित् । तव स भ्रातृभार्यस्य वासः प्राकृतवद् वने ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘रघुनन्दन ! जिसकी प्रेरणासे आपको भाई और पत्नीके साथ साधारण मनुष्योंकी भाँति वनमें रहनेको विवश होना पड़ा है, उस दैवका इस संसारमें किसी भी पुरुषने उल्लङ्घन नहीं किया ॥ १६ ॥
न मन्ये ब्रह्मचर्ये वा स्वधीते वा फलोदयः । मार्दवार्जवयोर्वापि त्वां चेद् व्यसनमागतम् ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘जब आप-जैसे महान् पुरुषपर यह संकट आ गया, तब मैं समझता हूँ कि ब्रह्मचर्य-पालन, वेदोंके स्वाध्याय, दयालुता अथवा सरलतामें भी किसी फलकी सिद्धि नहीं है ॥ १७ ॥
सह राघव वैदेह्या भ्रात्रा चैव वने वसन् । त्वं गतिं प्राप्स्यसे वीर त्रींल्लोकांस्तु जयन्निव ॥ १८॥
भावार्थ
‘वीर रघुनन्दन ! ( इस प्रकार पिताके सत्यकी रक्षाके लिये ) विदेहनन्दिनी सीता और भाई लक्ष्मणके साथ वनमें निवास करते हुए आप तीनों लोकोंपर विजय प्राप्त करनेवाले महापुरुष नारायणकी भाँति उत्कर्ष ( महान् यश ) प्राप्त करेंगे ॥ १८ ॥
वयं खलु हता राम ये त्वया ह्युपवञ्चिताः । कैकेय्या वशमेष्यामः पापाया दुःखभागिनः ॥ १९ ॥ इति ब्रुवन्नात्मसमं सुमन्त्रः सारथिस्तदा । दृष्ट्वा दूरगतं रामं दुःखार्तो रुरुदे चिरम् ॥ २० ॥
भावार्थ
‘श्रीराम ! निश्चय ही हमलोग हर तरहसे मारे गये; क्योंकि आपने हम पुरवासियोंको अपने साथ न ले जाकर अपने दर्शनजनित सुखसे वञ्चित कर दिया । अब हम पापिनी कैकेयीके वशमें पड़ेंगे और दुःख भोगते रहेंगे’॥ आत्माके समान प्रिय श्रीरामचन्द्रजीसे ऐसी बात कहकर उन्हें दूर जानेको उद्यत देख सारथि सुमन्त्र दुःखसे व्याकुल होकर देरतक रोते रहे ॥ २० ॥
ततस्तु विगते बाष्पे सूतं स्पृष्ट्वोदकं शुचिम् । रामस्तु मधुरं वाक्यं पुनः पुनरुवाच तम् ॥ २१॥ इक्ष्वाकूणां त्वया तुल्यं सुहृदं नोपलक्षये । यथा दशरथो राजा मां न शोचेत् तथा कुरु ॥ २२ ॥
भावार्थ
आँसुओंका प्रवाह रुकनेपर आचमन करके पवित्र हुए सारथिसे श्रीरामचन्द्रजीने बारंबार मधुर वाणीमें कहा—॥ ‘सुमन्त्रजी ! मेरी दृष्टिमें इक्ष्वाकुवंशियोंका हित करनेवाला सुहृद् आपके समान दूसरा कोई नहीं है । आप ऐसा प्रयत्न करें, जिससे महाराज दशरथको मेरे लिये शोक न हो ॥ २२ ॥
शोकोपहतचेताश्च वृद्धश्च जगतीपतिः । कामभारावसन्नश्च तस्मादेतद् ब्रवीमि ते ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘पृथिवीपति महाराज दशरथ एक तो बूढ़े हैं, दूसरे उनका सारा मनोरथ चूर-चूर हो गया है; इसलिये उनका हृदय शोकसे पीड़ित है। यही कारण है कि मैं आपको उनकी सँभालके लिये कहता हूँ ॥ २३ ॥
यद् यथा ज्ञापयेत् किंचित् स महात्मा महीपतिः । कैकेय्याः प्रियकामार्थं कार्यं तदविकाङ्क्षया ॥ २४॥
भावार्थ
‘वे महामनस्वी महाराज कैकेयीका प्रिय करनेकी इच्छासे आपको जो कुछ जैसी भी आज्ञा दें, उसका आप आदरपूर्वक पालन करें—यही मेरा अनुरोध है ॥ २४ ॥
एतदर्थं हि राज्यानि प्रशासति नराधिपाः । यदेषां सर्वकृत्येषु मनो न प्रतिहन्यते ॥ २५ ॥
भावार्थ
‘राजालोग इसीलिये राज्यका पालन करते हैं कि किसी भी कार्यमें इनके मनकी इच्छा-पूर्तिमें विघ्न न डाला जाय ॥ २५ ॥
यद् यथा स महाराजो नालीकमधिगच्छति । न च ताम्यति शोकेन सुमन्त्र कुरु तत् तथा ॥ २६ ॥
भावार्थ
‘सुमन्त्रजी ! जिस किसी भी कार्यमें जिस किसी तरह भी महाराजको अप्रिय बातसे खिन्न होनेका अवसर न आवे तथा वे शोकसे दुबले न हों, वह आपको उसी प्रकार करना चाहिये ॥ २६ ॥
अदृष्टदुःखं राजानं वृद्धमार्यं जितेन्द्रियम् । ब्रूयास्त्वमभिवाद्यैव मम हेतोरिदं वचः ॥ २७ ॥
भावार्थ
‘जिन्होंने कभी दुःख नहीं देखा है, उन आर्य, जितेन्द्रिय और वृद्ध महाराजको मेरी ओरसे प्रणाम करके यह बात कहियेगा ॥ २७ ॥
न चाहमनुशोचामि लक्ष्मणो न च शोचति । अयोध्यायाश्च्युताश्चेति वने वत्स्यामहेति वा ॥ २८॥
भावार्थ
‘हमलोग अयोध्यासे निकल गये अथवा हमें वनमें रहना पड़ेगा, इस बातको लेकर न तो मैं कभी शोक करता हूँ और न लक्ष्मणको ही इसका शोक है ॥ २८ ॥
चतुर्दशसु वर्षेषु निवृत्तेषु पुनः पुनः । लक्ष्मणं मां च सीतां च द्रक्ष्यसे शीघ्रमागतान् ॥ २९॥
भावार्थ
‘चौदह वर्ष समाप्त होनेपर हम पुनः शीघ्र ही लौट आयँगे और उस समय आप मुझे, लक्ष्मणको और सीताको भी फिर देखेंगे ॥ २९ ॥
एवमुक्त्वा तु राजानं मातरं च सुमन्त्र मे । अन्याश्च देवीः सहिताः कैकेयीं च पुनः पुनः ॥ ३० ॥
भावार्थ
‘सुमन्त्रजी ! महाराजसे ऐसा कहकर आप मेरी मातासे, उनके साथ बैठी हुई अन्य देवियों ( माताओं ) से तथा कैकेयीसे भी बारंबार मेरा कुशल-समाचार कहियेगा ॥३०॥
आरोग्यं ब्रूहि कौसल्यामथ पादाभिवन्दनम् । सीताया मम चार्यस्य वचनाल्लक्ष्मणस्य च ॥ ३१॥
भावार्थ
‘माता कौसल्यासे कहियेगा कि तुम्हारा पुत्र स्वस्थ एवं प्रसन्न है । इसके बाद सीताकी ओरसे, मुझ ज्येष्ठ पुत्रकी ओरसे तथा लक्ष्मणकी ओरसे भी माताकी चरणवन्दना कह दीजियेगा ॥ ३१ ॥
ब्रूयाश्चापि महाराजं भरतं क्षिप्रमानय । आगतश्चापि भरतः स्थाप्यो नृपमते पदे ॥ ३२ ॥
भावार्थ
‘तदनन्तर मेरी ओरसे महाराजसे भी यह निवेदन कीजियेगा कि आप भरतको शीघ्र ही बुलवा लें और जब वे आ जायँ, तब अपने अभीष्ट युवराजपदपर उनका अभिषेक कर दें ॥ ३२ ॥
भरतं च परिष्वज्य यौवराज्येऽभिषिच्य च । अस्मत्संतापजं दुःखं न त्वामभिभविष्यति ॥ ३३ ॥
भावार्थ
‘भरतको छातीसे लगाकर और युवराजके पदपर अभिषिक्त करके आपको हमलोगोंके वियोगसे होनेवाला दुःख दबा नहीं सकेगा ॥ ३३ ॥
भरतश्चापि वक्तव्यो यथा राजनि वर्तसे । तथा मातृषु वर्तेथाः सर्वास्वेवाविशेषतः ॥ ३४ ॥
भावार्थ
‘भरतसे भी हमारा यह संदेश कह दीजियेगा कि महाराजके प्रति जैसा तुम्हारा बर्ताव है, वैसा ही समानरूपसे सभी माताओंके प्रति होना चाहिये ॥ ३४ ॥
यथा च तव कैकेयी सुमित्रा चाविशेषतः । तथैव देवी कौसल्या मम माता विशेषतः ॥ ३५ ॥
भावार्थ
‘तुम्हारी दृष्टिमें कैकेयीका जो स्थान है, वही समानरूपसे सुमित्रा और मेरी माता कौसल्याका भी होना उचित है, इन सबमें कोई अन्तर न रखना ॥ ३५ ॥
तातस्य प्रियकामेन यौवराज्यमवेक्षता । लोकयोरुभयोः शक्यं नित्यदा सुखमेधितुम् ॥ ३६ ॥
भावार्थ
‘पिताजीका प्रिय करनेकी इच्छासे युवराजपदको स्वीकार करके यदि तुम राजकाजकी देखभाल करते रहोगे तो इहलोक और परलोकमें सदा ही सुख पाओगे’ ॥ ३६ ॥
निवर्त्यमानो रामेण सुमन्त्रः प्रतिबोधितः । तत्सर्वं वचनं श्रुत्वा स्नेहात् काकुत्स्थमब्रवीत् ॥ ३७ ॥
भावार्थ
श्रीरामचन्द्रजीने सुमन्त्रको लौटाते हुए जब इस प्रकार समझाया, तब उनकी सारी बातें सुनकर वे श्रीरामसे स्नेहपूर्वक बोले—॥ ३७ ॥
यदहं नोपचारेण ब्रूयां स्नेहादविक्लवम् । भक्तिमानिति तत् तावद् वाक्यं त्वं क्षन्तुमर्हसि ॥ ३८ ॥ कथं हि त्वद्विहीनोऽहं प्रतियास्यामि तां पुरीम् । तव तात वियोगेन पुत्रशोकातुरामिव ॥ ३९ ॥
भावार्थ
‘तात ! सेवकका स्वामीके प्रति जो सत्कारपूर्ण बर्ताव होना चाहिये, उसका यदि मैं आपसे बात करते समय पालन न कर सकूँ, यदि मेरे मुखसे स्नेहवश कोई धृष्टतापूर्ण बात निकल जाय तो ‘यह मेरा भक्त है’ ऐसा समझकर आप मुझे क्षमा कीजियेगा । जो आपके वियोगसे पुत्रशोकसे आतुर हुई माताकी भाँति संतप्त हो रही है, उस अयोध्यापुरीमें मैं आपको साथ लिये बिना कैसे लौटकर जा सकूँगा ? ॥ ३८-३९ ॥
सराममपि तावन्मे रथं दृष्ट्वा तदा जनः । विना रामं रथं दृष्ट्वा विदीर्येतापि सा पुरी ॥ ४० ॥
भावार्थ
‘आते समय लोगोंने मेरे रथमें श्रीरामको विराजमान देखा था, अब इस रथको श्रीरामसे रहित देखकर उन लोगोंका और उस अयोध्यापुरीका भी हृदय विदीर्ण हो जायगा ॥ ४० ॥
दैन्यं हि नगरी गच्छेद् दृष्ट्वा शून्यमिमं रथम् । सूतावशेषं स्वं सैन्यं हतवीरमिवाहवे ॥ ४१ ॥
भावार्थ
‘जैसे युद्धमें अपने स्वामी वीर रथीके मारे जानेपर जिसमें केवल सारथि शेष रह गया हो ऐसे रथको देखकर उसकी अपनी सेना अत्यन्त दयनीय अवस्थामें पड़ जाती है, उसी प्रकार मेरे इस रथको आपसे सूना देखकर सारी अयोध्या नगरी दीन दशाको प्राप्त हो जायगी ॥ ४१ ॥
दूरेऽपि निवसन्तं त्वां मानसेनाग्रतः स्थितम् । चिन्तयन्तोऽद्य नूनं त्वां निराहाराः कृताः प्रजाः ॥ ४२ ॥
भावार्थ
‘आप दूर रहकर भी प्रजाके हृदयमें निवास करनेके कारण सदा उसके सामने ही खड़े रहते हैं । निश्चय ही इस समय प्रजावर्गके सब लोगोंने आपका ही चिन्तन करते हुए खाना-पीना छोड़ दिया होगा ॥ ४२ ॥
दृष्टं तद् वै त्वया राम यादृशं त्वत्प्रवासने । प्रजानां संकुलं वृत्तं त्वच्छोकक्लान्तचेतसाम् ॥ ४३ ॥
भावार्थ
‘श्रीराम ! जिस समय आप वनको आने लगे, उस समय आपके शोकसे व्याकुलचित्त हुई प्रजाने जैसा आर्तनाद एवं क्षोभ प्रकट किया था, उसे तो आपने देखा ही था ॥ ४३ ॥
आर्तनादो हि यः पौरैरुन्मुक्तस्त्वत्प्रवासने । सरथं मां निशाम्यैव कुर्युः शतगुणं ततः ॥ ४४ ॥
भावार्थ
‘आपके अयोध्यासे निकलते समय पुरवासियोंने जैसा आर्तनाद किया था, आपके बिना मुझे खाली रथ लिये लौटा देख वे उससे भी सौगुना हाहाकार करेंगे ॥४४॥
अहं किं चापि वक्ष्यामि देवीं तव सुतो मया । नीतोऽसौ मातुलकुलं संतापं मा कृथा इति ॥ ४५ ॥ असत्यमपि नैवाहं ब्रूयां वचनमीदृशम् । कथमप्रियमेवाहं ब्रूयां सत्यमिदं वचः ॥ ४६ ॥
भावार्थ
‘क्या मैं महारानी कौसल्यासे जाकर कहूँगा कि मैंने आपके बेटेको मामाके घर पहुँचा दिया है ? इसलिये आप संताप न करें । यह बात प्रिय होनेपर भी असत्य है, अतः ऐसा असत्य वचन भी मैं कभी नहीं कह सकता । फिर यह अप्रिय सत्य भी कैसे सुना सकूँगा कि मैं आपके पुत्रको वनमें पहुँचा आया ॥ ४५-४६ ॥
मम तावन्नियोगस्थास्त्वद्बन्धुजनवाहिनः । कथं रथं त्वया हीनं प्रवाह्यन्ति हयोत्तमाः ॥ ४७ ॥
भावार्थ
‘ये उत्तम घोड़े मेरी आज्ञाके अधीन रहकर आपके बन्धुजनोंका भार वहन करते हैं ( आपके बन्धुजनोंसे हीन रथका ये वहन नहीं करते हैं ), ऐसी दशामें आपसे सूने रथको ये कैसे खींच सकेंगे ? ॥ ४७ ॥
तन्न शक्ष्याम्यहं गन्तुमयोध्यां त्वद्दतेऽनघ । वनवासानुयानाय मामनुज्ञातुमर्हसि ॥ ४८ ॥
भावार्थ
‘अतः निष्पाप रघुनन्दन ! अब मैं आपके बिना अयोध्या लौटकर नहीं जा सकूँगा । मुझे भी वनमें चलनेकी ही आज्ञा दीजिये ॥ ४८ ॥
यदि मे याचमानस्य त्यागमेव करिष्यसि । सरथोऽग्निं प्रवेक्ष्यामि त्यक्तमात्र इह त्वया ॥ ४९ ॥
भावार्थ
‘यदि इस तरह याचना करनेपर भी आप मुझे त्याग ही देंगे तो मैं आपके द्वारा परित्यक्त होकर यहाँ रथसहित अग्निमें प्रवेश कर जाऊँगा ॥ ४९ ॥
भविष्यन्ति वने यानि तपोविघ्नकराणि ते । रथेन प्रतिबाधिष्ये तानि सर्वाणि राघव ॥ ५० ॥
भावार्थ
‘रघुनन्दन ! वनमें आपकी तपस्यामें विघ्न डालनेवाले जो-जो जन्तु उपस्थित होंगे, मैं इस रथके द्वारा उन सबको दूर भगा दूँगा ॥ ५० ॥
त्वत्कृतेन मया प्राप्तं रथचर्योकृतं सुखम् । आशंसे त्वत्कृतेनाहं वनवासकृतं सुखम् ॥ ५१ ॥
भावार्थ
‘श्रीराम ! आपकी कृपासे मुझे आपको रथपर बिठाकर यहाँतक लानेका सुख प्राप्त हुआ । अब आपके ही अनुग्रह-से मैं आपके साथ वनमें रहनेका सुख भी पानेकी आशा करता हूँ ॥ ५१ ॥
प्रसीदेच्छामि तेऽरण्ये भवितुं प्रत्यनन्तरः । प्रीत्याभिहितमिच्छामि भव मे प्रत्यनन्तरः ॥ ५२ ॥
भावार्थ
‘आप प्रसन्न होकर आज्ञा दीजिये । मैं वनमें आपके पास ही रहना चाहता हूँ । मेरी इच्छा है कि आप प्रसन्नतापूर्वक कह दें कि तुम वनमें मेरे साथ ही रहो ॥ ५२ ॥
इमेऽपि च हया वीर यदि ते वनवासिनः । परिचर्यां करिष्यन्ति प्राप्स्यन्ति परमां गतिम् ॥ ५३ ॥
भावार्थ
‘वीर ! ये घोड़े भी यदि वनमें रहते समय आपकी सेवा करेंगे तो इन्हें परमगतिकी प्राप्ति होगी ॥ ५३ ॥
तव शुश्रूषणं मूर्ध्ना करिष्यामि वने वसन् । अयोध्यां देवलोकं वा सर्वथा प्रजहाम्यहम् ॥ ५४ ॥
भावार्थ
‘प्रभो ! मैं वनमें रहकर अपने सिरसे ( सारे शरीरसे ) आपकी सेवा करूँगा और इस सुखके आगे अयोध्या तथा देवलोकका भी सर्वथा त्याग कर दूँगा ॥ ५४ ॥
नहि शक्या प्रवेष्टुं सा मयायोध्या त्वया विना । राजधानी महेन्द्रस्य यथा दुष्कृतकर्मणा ॥ ५५ ॥
भावार्थ
‘जैसे सदाचारहीन प्राणी इन्द्रकी राजधानी स्वर्गमें नहीं प्रवेश कर सकता, उसी प्रकार आपके बिना मैं अयोध्यापुरीमें नहीं जा सकता ॥ ५५ ॥
वनवासे क्षयं प्राप्ते ममैव हि मनोरथः । यदनेन रथेनैव त्वां वहेयं पुरीं पुनः ॥ ५६ ॥
भावार्थ
‘मेरी यह अभिलाषा है कि जब वनवासकी अवधि समाप्त हो जाय, तब फिर इसी रथपर बिठाकर आपको अयोध्यापुरीमें ले चलूँ ॥ ५६ ॥
चतुर्दश हि वर्षाणि सहितस्य त्वया वने । क्षणभूतानि यास्यन्ति शतसंख्यानि चान्यथा ॥ ५७ ॥
भावार्थ
‘वनमें आपके साथ रहनेसे ये चौदह वर्ष मेरे लिये चौदह क्षणोंके समान बीत जायँगे । अन्यथा चौदह सौ वर्षोंके समान भारी जान पड़ेंगे ॥ ५७ ॥
भृत्यवत्सल तिष्ठन्तं भर्तृपुत्रगते पथि । भक्तं भृत्यं स्थितं स्थित्या न मा त्वं हातुमर्हसि ॥ ५८ ॥
भावार्थ
‘अतः भक्तवत्सल ! आप मेरे स्वामीके पुत्र हैं । आप जिस पथपर चल रहे हैं, उसीपर आपकी सेवाके लिये साथ चलनेको मैं भी तैयार खड़ा हूँ । मैं आपके प्रति भक्ति रखता हूँ, आपका भृत्य हूँ और भृत्यजनोचित मर्यादाके भीतर स्थित हूँ; अतः आप मेरा परित्याग न करें’ ॥ ५८ ॥
एवं बहुविधं दीनं याचमानं पुनः पुनः । रामो भृत्यानुकम्पी तु सुमन्त्रमिदमब्रवीत् ॥ ५९ ॥
भावार्थ
इस तरह अनेक प्रकारसे दीन वचन कहकर बारंबार याचना करनेवाले सुमन्त्रसे सेवकोंपर कृपा करनेवाले श्रीरामने इस प्रकार कहा—॥ ५९ ॥
जानामि परमां भक्तिमहं ते भर्तृवत्सल । शृणु चापि यदर्थं त्वां प्रेषयामि पुरीमितः ॥ ६० ॥
भावार्थ
‘सुमन्त्रजी ! आप स्वामीके प्रति स्नेह रखनेवाले हैं । मुझमें आपकी जो उत्कृष्ट भक्ति है, उसे मैं जानता हूँ; फिर भी जिस कार्यके लिये मैं आपको यहाँसे अयोध्यापुरीमें भेज रहा हूँ, उसे सुनिये ॥ ६० ॥
नगरीं त्वां गतं दृष्ट्वा जननी मे यवीयसी । कैकेयी प्रत्ययं गच्छेदिति रामो वनं गतः ॥ ६१ ॥
भावार्थ
‘जब आप नगरको लौट जायँगे, तब आपको देखकर मेरी छोटी माता कैकेयीको यह विश्वास हो जायगा कि राम वनको चले गये ॥ ६१ ॥
विपरीते तुष्टिहीना वनवासं गते मयि । राजानं नातिशङ्केत मिथ्यावादीति धार्मिकम् ॥ ६२ ॥
भावार्थ
‘इसके विपरीत यदि आप नहीं गये तो उसे संतोष नहीं होगा । मेरे वनवासी हो जानेपर भी वह धर्मपरायण महाराज दशरथके प्रति मिथ्यावादी होनेका संदेह करे, ऐसा मैं नहीं चाहता ॥ ६२ ॥
एष मे प्रथमः कल्पो यदम्बा मे यवीयसी । भरतारक्षितं स्फीतं पुत्रराज्यमवाप्स्यते ॥ ६३ ॥
भावार्थ
‘आपको भेजनेमें मेरा मुख्य उद्देश्य यही है कि मेरी छोटी माता कैकेयी भरतद्वारा सुरक्षित समृद्धिशाली राज्यको हस्तगत कर ले ॥ ६३ ॥
मम प्रियार्थं राज्ञश्च सुमन्त्र त्वं पुरीं व्रज । संदिष्टश्चापि यानर्थांस्तांस्तान् ब्रूयास्तथा तथा ॥ ६४ ॥
भावार्थ
‘सुमन्त्रजी ! मेरा तथा महाराजका प्रिय करनेके लिये आप अयोध्यापुरीको अवश्य पधारिये और आपको जिनके लिये जो संदेश दिया गया है, वह सब वहाँ जाकर उन लोगोंसे कह दीजिये’ ॥ ६४ ॥
इत्युक्त्वा वचनं सूतं सान्त्वयित्वा पुनः पुनः । गुहं वचनमक्कीबो रामो हेतुमद्ब्रवीत् ॥ ६५ ॥
भावार्थ
ऐसा कहकर श्रीरामने सुमन्त्रको बारंबार सान्त्वना दी । इसके बाद उन्होंने गुहसे उत्साहपूर्वक यह युक्तियुक्त बात कही—॥ ६५ ॥
नेदानीं गुह योग्योऽयं वासो मे सजने वने । अवश्यमाश्रमे वासः कर्तव्यस्तद्गतो विधिः ॥ ६६ ॥
भावार्थ
‘निषादराज गुह ! इस समय मेरे लिये ऐसे वनमें रहना उचित नहीं है, जहाँ जनपदके लोगोंका आना-जाना अधिक होता हो, अब अवश्य मुझे निर्जन वनके आश्रममें ही वास करना होगा । इसके लिये जटा धारण आदि आवश्यक विधिका मुझे पालन करना चाहिये ॥ ६६ ॥
सोऽहं गृहीत्वा नियमं तपस्विजनभूषणम् । हितकामः पितुर्भूयः सीताया लक्ष्मणस्य च ॥ ६७ ॥ जटाः कृत्वा गमिष्यामि न्यग्रोधक्षीरमानय । तत्क्षीरं राजपुत्राय गुहः क्षिप्रमुपाहरत् ॥ ६८ ॥ लक्ष्मणस्यात्मनश्चैव रामस्तेनाकरोज्जटाः । दीर्घबाहुर्नरव्याघ्रो जटिलत्वमधारयत् ॥ ६९ ॥
भावार्थ
‘अतः फल-मूलका आहार और पृथ्वीपर शयन आदि नियमोंको ग्रहण करके मैं सीता और लक्ष्मणकी अनुमति लेकर पिताका हित करनेकी इच्छासे सिरपर तपस्वी जनोंके आभूषणरूप जटा धारण करके यहाँसे वनको जाऊँगा । मेरे केशोंको जटाका रूप देनेके लिये तुम बड़का दूध ला दो ।’ गुहने तुरंत ही बड़का दूध लाकर श्रीरामको दिया ॥ श्रीरामने उसके द्वारा लक्ष्मणकी तथा अपनी जटाएँ बनायीं । महाबाहु पुरुषसिंह श्रीराम तत्काल जटाधारी हो गये ॥ ६९ ॥
तौ तदा चीरसम्पन्नौ जटामण्डलधारिणौ । अशोभेतामृषिसमौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥ ७० ॥ ततो वैखानसं मार्गमास्थितः सहलक्ष्मणः । व्रतमादिष्टवान् रामः सहायं गुहमब्रवीत् ॥ ७१ ॥
भावार्थ
उस समय वे दोनों भाई श्रीराम-लक्ष्मण वल्कल वस्त्र और जटामण्डल धारण करके ऋषियोंके समान शोभा पाने लगे ॥ तदनन्तर वानप्रस्थमार्गका आश्रय लेकर लक्ष्मणसहित श्रीरामने वानप्रस्थोचित व्रतको ग्रहण किया । तत्पश्चात् वे अपने सहायक गुहसे बोले—॥ ७१ ॥
अप्रमत्तो बले कोशे दुर्गे जनपदे तथा । भवेथा गुह राज्यं हि दुरारक्षतमं मतम् ॥ ७२ ॥
भावार्थ
‘निषादराज ! तुम सेना, खजाना, किला और राज्यके विषयमें सदा सावधान रहना; क्योंकि राज्यकी रक्षाका काम बड़ा कठिन माना गया है’ ॥ ७२ ॥
ततस्तं समनुज्ञाप्य गुहमिक्ष्वाकुनन्दनः । जगाम तूर्णमव्यग्रः सभार्यः सहलक्ष्मणः ॥ ७३ ॥
भावार्थ
गुहको इस प्रकार आज्ञा देकर उससे विदा ले इक्ष्वाकुकुलनन्दन श्रीरामचन्द्रजी पत्नी और लक्ष्मणके साथ तुरंत ही वहाँसे चल दिये । उस समय उनके चित्तमें तनिक भी व्यग्रता नहीं थी ॥ ७३ ॥
स तु दृष्ट्वा नदीतीरे नावमिक्ष्वाकुनन्दनः । तितीर्षुः शीघ्रगां गङ्गामिदं वचनमब्रवीत् ॥ ७४ ॥
भावार्थ
नदीके तटपर लगी हुई नावको देखकर इक्ष्वाकुनन्दन श्रीरामने शीघ्रगामी गङ्गानदीके पार जानेकी इच्छासे लक्ष्मणको सम्बोधित करके कहा—॥ ७४ ॥
आरोह त्वं नरव्याघ्र स्थितां नावमिमां शनैः । सीतां चारोपयान्वक्षं परिगृह्य मनस्विनीम् ॥ ७५ ॥
भावार्थ
‘पुरुषसिंह ! यह सामने नाव खड़ी है । तुम मनस्विनी सीताको पकड़कर धीरेसे उसपर बिठा दो, फिर स्वयं भी नावपर बैठ जाओ’ ॥ ७५ ॥
स भ्रातुः शासनं श्रुत्वा सर्वमप्रतिकूलयन् । आरोप्य मैथिलीं पूर्वमारुरोहात्मवांस्ततः ॥ ७६ ॥
भावार्थ
भाईका यह आदेश सुनकर मनको वशमें रखनेवाले लक्ष्मणने पूर्णतः उसके अनुकूल चलते हुए पहले मिथिलेशकुमारी श्रीसीताको नावपर बिठाया, फिर स्वयं भी उसपर आरूढ़ हुए ॥ ७६ ॥
अथारुरोह तेजस्वी स्वयं लक्ष्मणपूर्वजः । ततो निषादाधिपतिर्गुहो ज्ञातीनचोदयत् ॥ ७७ ॥
भावार्थ
सबके अन्तमें लक्ष्मणके बड़े भाई तेजस्वी श्रीराम स्वयं नौकापर बैठे । तदनन्तर निषादराज गुहने अपने भाई-बन्धुओंको नौका खेनेका आदेश दिया ॥ ७७ ॥
राघवोऽपि महातेजा नावमारुह्य तां ततः । ब्रह्मवत्क्षत्रवच्चैव जजाप हितमात्मनः ॥ ७८ ॥
भावार्थ
महातेजस्वी श्रीरामचन्द्रजी भी उस नावपर आरूढ़ होनेके पश्चात् अपने हितके उद्देश्यसे ब्राह्मण और क्षत्रियके अपने योग्य ‘दैवी नाव’ इत्यादि वैदिक मन्त्रका जप करने लगे ॥ ७८ ॥
आचम्य च यथाशास्त्रं नदीं तां सह सीतया । प्रणमत्प्रीतिसंतुष्टो लक्ष्मणश्च महारथः ॥ ७९ ॥
भावार्थ
फिर शास्त्रविधिके अनुसार आचमन करके सीताके साथ उन्होंने प्रसन्नचित्त होकर गङ्गाजीको प्रणाम किया । महारथी लक्ष्मणने भी उन्हें मस्तक झुकाया ॥७९ ॥
अनुज्ञाय सुमन्त्रं च सबलं चैव तं गुहम् । आस्थाय नावं रामस्तु चोदयामास नाविकान् ॥ ८० ॥
भावार्थ
इसके बाद श्रीरामने सुमन्त्रको तथा सेनासहित गुहको भी जानेकी आज्ञा दे नावपर भलीभाँति बैठकर मल्लाहोंको उसे चलानेका आदेश दिया ॥ ८० ॥
ततस्तैश्चालिता नौका कर्णधारसमाहिता । शुभस्फ्यवेगाभिहता शीघ्रं सलिलमत्यगात् ॥ ८१ ॥
भावार्थ
तदनन्तर मल्लाहोंने नाव चलायी । कर्णधार सावधान होकर उसका संचालन करता था । वेगसे सुन्दर डाँड़ चलानेके कारण वह नाव बड़ी तेजीसे पानीपर बढ़ने लगी ॥ ८१ ॥
मध्यं तु समनुप्राप्य भागीरथ्यास्त्वनिन्दिता । वैदेही प्राञ्जलिर्भूत्वा तां नदीमिदमब्रवीत् ॥ ८२ ॥
भावार्थ
भागीरथीकी बीच धारामें पहुँचकर सती साध्वी विदेहनन्दिनी सीताने हाथ जोड़कर गङ्गाजीसे यह प्रार्थना की—॥ ८२॥
पुत्रो दशरथस्यायं महाराजस्य धीमतः । निदेशं पालयत्वेनं गङ्गे त्वद्भिरक्षितः ॥ ८३ ॥
भावार्थ
‘देवि गङ्गे ! ये परम बुद्धिमान् महाराज दशरथके पुत्र हैं और पिताकी आज्ञाका पालन करनेके लिये वनमें जा रहे हैं । ये आपसे सुरक्षित होकर पिताकी इस आज्ञाका पालन कर सकें—ऐसी कृपा कीजिये ॥ ८३ ॥
चतुर्दश हि वर्षाणि समग्राण्युष्य कानने । भ्रात्रा सह मया चैव पुनः प्रत्यागमिष्यति ॥ ८४ ॥
भावार्थ
‘वनमें पूरे चौदह वर्षोंतक निवास करके ये मेरे तथा अपने भाईके साथ पुनः अयोध्यापुरीको लौटेंगे ॥ ८४ ॥
ततस्त्वां देवि सुभगे क्षेमेण पुनरागता । यक्ष्ये प्रमुदिता गङ्गे सर्वकामसमृद्धिनी ॥ ८५ ॥
भावार्थ
‘सौभाग्यशालिनी देवि गङ्गे ! उस समय वनसे पुनः कुशलपूर्वक लौटनेपर सम्पूर्ण मनोरथोंसे सम्पन्न हुई मैं बड़ी प्रसन्नताके साथ आपकी पूजा करूँगी ॥ ८५ ॥
त्वं हि त्रिपथगे देवि ब्रह्मलोकं समक्षसे । भार्या चोदधिराजस्य लोकेऽस्मिन् सम्प्रदृश्यसे ॥ ८६ ॥
भावार्थ
‘स्वर्ग, भूतल और पाताल तीनों मार्गोंपर विचरनेवाली देवि ! तुम यहाँसे ब्रह्मलोकतक फैली हुई हो और इस लोकमें समुद्रराजकी पत्नीके रूपमें दिखायी देती हो ॥ ८६ ॥
सा त्वां देवि नमस्यामि प्रशंसामि च शोभने । प्राप्तराज्ये नरव्याघ्रे शिवेन पुनरागते ॥ ८७ ॥
भावार्थ
‘शोभाशालिनी देवि ! पुरुषसिंह श्रीराम जब पुनः वनसे सकुशल लौटकर अपना राज्य प्राप्त कर लेंगे, तब मैं सीता पुनः आपको मस्तक झुकाऊँगी और आपकी स्तुति करूँगी ॥ ८७ ॥
गवां शतसहस्रं च वस्त्राण्यन्नं च पेशलम् । ब्राह्मणेभ्यः प्रदास्यामि तव प्रियचिकीर्षया ॥ ८८ ॥
भावार्थ
‘इतना ही नहीं, मैं आपका प्रिय करनेकी इच्छासे ब्राह्मणोंको एक लाख गौएँ, बहुत-से वस्त्र तथा उत्तमोत्तम अन्न प्रदान करूँगी ॥ ८८ ॥
सुराघटसहस्रेण मांसभूतौदनेन च । यक्ष्ये त्वां प्रीयतां देवि पुरीं पुनरुपागता ॥ ८९ ॥
भावार्थ
‘देवि ! पुनः अयोध्यापुरीमें लौटनेपर मैं सहस्रों देवदुर्लभ पदार्थोंसे तथा राजकीय भागसे रहित पृथ्वी, वस्त्र और अन्नके द्वारा भी आपकी पूजा करूँगी । आप मुझपर प्रसन्न हों॥ ८९ ॥
यानि त्वत्तीरवासीनि दैवतानि च सन्ति हि । तानि सर्वाणि यक्ष्यामि तीर्थान्यायतनानि च ॥ ९० ॥
भावार्थ
‘आपके किनारे जो-जो देवता, तीर्थ और मन्दिर हैं, उन सबका मैं पूजन करूँगी ॥ ९० ॥
पुनरेव महाबाहुर्मया भ्रात्रा च संगतः । अयोध्यां वनवासात् तु प्रविशत्वनघोऽनघे ॥ ९१ ॥
भावार्थ
‘निष्पाप गङ्गे ! ये महाबाहु पापरहित मेरे पतिदेव मेरे तथा अपने भाईके साथ वनवाससे लौटकर पुनः अयोध्या नगरीमें प्रवेश करें’ ॥ ९१ ॥
तथा सम्भाषमाणा सा सीता गङ्गामनिन्दिता । दक्षिणा दक्षिणं तीरं क्षिप्रमेवाभ्युपागमत् ॥ ९२ ॥
भावार्थ
पतिके अनुकूल रहनेवाली सती-साध्वी सीता इस प्रकार गङ्गाजीसे प्रार्थना करती हुई शीघ्र ही दक्षिणतटपर जा पहुँचीं ॥ ९२ ॥
तीरं तु समनुप्राप्य नावं हित्वा नरर्षभः । प्रातिष्ठत सह भ्रात्रा वैदेह्या च परंतपः ॥ ९३ ॥
भावार्थ
किनारे पहुँचकर शत्रुओंको संताप देनेवाले नरश्रेष्ठ श्रीरामने नाव छोड़ दी और भाई लक्ष्मण तथा विदेहनन्दिनी सीताके साथ आगेको प्रस्थान किया ॥ ९३ ॥
अथाब्रवीन्महाबाहुः सुमित्रानन्दवर्धनम् । भव संरक्षणार्थाय सजने विजनेऽपि वा ॥ ९४ ॥ अवश्यं रक्षणं कार्य मद्विधैर्विजने वने । अग्रतो गच्छ सौमित्रे सीता त्वामनुगच्छतु ॥ ९५ ॥ पृष्ठतोऽनुगमिष्यामि सीतां त्वां चानुपालयन् । अन्योन्यस्य हि नो रक्षा कर्तव्या पुरुषर्षभ ॥ ९६ ॥
भावार्थ
तदनन्तर महाबाहु श्रीराम सुमित्रानन्दन लक्ष्मणसे बोले—‘सुमित्राकुमार ! अब तुम सजन या निर्जन वनमें सीताकी रक्षाके लिये सावधान हो जाओ । हम-जैसे लोगोंको निर्जन वनमें नारीकी रक्षा अवश्य करनी चाहिये । अतः तुम आगे-आगे चलो, सीता तुम्हारे पीछे-पीछे चलें और मैं सीताकी तथा तुम्हारी रक्षा करता हुआ सबसे पीछे चलूँगा । पुरुषप्रवर ! हमलोगोंको एक-दूसरेकी रक्षा करनी चाहिये ॥ ९४–९६ ॥
न हि तावदतिक्रान्ता सुकरा काचन क्रिया । अद्य दुःखं तु वैदेही वनवासस्य वेत्स्यति ॥ ९७ ॥
भावार्थ
‘अबतक कोई भी दुष्कर कार्य समाप्त नहीं हुआ है— इस समयसे ही कठिनाइयोंका सामना आरम्भ हुआ है । आज विदेहकुमारी सीताको वनवासके वास्तविक कष्टका अनुभव होगा ॥ ९७ ॥
प्रणष्टजनसम्बाधं क्षेत्रारामविवर्जितम् । विषमं च प्रपातं च वनमद्य प्रवेक्ष्यति ॥ ९८ ॥
भावार्थ
‘अब ये ऐसे वनमें प्रवेश करेंगी, जहाँ मनुष्योंके आने-जानेका कोई चिह्न नहीं दिखायी देगा, न धान आदिके खेत होंगे, न टहलनेके लिये बगीचे । जहाँ ऊँची-नीची भूमि होगी और गड्ढे मिलेंगे, जिसमें गिरनेका भय रहेगा’ ॥ ९८ ॥
श्रुत्वा रामस्य वचनं प्रतस्थे लक्ष्मणोऽग्रतः । अनन्तरं च सीतायाः राघवो रघुनन्दनः ॥ ९९ ॥
भावार्थ
श्रीरामचन्द्रजीका यह वचन सुनकर लक्ष्मण आगे बढ़े । उनके पीछे सीता चलने लगीं तथा सीताके पीछे रघुकुलनन्दन श्रीराम थे ॥ ९९ ॥
गतं तु गङ्गापरपारमाशु रामं सुमन्त्रः सततं निरीक्ष्य । अध्वप्रकर्षाद् विनिवृत्तदृष्टि- र्मुमोच बाष्पं व्यथितस्तपस्वी ॥ १०० ॥
भावार्थ
श्रीरामचन्द्रजी शीघ्र गङ्गाजीके उस पार पहुँचकर जबतक दिखायी दिये तबतक सुमन्त्र निरन्तर उन्हींकी ओर दृष्टि लगाये देखते रहे । जब वनके मार्गमें बहुत दूर निकल जानेके कारण वे दृष्टिसे ओझल हो गये, तब तपस्वी सुमन्त्रके हृदयमें बड़ी व्यथा हुई । वे नेत्रोंसे आँसू बहाने लगे ॥ १०० ॥
स लोकपालप्रतिमप्रभाव- स्तीर्त्वा महात्मा वरदो महानदीम् । ततः समृद्धाञ्शुभसस्यमालिनः क्रमेण वत्सान् मुदितानुपागमत् ॥ १०१ ॥
भावार्थ
लोकपालोंके समान प्रभावशाली वरदायक महात्मा श्रीराम महानदी गङ्गाको पार करके क्रमशः समृद्धिशाली वत्सदेश ( प्रयाग ) में जा पहुँचे, जो सुन्दर धन-धान्यसे सम्पन्न था । वहाँके लोग बड़े हृष्ट-पुष्ट थे ॥ १०१ ॥
तौ तत्र हत्वा चतुरो महामृगान् वराहमृश्यं पृषतं महारुरुम् । आदाय मेध्यं त्वरितं बुभुक्षितौ वासाय काले ययतुर्वनस्पतिम् ॥ १०२ ॥
भावार्थ
वहाँ उन दोनों भाइयोंने मृगया-विनोदके लिये वराह, ऋश्य, पृषत् और महारुरु—इन चार महामृगोंपर बाणोंका प्रहार किया । तत्पश्चात् जब उन्हें भूख लगी, तब पवित्र कन्द-मूल आदि लेकर सायंकालके समय ठहरनेके लिये ( वे सीताजीके साथ ) एक वृक्षके नीचे चले गये ॥ १०२ ॥
गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें