अयोध्याकाण्ड, सर्ग 28
स एवं ब्रुवर्ती सीतां धर्मज्ञां धर्मवत्सलः । न नेतुं कुरुते बुद्धिं वने दुःखानि चिन्तयन् ॥ १ ॥
भावार्थ
धर्मको जाननेवाली सीताके इस प्रकार कहनेपर भी धर्मवत्सल श्रीरामने वनमें होनेवाले दुःखोंको सोचकर उन्हें साथ ले जानेका विचार नहीं किया ॥ १ ॥
सान्त्वयित्वा ततस्तां तु बाष्पदूषितलोचनाम् । निवर्तनार्थे धर्मात्मा वाक्यमेतदुवाच ह ॥ २ ॥
भावार्थ
सीताके नेत्रोंमें आँसू भरे हुए थे । धर्मात्मा श्रीराम उन्हें वनवासके विचारसे निवृत्त करनेके लिये सान्त्वना देते हुए इस प्रकार बोले—॥ २ ॥
सीते महाकुलीनासि धर्मे च निरता सदा । इहाचरस्व धर्मं त्वं यथा मे मनसः सुखम् ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘सीते ! तुम अत्यन्त उत्तम कुलमें उत्पन्न हुई हो और सदा धर्मके आचरणमें ही लगी रहती हो; अतः यहीं रहकर धर्मका पालन करो, जिससे मेरे मनको संतोष हो ॥ ३ ॥
सीते यथा त्वां वक्ष्यामि तथा कार्यं त्वयाबले । वने दोषा हि बहवो वसतस्तान् निबोध मे ॥ ४ ॥ सीते विमुच्यतामेषा वनवासकृता मतिः। बहुदोषं हि कान्तारं वनमित्यभिधीयते ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘सीते ! मैं तुमसे जैसा कहूँ, वैसा ही करना तुम्हारा कर्तव्य है । तुम अबला हो, वनमें निवास करनेवाले मनुष्यको बहुत-से दोष प्राप्त होते हैं; उन्हें बता रहा हूँ, मुझसे सुनो ॥ ‘सीते ! वनवासके लिये चलनेका यह विचार छोड़ दो, वनको अनेक प्रकारके दोषोंसे व्याप्त और दुर्गम बताया जाता है ॥ ५ ॥
हितबुद्ध्या खलु वचो मयैतदभिधीयते। सदा सुखं न जानामि दुःखमेव सदा वनम् ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘तुम्हारे हितकी भावनासे ही मैं ये सब बातें कह रहा हूँ। जहाँतक मेरी जानकारी है, वनमें सदा सुख नहीं मिलता। वहाँ तो सदा दुःख ही मिला करता है ॥ ६ ॥
गिरिनिर्झरसम्भूता गिरिनिर्दरिवासिनाम्। सिंहानां निनदा दुःखाः श्रोतुं दुःखमतो वनम् ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘पर्वतोंसे गिरनेवाले झरनोंके शब्दको सुनकर उन पर्वतोंकी कन्दराओंमें रहनेवाले सिंह दहाड़ने लगते हैं। उनकी वह गर्जना सुननेमें बड़ी दुःखदायिनी प्रतीत होती है, इसलिये वन दुःखमय ही है ॥ ७ ॥
क्रीडमानाश्च विस्रब्धा मत्ताः शून्ये तथा मृगाः। दृष्ट्वा समभिवर्तन्ते सीते दुःखमतो वनम् ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘सीते ! सूने वनमें निर्भय होकर क्रीड़ा करनेवाले मतवाले जंगली पशु मनुष्यको देखते ही उसपर चारों ओरसे टूट पड़ते हैं; अतः वन दुःखसे भरा हुआ है ॥ ८ ॥
सग्राहाः सरितश्चैव पङ्कवत्यस्तु दुस्तराः। मत्तैरपि गजैर्नित्यमतो दुःखतरं वनम् ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘वनमें जो नदियाँ होती हैं, उनके भीतर ग्राह निवास करते हैं, उनमें कीचड़ अधिक होनेके कारण उन्हें पार करना अत्यन्त कठिन होता है। इसके सिवा वनमें मतवाले हाथी सदा घूमते रहते हैं। इन सब कारणोंसे वन बहुत ही दुःखदायक होता है ॥ ९ ॥
लताकण्टकसंकीर्णाः कृकवाकूपनादिताः। निरपाश्च सुदुःखाश्च मार्गा दुःखमतो वनम् ॥ १० ॥
भावार्थ
‘वनके मार्ग लताओं और काँटोंसे भरे रहते हैं। वहाँ जंगली मुर्गे बोला करते हैं, उन मार्गोंपर चलनेमें बड़ा कष्ट होता है तथा वहाँ आस-पास जल नहीं मिलता, इससे वनमें दुःख-ही-दुःख है ॥ १० ॥
सुप्यते पर्णशय्यासु स्वयंभग्नासु भूतले। रात्रिषु श्रमखिन्नेन तस्माद् दुःखमतो वनम् ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘दिनभरके परिश्रमसे थके-माँदे मनुष्यको रातमें जमीनके ऊपर अपने-आप गिरे हुए सूखे पत्तोंके बिछौनेपर सोना पड़ता है, अतः वन दुःखसे भरा हुआ है ॥ ११ ॥
अहोरात्रं च संतोषः कर्तव्यो नियतात्मना। फलैर्वृक्षावपतितैः सीते दुःखमतो वनम् ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘सीते ! वहाँ मनको वशमें रखकर वृक्षोंसे स्वतः गिरे हुए फलोंके आहारपर ही दिन-रात संतोष करना पड़ता है, अतः वन दुःख देनेवाला ही है ॥ १२ ॥
उपवासश्च कर्तव्यो यथा प्राणेन मैथिलि। जटाभारश्च कर्तव्यो वल्कलाम्बरधारणम् ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘मिथिलेशकुमारी ! अपनी शक्तिके अनुसार उपवास करना, सिरपर जटाका भार ढोना और वल्कल वस्त्र धारण करना—यही वहाँकी जीवनशैली है ॥ १३ ॥
देवतानां पितृणां च कर्तव्यं विधिपूर्वकम्। प्राप्तानामतिथीनां च नित्यशः प्रतिपूजनम् ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘देवताओंका, पितरोंका तथा आये हुए अतिथियोंका प्रतिदिन शास्त्रोक्तविधिके अनुसार पूजन करना—यह वनवासीका प्रधान कर्तव्य है ॥ १४ ॥
कार्यस्त्रिरभिषेकश्च काले काले च नित्यशः। चरतां नियमेनैव तस्माद् दुःखतरं वनम् ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘वनवासीको प्रतिदिन नियमपूर्वक तीनों समय स्नान करना होता है। इसलिये वन बहुत ही कष्ट देनेवाला है ॥१५॥
उपहारश्च कर्तव्यः कुसुमैः स्वयमाहृतैः। आर्षेण विधिना वेद्यां सीते दुःखमतो वनम् ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘सीते ! वहाँ स्वयं चुनकर लाये हुए फूलोंद्वारा वेदोक्त-विधिसे वेदीपर देवताओंकी पूजा करनी पड़ती है। इसलिये वनको कष्टप्रद कहा गया है ॥ १६ ॥
यथालब्धेन कर्तव्यः संतोषस्तेन मैथिलि। यताहारैर्वनचरैः सीते दुःखमतो वनम् ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘मिथिलेशकुमारी, जानकी ! वनवासियोंको जब जैसा आहार मिल जाय उसीपर संतोष करना पड़ता है; अतः वन दुःखरूप ही है ॥ १७ ॥
अतीव वातस्तिमिरं बुभुक्षा चाति नित्यशः। भयानि च महान्त्यत्र ततो दुःखतरं वनम् ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘वनमें प्रचण्ड आँधी, घोर अन्धकार, प्रतिदिन भूखका कष्ट तथा और भी बड़े-बड़े भय प्राप्त होते हैं, अतः वन अत्यन्त कष्टप्रद है ॥ १८ ॥
सरीसृपाश्च बहवो बहुरूपाश्च भामिनि। चरन्ति पथि ते दर्पात् ततो दुःखतरं वनम् ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘भामिनि ! वहाँ बहुत-से पहाड़ी सर्प, जो अनेक प्रकारके रूपवाले होते हैं, दर्पवश बीच रास्तेमें विचरते रहते हैं; अतः वन अत्यन्त कष्टदायक है ॥ १९ ॥
नदीनीलयनाः सर्पा नदीकुटिलगामिनः। तिष्ठन्त्यावृत्य पन्थानमतो दुःखतरं वनम् ॥ २० ॥
भावार्थ
‘जो नदियोंमें निवास करते और नदियोंके समान ही कुटिल गतिसे चलते हैं, ऐसे बहुसंख्यक सर्प वनमें रास्तेको घेरकर पड़े रहते हैं; इसलिये वन बहुत ही कष्टदायक है ॥२०॥
पतङ्गा वृश्चिकाः कीटा दंशाश्च मशकैः सह । बाधन्ते नित्यमबले सर्वं दुःखमतो वनम् ॥ २१ ॥ द्रुमाः कण्टकिनश्चैव कुशाः काशाश्च भामिनि । वने व्याकुलशाखाग्रास्तेन दुःखमतो वनम् ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘अबले ! पतंगे, बिच्छू, कीड़े, डाँस और मच्छर वहाँ सदा कष्ट पहुँचाते रहते हैं; अतः सारा वन दुःखरूप ही है ॥ ‘भामिनि ! वनमें काँटेदार वृक्ष, कुश और कास होते हैं, जिनकी शाखाओंके अग्रभाग सब ओर फैले हुए होते हैं; इसलिये वन विशेष कष्टदायक होता है ॥ २२ ॥
कायक्लेशाश्च बहवो भयानि विविधानि च । अरण्यवासे वसतो दुःखमेव सदा वनम् ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘वनमें निवास करनेवाले मनुष्यको बहुत-से शारीरिक क्लेशों और नाना प्रकारके भयोंका सामना करना पड़ता है, अतः वन सदा दुःखरूप ही होता है ॥ २३ ॥
क्रोधलोभौ विमोक्तव्यौ कर्तव्या तपसे मतिः । न भेतव्यं च भेतव्ये दुःखं नित्यमतो वनम् ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘वहाँ क्रोध और लोभको त्याग देना होता है, तपस्यामें मन लगाना पड़ता है और जहाँ भयका स्थान है, वहाँ भी भयभीत न होनेकी आवश्यकता होती है; अतः वनमें सदा दुःख-ही-दुःख है ॥ २४ ॥
तदलं ते वनं गत्वा क्षेमं नहि वनं तव । विमृशन्निव पश्यामि बहुदोषकरं वनम् ॥ २५ ॥
भावार्थ
‘इसलिये तुम्हारा वनमें जाना ठीक नहीं है । वहाँ जाकर तुम सकुशल नहीं रह सकती। मैं बहुत सोच-विचारकर देखता और समझता हूँ—कि वनमें रहना अनेक दोषोंका उत्पादक बहुत ही कष्टदायक है ॥ २५ ॥
वनं तु नेतुं न कृता मतिर्यदा बभूव रामेण तदा महात्मना । न तस्य सीता वचनं चकार तं ततोऽब्रवीद् राममिदं सुदुःखिता ॥ २६ ॥
भावार्थ
जब महात्मा श्रीरामने उस समय सीताको वनमें ले जानेका विचार नहीं किया, तब सीताने भी उनकी उस बातको नहीं माना । वे अत्यन्त दुखी होकर श्रीरामसे इस प्रकार बोलीं ॥ २६ ॥
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