अयोध्याकाण्ड, सर्ग 33
दत्त्वा तु सह वैदेह्या ब्राह्मणेभ्यो धनं बहु । जग्मतुः पितरं द्रष्टुं सीतया सह राघवौ ॥ १ ॥
भावार्थ
विदेहकुमारी सीताके साथ श्रीराम और लक्ष्मण ब्राह्मणोंको बहुत-सा धन दान करके वन जानेके लिये उद्यत हो पिताका दर्शन करनेके लिये गये ॥ १ ॥
ततो गृहीते प्रेष्याभ्यामशोभेतां तदायुधे । मालादामभिरासक्ते सीतया समलंकृते ॥ २ ॥
भावार्थ
उनके साथ दो सेवक श्रीराम और लक्ष्मणके वे धनुष आदि आयुध लेकर चले, जिन्हें फूलकी मालाओंसे सजाया गया था और सीताजीने पूजाके लिये चढ़ाये हुए चन्दन आदिसे अलंकृत किया था । उन दोनोंके आयुधोंकी उस समय बड़ी शोभा हो रही थी ॥ २ ॥
ततः प्रासादहर्म्याणि विमानशिखराणि च । अभिरुह्य जनः श्रीमानुदासीनो व्यलोकयत् ॥ ३ ॥
भावार्थ
उस अवसरपर धनी लोग प्रासादों ( तिमंजिले महलों ), हर्म्यगृहों ( राजभवनों ) तथा विमानों ( सात मंजिले महलों ) की ऊपरी छतोंपर चढ़कर उदासीन भावसे उन तीनोंकी ओर देखने लगे ॥ ३ ॥
न हि रथ्याः सुशक्यन्ते गन्तुं बहुजनाकुलाः । आरुह्य तस्मात् प्रासादाद् दीनाः पश्यन्ति राघवम्॥४॥
भावार्थ
उस समय सड़कें मनुष्योंकी भीड़से भरी थीं । इस लिये उनपर सुगमतापूर्वक चलना कठिन हो गया था । अतः अधिकांश मनुष्य प्रासादों ( तिमंजिले मकानों ) पर चढ़कर वहींसे दुखी होकर श्रीरामचन्द्रजीकी ओर देख रहे थे ॥ ४ ॥
पदातिं सानुजं दृष्ट्वा ससीतं च जनास्तदा । ऊचुर्बहुजना वाचः शोकोपहतचेतसः ॥ ५ ॥
भावार्थ
श्रीरामको अपने छोटे भाई लक्ष्मण और पत्नी सीताके साथ पैदल जाते देख बहुत-से मनुष्योंका हृदय शोकसे व्याकुल हो उठा। वे खेदपूर्वक कहने लगे—॥ ५ ॥
यं यान्तमनुयाति स्म चतुरङ्गबलं महत् । तमेकं सीतया सार्धमनुयाति स्म लक्ष्मणः ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘हाय ! यात्राके समय जिनके पीछे विशाल चतुरङ्गिणी सेना चलती थी, वे ही श्रीराम आज अकेले जा रहे हैं और उनके पीछे सीताके साथ लक्ष्मण चल रहे हैं ॥ ६ ॥
ऐश्वर्यस्य रसज्ञः सन् कामानां चाकरो महान् । नेच्छत्येवानृतं कर्तुं वचनं धर्मगौरवात् ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘जो ऐश्वर्यके सुखका अनुभव करनेवाले तथा भोग्य वस्तुओंके महान् भण्डार थे—जहाँ सबकी कामनाएँ पूर्ण होती थीं, वे ही श्रीराम आज धर्मका गौरव रखनेके लिये पिताकी बात झूठी करना नहीं चाहते हैं ॥ ७ ॥
या न शक्या पुरा द्रष्टुं भूतैराकाशगैरपि । तामद्य सीतां पश्यन्ति राजमार्गगता जनाः ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘ओह ! पहले जिसे आकाशमें विचरनेवाले प्राणी भी नहीं देख पाते थे, उसी सीताको इस समय सड़कोंपर खड़े हुए लोग देख रहे हैं ॥ ८ ॥
अङ्गरागोचितां सीतां रक्तचन्दनसेविनीम् । वर्षमुष्णं च शीतं च नेष्यत्याशु विवर्णताम् ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘सीता अङ्गराग-सेवनके योग्य हैं, लाल चन्दनका सेवन करनेवाली हैं। अब वर्षा, गर्मी और सर्दी शीघ्र ही इनके अङ्गोंकी कान्ति फीकी कर देगी ॥ ९ ॥
अद्य नूनं दशरथः सत्त्वमाविश्य भाषते । नहि राजा प्रियं पुत्रं विवासयितुमर्हति ॥ १० ॥
भावार्थ
‘निश्चय ही आज राजा दशरथ किसी पिशाचके आवेशमें पड़कर अनुचित बात कह रहे हैं; क्योंकि अपनी स्वाभाविक स्थितिमें रहनेवाला कोई भी राजा अपने प्यारे पुत्रको घरसे निकाल नहीं सकता ॥ १० ॥
निर्गुणस्यापि पुत्रस्य कथं स्याद् विनिवासनम् । किं पुनर्यस्य लोकोऽयं जितो वृत्तेन केवलम् ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘पुत्र यदि गुणहीन हो तो भी उसे घरसे निकाल देनेका साहस कैसे हो सकता है ? फिर जिसके केवल चरित्रसे ही यह सारा संसार वशीभूत हो जाता है, उसको वनवास देनेकी तो बात ही कैसे की जा सकती है ? ॥ ११ ॥
आनृशंस्यमनुक्रोशः श्रुतं शीलं दमः शमः । राघवं शोभयन्त्येते षड्गुणाः पुरुषर्षभम् ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘क्रूरताका अभाव, दया, विद्या, शील, दम ( इन्द्रियसंयम ) और शम ( मनोनिग्रह )–ये छः गुण नरश्रेष्ठ श्रीरामको सदा ही सुशोभित करते हैं ॥ १२ ॥
तस्मात् तस्योपघातेन प्रजाः परमपीडिताः । औदकानीव सत्त्वानि ग्रीष्मे सलिलसंक्षयात् ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘अतः इनके ऊपर आघात करने—इनके राज्याभिषेकमें विघ्न डालनेसे प्रजाको उसी तरह महान् क्लेश पहुँचा है, जैसे गर्मीमें जलाशयका पानी सूख जानेसे उसके भीतर रहनेवाले जीव तड़पने लगते हैं ॥ १३ ॥
पीडया पीडितं सर्वं जगदस्य जगत्पतेः । मूलस्येवोपघातेन वृक्षः पुष्पफलोपगः ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘इन जगदीश्वर श्रीरामकी व्यथासे सम्पूर्ण जगत् व्यथित हो उठा है, जैसे जड़ काट देनेसे पुष्प और फलसहित सारा वृक्ष सूख जाता है ॥ १४ ॥
मूलं ह्येष मनुष्याणां धर्मसारो महाद्युतिः । पुष्पं फलं च पत्रं च शाखाश्चास्येतरे जनाः ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘ये महान् तेजस्वी श्रीराम सम्पूर्ण मनुष्योंके मूल हैं, धर्म ही इनका बल है । जगत्के दूसरे प्राणी पत्र, पुष्प, फल और शाखाएँ हैं ॥ १५ ॥
ते लक्ष्मण इव क्षिप्रं सपत्न्यः सहबान्धवाः । गच्छन्तमनुगच्छामो येन गच्छति राघवः ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘अतः हमलोग भी लक्ष्मणकी भाँति पत्नी और बन्धु-बान्धवोंके साथ शीघ्र ही इन जानेवाले श्रीरामके ही पीछे-पीछे चल दें। जिस मार्गसे श्रीरघुनाथजी जा रहे हैं, उसीका हम भी अनुसरण करें ॥ १६ ॥
उद्यानानि परित्यज्य क्षेत्राणि च गृहाणि च । एकदुःखसुखा राममनुगच्छाम धार्मिकम् ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘बाग-बगीचे, घर-द्वार और खेती-बारी—सब छोड़कर धर्मात्मा श्रीरामका अनुगमन करें। इनके दुःख-सुखके साथी बनें ॥ १७ ॥
समुद्धृतनिधानानि परिध्वस्ताजिराणि च । उपात्तधनधान्यानि हृतसाराणि सर्वशः ॥ १८ ॥ रजसाभ्यवकीर्णानि परित्यक्तानि दैवतैः । मूषकैः परिधावद्भिरुद्बिलैरावृतानि च ॥ १९ ॥ अपेतोदकधूमानि हीनसम्मार्जनानि च । प्रणष्टबलिकर्मेज्यामन्त्रहोमजपानि च ॥ २० ॥ दुष्कालेनेव भग्नानि भिन्नभाजनवन्ति च । अस्मत्यक्तानि कैकेयी वेश्मानि प्रतिपद्यताम् ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘हम अपने घरोंकी गड़ी हुई निधि निकाल लें। आँगन-की फर्श खोद डालें। सारा धन-धान्य साथ ले लें। सारी आवश्यक वस्तुएँ हटा लें। इनमें चारों ओर धूल भर जाय। देवता इन घरोंको छोड़कर भाग जायँ। चूहे बिलसे बाहर निकलकर इनमें चारों ओर दौड़ लगाने लगें और उनसे ये घर भर जायँ। इनमें न कभी आग जले, न पानी रहे और न झाड़ू ही लगे। यहाँ बलिवैश्वदेव, यज्ञ, मन्त्रपाठ, होम और जप बंद हो जाय। मानो बड़ा भारी अकाल पड़ गया हो, इस प्रकार ये सारे घर ढह जायँ। इनमें टूटे बर्तन बिखरे पड़े हों और हम सदाके लिये इन्हें छोड़ दें–ऐसी दशामें इन घरोंपर कैकेयी आकर अधिकार कर ले ॥ १८–२१ ॥
वनं नगरमेवास्तु येन गच्छति राघवः । अस्माभिश्च परित्यक्तं पुरं सम्पद्यतां वनम् ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘जहाँ पहुँचनेके लिये ये श्रीरामचन्द्रजी जा रहे हैं, वह वन ही नगर हो जाय और हमारे छोड़ देनेपर यह नगर भी वनके रूपमें परिणत हो जाय ॥ २२ ॥
बिलानि दंष्ट्रिणः सर्वे सानूनि मृगपक्षिणः । त्यजन्त्वस्मद्भयाद्भीता गजाः सिंहा वनान्यपि ।२३।
भावार्थ
‘वनमें हमलोगोंके भयसे साँप अपने बिल छोड़कर भाग जायँ । पर्वतपर रहनेवाले मृग और पक्षी उसके शिखरोंको छोड़ दें तथा हाथी और सिंह भी उन वनोंको त्यागकर दूर चले जायँ ॥ २३ ॥
अस्मत्यकं प्रपद्यन्तु सेव्यमानं त्यजन्तु च। तृणमांसफलादानां देशं व्यालमृगद्विजम् ॥ २४ ॥ प्रपद्यतां हि कैकेयी सपुत्रा सह बान्धवैः। राघवेण वयं सर्वे वने वत्स्याम निर्वृताः ॥ २५ ॥
भावार्थ
‘वे सर्प आदि उन स्थानोंमें चले जायँ, जिन्हें हमलोगोंने छोड़ रखा है और उन स्थानोंको त्याग दें, जिनका हम सेवन करते हैं। यह देश घास चरनेवाले पशुओं, मांसभक्षी हिंसक जन्तुओं और फल खानेवाले पक्षियोंका निवासस्थान बन जाय। यहाँ सर्प, पशु और पक्षी रहने लगें। उस दशामें पुत्र और बन्धु-बान्धवोंसहित कैकेयी इसे अपने अधिकारमें कर ले। हम सब लोग वनमें श्रीरघुनाथजीके साथ बड़े आनन्दसे रहेंगे’ ॥ २४-२५ ॥
इत्येवं विविधा वाचो नानाजनसमीरिताः। शुश्राव राघवः श्रुत्वा न विचक्रेऽस्य मानसम् ॥ २६ ॥ स तु वेश्म पुनर्मातुः कैलासशिखरप्रभम्। अभिचक्राम धर्मात्मा मत्तमातङ्गविक्रमः ॥ २७ ॥
भावार्थ
इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजीने बहुत-से मनुष्योंके मुँहसे निकली हुई तरह-तरहकी बातें सुनीं; किंतु सुनकर भी उनके मनमें कोई विकार नहीं हुआ। मतवाले गजराजके समान पराक्रमी धर्मात्मा श्रीराम पुनः माता कैकेयीके कैलासशिखरके सदृश शुभ्र भवनमें गये ॥ २६-२७ ॥
विनीतवीरपुरुषं प्रविश्य तु नृपालयम्। ददर्शावस्थितं दीनं सुमन्त्रमविदूरतः ॥ २८ ॥
भावार्थ
विनयशील वीर पुरुषोंसे युक्त उस राजभवनमें प्रवेश करके उन्होंने देखा—सुमन्त्र पास ही दुखी होकर खड़े हैं ॥ २८ ॥
प्रतीक्षमाणोऽभिजनं तदार्त- मनार्तरूपः प्रहसन्निवाथ। जगाम रामः पितरं दिदृक्षुः पितुर्निदेशं विधिवच्चिकीर्षुः ॥ २९ ॥
भावार्थ
पूर्वजोंकी निवासभूमि अवधके मनुष्य वहाँ शोकसे आतुर होकर खड़े थे। उन्हें देखकर भी श्रीराम स्वयं शोकसे पीड़ित नहीं हुए—उनके शरीरपर व्यथाका कोई चिह्न प्रकट नहीं हुआ। वे पिताकी आज्ञाका विधिपूर्वक पालन करनेकी इच्छासे उनका दर्शन करनेके लिये हँसते हुए-से आगे बढ़े ॥ २९ ॥
तत्पूर्वमैक्ष्वाकसुतो महात्मा रामो गमिष्यन् नृपमार्तरूपम्। व्यतिष्ठत प्रेक्ष्य तदा सुमन्त्रं पितुर्महात्मा प्रतिहारणार्थम् ॥ ३० ॥
भावार्थ
शोकाकुलरूपसे पड़े हुए राजाके पास जानेवाले महात्मा महामना इक्ष्वाकुकुलनन्दन श्रीराम वहाँ पहुँचनेसे पहले सुमन्त्रको देखकर पिताके पास अपने आगमनकी सूचना भेजनेके लिये उस समय वहीं ठहर गये ॥ ३० ॥
पितुर्निदेशेन तु धर्मवत्सलो वनप्रवेशे कृतबुद्धिनिश्चयः। स राघवः प्रेक्ष्य सुमन्त्रमब्रवी- न्निवेदयस्वागमनं नृपाय मे ॥ ३१ ॥
भावार्थ
पिताके आदेशसे वनमें प्रवेश करनेका बुद्धिपूर्वक निश्चय करके आये हुए धर्मवत्सल श्रीरामचन्द्रजी सुमन्त्रकी ओर देखकर बोले—‘आप महाराजको मेरे आगमनकी सूचना दे दें’ ॥ ३१ ॥
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