अयोध्याकाण्ड, सर्ग 113
ततः शिरसि कृत्वा तु पादुके भरतस्तदा। आरुरोह रथं हृष्टः शत्रुघ्नसहितस्तदा ॥ १ ॥
भावार्थ
तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजीकी दोनों चरणपादुकाओंको अपने मस्तकपर रखकर भरत शत्रुघ्नके साथ प्रसन्नतापूर्वक रथपर बैठे ॥ १ ॥
वसिष्ठो वामदेवश्च जाबालिश्च दृढव्रतः। अग्रतः प्रययुः सर्वे मन्त्रिणो मन्त्रपूजिताः ॥ २ ॥
भावार्थ
वसिष्ठ, वामदेव तथा दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाले जाबालि आदि सब मन्त्री, जो उत्तम मन्त्रणा देनेके कारण सम्मानित थे, आगे-आगे चले ॥ २ ॥
मन्दाकिनीं नदीं रम्यां प्राङ्मुखास्ते ययुस्तदा। प्रदक्षिणं च कुर्वाणाश्चित्रकूटं महागिरिम् ॥ ३ ॥
भावार्थ
वे सब लोग चित्रकूट नामक महान् पर्वतकी परिक्रमा करते हुए परम रमणीय मन्दाकिनी नदीको पार करके पूर्वदिशाकी ओर प्रस्थित हुए ॥ ३ ॥
पश्यन् धातुसहस्राणि रम्याणि विविधानि च। प्रययौ तस्य पार्श्वेन ससैन्यो भरतस्तदा ॥ ४ ॥
भावार्थ
उस समय भरत अपनी सेनाके साथ सहस्रों प्रकारके रमणीय धातुओंको देखते हुए चित्रकूटके किनारेसे होकर निकले ॥ ४ ॥
अदूराच्चित्रकूटस्य ददर्श भरतस्तदा । आश्रमं यत्र स मुनिर्भरद्वाजः कृतालयः ॥ ५ ॥
भावार्थ
चित्रकूटसे थोड़ी ही दूर जानेपर भरतने वह आश्रम देखा, जहाँ मुनिवर भरद्वाजजी निवास करते थे* ॥ ५ ॥
स तमाश्रममागम्य भरद्वाजस्य वीर्यवान् । अवतीर्य रथात् पादौ ववन्दे कुलनन्दनः ॥ ६ ॥
भावार्थ
अपने कुलको आनन्दित करनेवाले पराक्रमी भरत महर्षि भरद्वाजके उस आश्रमपर पहुँचकर रथसे उतर पड़े और उन्होंने मुनिके चरणोंमें प्रणाम किया ॥ ६ ॥
ततो हृष्टो भरद्वाजो भरतं वाक्यमब्रवीत् । अपि कृत्यं कृतं तात रामेण च समागतम् ॥ ७ ॥
भावार्थ
उनके आनेसे महर्षि भरद्वाजको बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने भरतसे पूछा—‘तात ! क्या तुम्हारा कार्य सम्पन्न हुआ ? क्या श्रीरामचन्द्रजीसे भेंट हुई ?’ ॥ ७ ॥
एवमुक्तः स तु ततो भरद्वाजेन धीमता । प्रत्युवाच भरद्वाजं भरतो धर्मवत्सलः ॥ ८ ॥
भावार्थ
बुद्धिमान् भरद्वाजजीके इस प्रकार पूछनेपर धर्मवत्सल भरतने उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया—॥ ८ ॥
स याच्यमानो गुरुणा मया च दृढविक्रमः । राघवः परमप्रीतो वसिष्ठं वाक्यमब्रवीत् ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘मुने ! भगवान् श्रीराम अपने पराक्रमपर दृढ़ रहनेवाले हैं । मैंने उनसे बहुत प्रार्थना की । गुरुजीने भी अनुरोध किया । तब उन्होंने अत्यन्त प्रसन्न होकर गुरुदेव वसिष्ठजीसे इस प्रकार कहा—॥ ९ ॥
पितुः प्रतिज्ञां तामेव पालयिष्यामि तत्त्वतः । चतुर्दश हि वर्षाणि या प्रतिज्ञा पितुर्मम ॥ १० ॥
भावार्थ
‘मैं चौदह वर्षोंतक वनमें रहूँ, इसके लिये मेरे पिताजीने जो प्रतिज्ञा कर ली थी, उनकी उस प्रतिज्ञाका ही मैं यथार्थरूपसे पालन करूँगा’ ॥ १० ॥
एवमुक्तो महाप्राज्ञो वसिष्ठः प्रत्युवाच ह । वाक्यज्ञो वाक्यकुशलं राघवं वचनं महत् ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘उनके ऐसा कहनेपर बातके मर्मको समझनेवाले महाज्ञानी वसिष्ठजीने बातचीत करनेमें कुशल श्रीरघुनाथजीसे यह महत्त्वपूर्ण बात कही—॥ ११ ॥
एते प्रयच्छ संहृष्टः पादुके हेमभूषिते । अयोध्यायां महाप्राज्ञ योगक्षेमकरो भव ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘महाप्राज्ञ ! तुम प्रसन्नतापूर्वक ये स्वर्णभूषित पादुकाएँ अपने प्रतिनिधिके रूपमें भरतको दे दो और इन्हींके द्वारा अयोध्याके योगक्षेमका निर्वाह करो’ ॥ १२ ॥
एवमुक्तो वसिष्ठेन राघवः प्राङ्मुखः स्थितः । पादुके हेमविकृते मम राज्याय ते ददौ ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘गुरु वसिष्ठजीके ऐसा कहनेपर पूर्वाभिमुख खड़े हुए श्रीरघुनाथजीने अयोध्याके राज्यका संचालन करनेके लिये ये दोनों स्वर्णभूषित पादुकाएँ मुझे दे दीं ॥ १३ ॥
निवृत्तोऽहमनुज्ञातो रामेण सुमहात्मना । अयोध्यामेव गच्छामि गृहीत्वा पादुके शुभे ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘तत्पश्चात् मैं महात्मा श्रीरामकी आज्ञा पाकर लौट आया हूँ और उनकी इन मङ्गलमयी चरणपादुकाओंको लेकर अयोध्याको ही जा रहा हूँ’ ॥ १४ ॥
पतच्छ्रुत्वा शुभं वाक्यं भरतस्य महात्मनः । भरद्वाजः शुभतरं मुनिर्वाक्यमुदाहरत् ॥ १५ ॥
भावार्थ
महात्मा भरतका यह शुभ वचन सुनकर भरद्वाज मुनिने यह परम मङ्गलमय बात कही—॥ १५ ॥
नैतच्चित्रं नरव्याघ्र शीलवृत्तविदां वरे । यदार्ये त्वयि तिष्ठेत्तु निम्नोत्सृष्टमिवोदकम् ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘भरत ! तुम मनुष्योंमें सिंहके समान वीर तथा शील और सदाचारके ज्ञाताओंमें श्रेष्ठ हो । जैसे जल नीची भूमि-वाले जलाशयमें सब ओरसे बहकर चला आता है, उसी प्रकार तुममें सारे श्रेष्ठ गुण स्थित हों—यह कोई आश्चर्यकी बात नहीं है ॥ १६ ॥
अनृणः स महाबाहुः पिता दशरथस्तव । यस्य त्वमीदृशः पुत्रो धर्मात्मा धर्मवत्सलः ॥ १७ ॥ तमृषिं तु महाप्राज्ञमुक्तवाक्यं कृताञ्जलिः । आमन्त्रयितुमारेभे चरणावुपगृह्य च ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘तुम्हारे पिता महाबाहु राजा दशरथ सब प्रकारसे उऋण हो गये, जिनके तुम-जैसा धर्मप्रेमी एवं धर्मात्मा पुत्र है’ ॥ उन महाज्ञानी महर्षिके ऐसा कहनेपर भरतने हाथ जोड़कर उनके चरणोंका स्पर्श किया; फिर वे उनसे जानेकी आज्ञा लेनेको उद्यत हुए ॥ १८ ॥
ततः प्रदक्षिणं कृत्वा भरद्वाजं पुनः पुनः । भरतस्तु ययौ श्रीमानयोध्यां सह मन्त्रिभिः ॥ १९ ॥
भावार्थ
तदनन्तर श्रीमान् भरत बारंबार भरद्वाज मुनिकी परिक्रमा करके मन्त्रियोंसहित अयोध्याकी ओर चल दिये ॥ १९ ॥
यानैश्च शकटैश्चैव हयैर्नागैश्च सा चमूः । पुनर्निवृत्ता विस्तीर्णा भरतस्यानुयायिनी ॥ २० ॥ ततस्ते यमुनां दिव्यां नदीं तीर्त्वोर्मिमालिनीम् । ददृशुस्तां पुनः सर्वे गङ्गां शिवजलां नदीम् ॥ २१ ॥
भावार्थ
फिर वह विस्तृत सेना रथों, छकड़ों, घोड़ों और हाथियोंके साथ भरतका अनुसरण करती हुई अयोध्याको लौटी ॥ तत्पश्चात् आगे जाकर उन सब लोगोंने तरंग-मालाओंसे सुशोभित दिव्य नदी यमुनाको पार करके पुनः शुभसलिला गङ्गाजीका दर्शन किया ॥ २१ ॥
तां रम्यजलसम्पूर्णां संतीर्य सहबान्धवः । शृङ्गवेरपुरं रम्यं प्रविवेश ससैनिकः ॥ २२ ॥
भावार्थ
फिर बन्धु-बान्धवों और सैनिकोंके साथ मनोहर जलसे भरी हुई गङ्गाके भी पार होकर वे परम रमणीय शृङ्गवेरपुरमें जा पहुँचे ॥ २२ ॥
शृङ्गवेरपुराद् भूय अयोध्यां संददर्श ह । अयोध्यां तु तदा दृष्ट्वा पित्रा भ्रात्रा विवर्जिताम् ।२३। भरतो दुःखसंतप्तः सारथिं चेदमब्रवीत् ।
भावार्थ
शृङ्गवेरपुरसे प्रस्थान करनेपर उन्हें पुनः अयोध्यापुरीका दर्शन हुआ, जो उस समय पिता और भाई दोनोंसे विहीन थी । उसे देखकर भरतने दुःखसे संतप्त हो सारथिसे इस प्रकार कहा—॥ २३½ ॥
सारथे पश्य विध्वस्ता अयोध्या न प्रकाशते ॥ २४ ॥ निराकारा निरानन्दा दीना प्रतिहतस्वना ॥ २५ ॥
भावार्थ
‘सारथि सुमन्त्रजी ! देखिये, अयोध्याकी सारी शोभा नष्ट हो गयी है; अतः यह पहलेकी भाँति प्रकाशित नहीं होती है । इसका वह सुन्दर रूप, वह आनन्द जाता रहा । इस समय यह अत्यन्त दीन और नीरव हो रही है’ ॥ २४-२५ ॥
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