अयोध्याकाण्ड, सर्ग 13
अतदर्हं महाराजं शयानमतथोचितम् । ययातिमिव पुण्यान्ते देवलोकात् परिच्युतम् ॥ १ ॥ अनर्थरूपासिद्धार्था ह्यभीता भयदर्शिनी । पुनराकारयामास तमेव वरमङ्गना ॥ २ ॥
भावार्थ
महाराज दशरथ उस अयोग्य और अनुचित अवस्थामें पृथ्वीपर पड़े थे । उस समय वे पुण्य समाप्त होनेपर देवलोकसे भ्रष्ट हुए राजा ययातिके समान जान पड़ते थे । उनकी वैसी दशा देख अनर्थकी साक्षात् मूर्ति कैकेयी, जिसका प्रयोजन अभीतक सिद्ध नहीं हुआ था, जो लोकापवादका भय छोड़ चुकी थी और श्रीरामसे भरतके लिये भय देखती थी, पुनः उसी वरके लिये राजाको सम्बोधित करके कहने लगी—॥१-२॥
त्वं कत्थसे महाराज सत्यवादी दृढव्रतः । मम चेदं वरं कस्माद् विधारयितुमिच्छसि ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘महाराज ! आप तो डींग मारा करते थे कि मैं बड़ा सत्यवादी और दृढ़प्रतिज्ञ हूँ, फिर आप मेरे इस वरदानको क्यों हजम कर जाना चाहते हैं ?’ ॥ ३ ॥
एवमुक्तस्तु कैकेय्या राजा दशरथस्तदा । प्रत्युवाच ततः क्रुद्धो मुहूर्ते विह्वलन्निव ॥ ४ ॥
भावार्थ
कैकेयीके ऐसा कहनेपर राजा दशरथ दो घड़ीतक व्याकुलकी-सी अवस्थामें रहे । तत्पश्चात् कुपित होकर उसे इस प्रकार उत्तर देने लगे—॥ ४ ॥
मृते मयि गते रामे वनं मनुजपुङ्गवे । हन्तानार्ये ममामित्रे सकामा सुखिनी भव ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘ओ नीच ! तू मेरी शत्रु है । नरश्रेष्ठ श्रीरामके वनमें चले जानेपर जब मेरी मृत्यु हो जायगी, उस समय तू सफलमनोरथ होकर सुखसे रहना ॥ ५ ॥
स्वर्गेऽपि खलु रामस्य कुशलं दैवतैरहम् । प्रत्यादेशादभिहितं धारयिष्ये कथं बत ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘हाय ! स्वर्गमें भी जब देवता मुझसे श्रीरामका कुशल-समाचार पूछेंगे, उस समय मैं उन्हें क्या उत्तर दूँगा ? यदि कहूँ, उन्हें वनमें भेज दिया तो उसके बाद वे लोग जो मेरे प्रति धिक्कारपूर्ण बात कहेंगे, उसे कैसे सह सकूँगा ? इसके लिये मुझे बड़ा खेद है ॥ ६ ॥
कैकेय्याः प्रियकामेन रामः प्रव्राजितो वनम् । यदि सत्यं ब्रवीम्येतत् तदसत्यं भविष्यति ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘कैकेयीका प्रिय करनेकी इच्छासे उसके माँगे हुए वरदानके अनुसार मैंने श्रीरामको वनमें भेज दिया, यदि ऐसा कहूँ और इसे सत्य बताऊँ तो मेरी वह पहली बात असत्य हो जायगी, जिसके द्वारा मैंने रामको राज्य देनेका आश्वासन दिया है ॥ ७ ॥
अपुत्रेण मया पुत्रः श्रमेण महता महान् । रामो लब्धो महातेजाः स कथं त्यज्यते मया ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘मैं पहले पुत्रहीन था, फिर महान् परिश्रम करके मैंने जिन महातेजस्वी महापुरुष श्रीरामको पुत्ररूपमें प्राप्त किया है, उनका मेरे द्वारा त्याग कैसे किया जा सकता है ! ॥ ८ ॥
शूरश्च कृतविद्यश्च जितक्रोधः क्षमापरः । कथं कमलपत्राक्षो मया रामो विवास्यते ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘जो शूरवीर, विद्वान्, क्रोधको जीतनेवाले और क्षमापरायण हैं, उन कमलनयन श्रीरामको मैं देशनिकाला कैसे दे सकता हूँ ? ॥ ९ ॥
कथमिन्दीवरश्यामं दीर्घबाहुं महाबलम् । अभिराममहं रामं स्थापयिष्यामि दण्डकान् ॥ १० ॥
भावार्थ
‘जिनकी अङ्गकान्ति नीलकमलके समान श्याम है, भुजाएँ विशाल और बल महान् हैं, उन नयनाभिराम श्रीरामको मैं दण्डकवनमें कैसे भेज सकूँगा ! ॥ १० ॥
सुखानामुचितस्यैव दुःखैरनुचितस्य च । दुःखं नामानुपश्येयं कथं रामस्य धीमतः ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘जो सदा सुख भोगनेके ही योग्य हैं, कदापि दुःख भोगनेके योग्य नहीं हैं, उन बुद्धिमान् श्रीरामको दुःख उठाते मैं कैसे देख सकता हूँ ! ॥ ११ ॥
यदि दुःखमकृत्वा तु मम संक्रमणं भवेत् । अदुःखार्हस्य रामस्य ततः सुखमाप्नुयाम् ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘जो दुःख भोगनेके योग्य नहीं हैं, उन श्रीरामको यह वनवासका दुःख दिये बिना ही यदि मैं इस संसारसे विदा हो जाता तो मुझे बड़ा सुख मिलता ॥ १२ ॥
नृशंसे पापसंकल्पे रामं सत्यपराक्रमम् । किं विप्रियेण कैकेयि प्रियं योजयसे मम ॥ १३ ॥ अकीर्तिरतुला लोके ध्रुवं परिभविष्यति ।
भावार्थ
‘ओ पापपूर्ण विचार रखनेवाली पाषाणहृदया कैकेयि ! सत्यपराक्रमी श्रीराम मुझे बहुत प्रिय हैं, तू मुझसे उनका बिछोह क्यों करा रही है ! अरी ! ऐसा करनेसे निश्चय ही संसारमें तेरी वह अपकीर्ति फैलेगी, जिसकी कहीं तुलना नहीं है’ ॥ १३½ ॥
तथा विलपतस्तस्य परिभ्रमितचेतसः ॥ १४ ॥ अस्तमभ्यागमत् सूर्यो रजनी चाभ्यवर्तत ।
भावार्थ
इस प्रकार विलाप करते-करते राजा दशरथका चित्त अत्यन्त व्याकुल हो उठा । इतनेमें ही सूर्यदेव अस्ताचलको चले गये और प्रदोषकाल आ पहुँचा ॥ १४½ ॥
सा त्रियामा तदार्तस्य चन्द्रमण्डलमण्डिता ॥ १५ ॥ राज्ञो विलपमानस्य न व्यभासत शर्वरी ।
भावार्थ
वह तीन पहरोंवाली रात यद्यपि चन्द्रमण्डलकी चारु-चन्द्रिकासे आलोकित हो रही थी, तो भी उस समय आर्त होकर विलाप करते हुए राजा दशरथके लिये प्रकाश या उल्लास न दे सकी ॥ १५½ ॥
सदैवोष्णं विनिःश्वस्य वृद्धो दशरथो नृपः ॥ १६ ॥ विललापार्तवद् दुःखं गगनासक्तलोचनः ।
भावार्थ
बूढ़े राजा दशरथ निरन्तर गरम उच्छ्वास लेते हुए आकाशकी ओर दृष्टि लगाये आर्तकी भाँति दुःखपूर्ण विलाप करने लगे—॥ १६½ ॥
न प्रभातं त्वयेच्छामि निशे नक्षत्रभूषिते ॥ १७ ॥ क्रियतां मे दया भद्रे मयायं रचितोऽञ्जलिः ।
भावार्थ
‘नक्षत्रमालाओंसे अलंकृत कल्याणमयी रात्रिदेवि ! मैं नहीं चाहता कि तुम्हारे द्वारा प्रभात-काल लाया जाय । मुझपर दया करो । मैं तुम्हारे सामने हाथ जोड़ता हूँ ॥१७½॥
अथवा गम्यतां शीघ्रं नाहमिच्छामि निर्घृणाम् ॥ १८ ॥ नृशंसां कैकेयीं द्रष्टुं यत्कृते व्यसनं मम ।
भावार्थ
‘अथवा शीघ्र बीत जाओ; क्योंकि जिसके कारण मुझे भारी संकट प्राप्त हुआ है, उस निर्दय और क्रूर कैकेयीको अब मैं नहीं देखना चाहता’ ॥ १८½ ॥
एवमुक्त्वा ततो राजा कैकेयीं संयताञ्जलिः ॥ १९ ॥ प्रसादयामास पुनः कैकेयीं राजधर्मवित् ।
भावार्थ
कैकेयीसे ऐसा कहकर राजधर्मके ज्ञाता राजा दशरथने पुनः हाथ जोड़कर उसे मनाने या प्रसन्न करनेकी चेष्टा आरम्भ की—॥ १९½ ॥
साधुवृत्तस्य दीनस्य त्वद्गतस्य गतायुषः ॥ २० ॥ प्रसादः क्रियतां भद्रे देवि राज्ञो विशेषतः ।
भावार्थ
‘कल्याणमयी देवि ! जो सदाचारी, दीन, तेरे आश्रित, गतायु ( मरणासन्न ) और विशेषतः राजा है—ऐसे मुझ दशरथपर कृपा कर ॥ २०½ ॥
शून्ये न खलु सुश्रोणि मयेदं समुदाहृतम् ॥ २१ ॥ कुरु साधुप्रसादं मे बाले सहृदया ह्यसि ।
भावार्थ
‘सुन्दर कटिप्रदेशवाली केकयनन्दिनि ! मैंने जो यह श्रीरामको राज्य देनेकी बात कही है, वह किसी सूने घरमें नहीं, भरी सभामें घोषित की है, अतः बाले ! तू बड़ी सहृदय है; इसलिये मुझपर भलीभाँति कृपा कर ( जिससे सभासदोंद्वारा मेरा उपहास न हो )॥ २१½ ॥
प्रसीद देवि रामो मे त्वद्दत्तं राज्यमव्ययम् ॥ २२ ॥ लभतामसितापाङ्गे यशः परमवाप्स्यसि ।
भावार्थ
‘देवि ! प्रसन्न हो जा । कजरारे नेत्रप्रान्तवाली प्रिये ! मेरे श्रीराम तेरे ही दिये हुए इस अक्षय राज्यको प्राप्त करें, इससे तुझे उत्तम यशकी प्राप्ति होगी ॥ २२½ ॥
मम रामस्य लोकस्य गुरूणां भरतस्य च । प्रियमेतद् गुरुश्रोणि कुरु चारुमुखेक्षणे ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘पृथुल नितम्बवाली देवि ! सुमुखि ! सुलोचने ! यह प्रस्ताव मुझको, श्रीरामको, समस्त प्रजावर्गको, गुरुजनोंको तथा भरतको भी प्रिय होगा, अतः इसे पूर्ण कर’ ॥ २३ ॥
विशुद्धभावस्य हि दुष्टभावा दीनस्य ताम्राश्रुकलस्य राज्ञः । श्रुत्वा विचित्रं करुणं विलापं भर्तुर्नृशंसा न चकार वाक्यम् ॥ २४ ॥
भावार्थ
राजाके हृदयका भाव अत्यन्त शुद्ध था, उनके आँसू-भरे नेत्र लाल हो गये थे और वे दीनभावसे विचित्र करुणाजनक विलाप कर रहे थे, किंतु मनमें दूषित विचार रखनेवाली निष्ठुर कैकेयीने पतिके उस विलापको सुनकर भी उनकी आज्ञाका पालन नहीं किया ॥ २४ ॥
ततः स राजा पुनरेव मूर्च्छितः प्रियामतुष्टां प्रतिकूलभाषिणीम् । समीक्ष्य पुत्रस्य विवासनं प्रति क्षितौ विसंज्ञो निपपात दुःखितः ॥ २५ ॥
भावार्थ
( इतनी अनुनय-विनयके बाद भी ) जब प्रिया कैकेयी किसी तरह संतुष्ट न हो सकी और बराबर प्रतिकूल बात ही मुँहसे निकालती गयी, तब पुत्रके वनवासकी बात सोचकर राजा पुनः दुःखके मारे मूर्च्छित हो गये और सुध-बुध खोकर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ २५ ॥
इतीव राज्ञो व्यथितस्य सा निशा जगाम घोरं श्वसतो मनस्विनः । विबोध्यमानः प्रतिबोधनं तथा निवारयामास स राजसत्तमः ॥ २६ ॥
भावार्थ
इस प्रकार व्यथित होकर भयंकर उच्छ्वास लेते हुए मनस्वी राजा दशरथकी वह रात धीरे-धीरे बीत गयी । प्रातःकाल राजाको जगानेके लिये मनोहर वाद्योंके साथ मङ्गल-गान होने लगा, परंतु उन राजशिरोमणिने तत्काल मनाही भेजकर वह सब बंद करा दिया ॥ २६ ॥
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