Ramayana.com

अयोध्याकाण्ड, सर्ग 110

क्रुद्धमाज्ञाय रामं तु वसिष्ठः प्रत्युवाच ह । जाबालिरपि जानीते लोकस्यास्य गतागतिम् ॥ १ ॥

भावार्थ

श्रीरामचन्द्रजीको रुष्ट जानकर महर्षि वसिष्ठजीने उनसे कहा—‘रघुनन्दन ! महर्षि जाबालि भी यह जानते हैं कि इस लोकके प्राणियोंका परलोकमें जाना और आना होता रहता है ( अतः ये नास्तिक नहीं हैं ) ॥ १ ॥

निवर्तयितुकामस्तु त्वामेतद् वाक्यमब्रवीत् । इमां लोकसमुत्पत्तिं लोकनाथ निबोध मे ॥ २ ॥

भावार्थ

‘जगदीश्वर ! इस समय तुम्हें लौटानेकी इच्छासे ही इन्होंने यह नास्तिकतापूर्ण बात कही थी । तुम मुझसे इस लोककी उत्पत्तिका वृत्तान्त सुनो ॥ २ ॥

सर्वं सलिलमेवासीत् पृथिवी तत्र निर्मिता । ततः समभवद् ब्रह्मा स्वयंभूर्दैवतैः सह ॥ ३ ॥

भावार्थ

‘सृष्टिके प्रारम्भकालमें सब कुछ जलमय ही था । उस जलके भीतर ही पृथ्वीका निर्माण हुआ । तदनन्तर देवताओंके साथ स्वयंभू ब्रह्मा प्रकट हुए ॥ ३ ॥

स वराहस्ततो भूत्वा प्रोज्जहार वसुंधराम् । असृजच्च जगत् सर्वं सह पुत्रैः कृतात्मभिः ॥ ४ ॥

भावार्थ

‘इसके बाद उन भगवान् विष्णुस्वरूप ब्रह्माने ही वराहरूपसे प्रकट होकर जलके भीतरसे इस पृथ्वीको निकाला और अपने कृतात्मा पुत्रोंके साथ इस सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि की ॥ ४ ॥

आकाशप्रभवो ब्रह्मा शाश्वतो नित्य अव्ययः । तस्मान्मरीचिः संजज्ञे मरीचेः कश्यपः सुतः ॥ ५ ॥

भावार्थ

‘आकाशस्वरूप परब्रह्म परमात्मासे ब्रह्माजीका प्रादुर्भाव हुआ है, जो नित्य, सनातन एवं अविनाशी हैं । उनसे मरीचि उत्पन्न हुए और मरीचिके पुत्र कश्यप हुए ॥ ५ ॥

विवस्वान् कश्यपाज्जज्ञे मनुर्वैवस्वतः स्वयम् । स तु प्रजापतिः पूर्वमिक्ष्वाकुस्तु मनोः सुतः ॥ ६ ॥

भावार्थ

‘कश्यपसे विवस्वान्का जन्म हुआ । विवस्वान्के पुत्र साक्षात् वैवस्वत मनु हुए, जो पहले प्रजापति थे । मनुके पुत्र इक्ष्वाकु हुए ॥ ६ ॥

यस्येयं प्रथमं दत्ता समृद्धा मनुना मही । तमिक्ष्वाकुमयोध्यायां राजानं विद्धि पूर्वकम् ॥ ७ ॥

भावार्थ

‘जिन्हें मनुने सबसे पहले इस पृथ्वीका समृद्धिशाली राज्य सौंपा था, उन राजा इक्ष्वाकुको तुम अयोध्याका प्रथम राजा समझो ॥ ७ ॥

इक्ष्वाकोस्तु सुतः श्रीमान् कुक्षिरित्येव विश्रुतः । कुक्षेरथात्मजो वीरो विकुक्षिरुदपद्यत ॥ ८ ॥

भावार्थ

‘इक्ष्वाकुके पुत्र श्रीमान् कुक्षिके नामसे विख्यात हुए । कुक्षिके वीर पुत्र विकुक्षि हुए ॥ ८ ॥

विकुक्षेस्तु महातेजा बाणः पुत्रः प्रतापवान् । बाणस्य च महाबाहुरनरण्यो महातपाः ॥ ९ ॥

भावार्थ

‘विकुक्षिके महातेजस्वी प्रतापी पुत्र बाण हुए । बाणके महाबाहु पुत्र अनरण्य हुए, जो बड़े भारी तपस्वी थे ॥ ९ ॥

नानावृष्टिर्बभूवास्मिन् न दुर्भिक्षः सतां वरे । अनरण्ये महाराजे तस्करो वापि कश्चन ॥ १० ॥

भावार्थ

‘सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ महाराज अनरण्यके राज्यमें कभी अनावृष्टि नहीं हुई, अकाल नहीं पड़ा और कोई चोर भी नहीं उत्पन्न हुआ ॥ १० ॥

अनरण्यान्महाराज पृथू राजा बभूव ह । तस्मात् पृथोर्महातेजास्त्रिशङ्कुरुदपद्यत ॥ ११ ॥

भावार्थ

‘महाराज ! अनरण्यसे राजा पृथु हुए । उन पृथुसे महातेजस्वी त्रिशंकुकी उत्पत्ति हुई ॥ ११ ॥

स सत्यवचनाद् वीरः सशरीरो दिवं गतः । त्रिशङ्कोरभवत् सूनुर्धुन्धुमारो महायशाः ॥ १२ ॥

भावार्थ

‘वे वीर त्रिशंकु विश्वामित्रके सत्य वचनके प्रभावसे सदेह स्वर्गलोकको चले गये थे । त्रिशंकुके महायशस्वी धुन्धुमार हुए ॥ १२ ॥

धुन्धुमारान्महातेजा युवनाश्वो व्यजायत । युवनाश्वसुतः श्रीमान् मान्धाता समपद्यत ॥ १३ ॥

भावार्थ

‘धुन्धुमारसे महातेजस्वी युवनाश्वका जन्म हुआ । युवनाश्वके पुत्र श्रीमान् मान्धाता हुए ॥ १३ ॥

मान्धातुस्तु महातेजाः सुसंधिरुदपद्यत । सुसंधेरपि पुत्रौ द्वौ ध्रुवसंधिः प्रसेनजित् ॥ १४ ॥

भावार्थ

‘मान्धाताके महान् तेजस्वी पुत्र सुसंधि हुए । सुसंधिके दो पुत्र हुए—ध्रुवसंधि और प्रसेनजित् ॥ १४ ॥

यशस्वी ध्रुवसंधेस्तु भरतो रिपुसूदनः । भरतात् तु महाबाहोरसितो नाम जायत ॥ १५ ॥

भावार्थ

‘ध्रुवसंधिके यशस्वी पुत्र शत्रुसूदन भरत थे । महाबाहु भरतसे असित नामक पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ १५ ॥

यस्यैते प्रतिराजान उदपद्यन्त शत्रवः । हैहयास्तालजङ्घाश्च शूराश्च शशबिन्दवः ॥ १६ ॥

भावार्थ

‘जिसके शत्रुभूत प्रतिपक्षी राजा ये हैहय, तालजंघ और शूर शशबिन्दु उत्पन्न हुए थे ॥ १६ ॥

तांस्तु सर्वान् प्रतिव्यूह्य युद्धे राजा प्रवासितः । स च शैलवरे रम्ये बभूवाभिरतो मुनिः ॥ १७ ॥

भावार्थ

‘उन सबका सामना करनेके लिये सेनाका व्यूह बनाकर युद्धके लिये डटे रहनेपर भी शत्रुओंकी संख्या अधिक होनेके कारण राजा असितको हारकर परदेशकी शरण लेनी पड़ी । वे रमणीय शैल-शिखरपर प्रसन्नतापूर्वक रहकर मुनिभावसे परमात्माका मनन-चिन्तन करने लगे ॥ १७ ॥

द्वे चास्य भार्ये गर्भिण्यौ बभूवतुरिति श्रुतिः । तत्र चैका महाभागा भार्गवं देववर्चसम् ॥ १८ ॥ ववन्दे पद्मपत्राक्षी काङ्क्षिणी पुत्रमुत्तमम् । एका गर्भविनाशाय सपत्न्यै गरलं ददौ ॥ १९ ॥

भावार्थ

‘सुना जाता है कि असितकी दो पत्नियाँ गर्भवती थीं । उनमेंसे एक महाभागा कमललोचना राजपत्नीने उत्तम पुत्र पानेकी अभिलाषा रखकर देवतुल्य तेजस्वी भृगुवंशी च्यवन मुनिके चरणोंमें वन्दना की और दूसरी रानीने अपनी सौतके गर्भका विनाश करनेके लिये उसे जहर दे दिया ॥ १८-१९ ॥

भार्गवश्च्यवनो नाम हिमवन्तमुपाश्रितः । तमृषिं साभ्युपागम्य कालिन्दी त्वभ्यवादयत् ॥ २० ॥

भावार्थ

‘उन दिनों भृगुवंशी च्यवन मुनि हिमालयपर रहते थे । राजा असितकी कालिन्दी नामवाली पत्नीने ऋषिके चरणोंमें पहुँचकर उन्हें प्रणाम किया ॥ २० ॥

स तामभ्यवदत् प्रीतो वरेप्सुं पुत्रजन्मनि । पुत्रस्ते भविता देवि महात्मा लोकविश्रुतः ॥ २१ ॥ धार्मिकश्च सुभीमश्च वंशकर्तारिसूदनः ।

भावार्थ

‘मुनिने प्रसन्न होकर पुत्रकी उत्पत्तिके लिये वरदान चाहनेवाली रानीसे इस प्रकार कहा—‘देवि ! तुम्हें एक महामनस्वी लोकविख्यात पुत्र प्राप्त होगा, जो धर्मात्मा, शत्रुओंके लिये अत्यन्त भयंकर, अपने वंशको चलानेवाला और शत्रुओंका संहारक होगा’ ॥ २१½ ॥

श्रुत्वा प्रदक्षिणं कृत्वा मुनि तमनुमान्य च ॥ २२ ॥ पद्मपत्रसमानाक्षं पद्मगर्भसमप्रभम् । ततः सा गृहमागम्य पत्नी पुत्रमजायत ॥ २३ ॥

भावार्थ

‘यह सुनकर रानीने मुनिकी परिक्रमा की और उनसे विदा लेकर वहाँसे अपने घर आनेपर उस रानीने एक पुत्रको जन्म दिया, जिसकी कान्ति कमलके भीतरी भागके समान सुन्दर थी और नेत्र कमलदलके समान मनोहर थे ॥ २२-२३ ॥

सपत्न्या तु गरस्तस्यै दत्तो गर्भजिघांसया । गरेण सह तेनैव तस्मात् स सगरोऽभवत् ॥ २४ ॥

भावार्थ

‘सौतने उसके गर्भको नष्ट करनेके लिये जो गर ( विष ) दिया था, उस गरके साथ ही वह बालक प्रकट हुआ; इसलिये सगर नामसे प्रसिद्ध हुआ ॥ २४ ॥

स राजा सगरो नाम यः समुद्रमखानयत् । दृष्ट्वा पर्वणि वेगेन त्रासयान इमाः प्रजाः ॥२५॥

भावार्थ

‘राजा सगर वे ही हैं, जिन्होंने पर्वके दिन यज्ञकी दीक्षा ग्रहण करके खुदाईके वेगसे इन समस्त प्रजाओंको भयभीत करते हुए अपने पुत्रोंद्वारा समुद्रको खुदवाया था ॥ २५ ॥

असमञ्जस्तु पुत्रोऽभूत् सगरस्येति नः श्रुतम् । जीवन्नेव स पित्रा तु निरस्तः पापकर्मकृत् ॥ २६॥

भावार्थ

‘हमारे सुननेमें आया है कि सगरके पुत्र असमञ्ज हुए, जिन्हें पापकर्ममें प्रवृत्त होनेके कारण पिताने जीते-जी ही राज्यसे निकाल दिया था ॥ २६ ॥

अंशुमानपि पुत्रोऽभूदसमञ्जस्य वीर्यवान् । दिलीपोऽंशुमतः पुत्रो दिलीपस्य भगीरथः ॥ २७ ॥

भावार्थ

‘असमञ्जके पुत्र अंशुमान् हुए, जो बड़े पराक्रमी थे । अंशुमान्के दिलीप और दिलीपके पुत्र भगीरथ हुए ॥२७॥

भगीरथात् ककुत्स्थश्च काकुत्स्था येन तु स्मृताः । ककुत्स्थस्य तु पुत्रोऽभूद् रघुर्येन तु राघवाः ॥ २८॥

भावार्थ

‘भगीरथसे ककुत्स्थका जन्म हुआ, जिनसे उनके वंशवाले ‘काकुत्स्थ’ कहलाते हैं । ककुत्स्थके पुत्र रघु हुए, जिनसे उस वंशके लोग ‘राघव’ कहलाये ॥ २८ ॥

रघोस्तु पुत्रस्तेजस्वी प्रवृद्धः पुरुषादकः । कल्माषपादः सौदास इत्येवं प्रथितो भुवि ॥ २९ ॥

भावार्थ

‘रघुके तेजस्वी पुत्र कल्माषपाद हुए, जो बड़े होनेपर शापवश कुछ वर्षोंके लिये नरभक्षी राक्षस हो गये थे । वे इस पृथ्वीपर सौदास नामसे विख्यात थे ॥ २९ ॥

कल्माषपादपुत्रोऽभूच्छङ्खणस्त्विति नः श्रुतम् । यस्तु तद्वीर्यमासाद्य सहसैन्यो व्यनीनशत् ॥ ३० ॥

भावार्थ

‘कल्माषपादके पुत्र शङ्खण हुए, यह हमारे सुननेमें आया है, जो युद्धमें सुप्रसिद्ध पराक्रम प्राप्त करके भी सेनासहित नष्ट हो गये थे ॥ ३० ॥

शङ्खणस्य तु पुत्रोऽभूच्छूरः श्रीमान् सुदर्शनः । सुदर्शनस्याग्निवर्ण अग्निवर्णस्य शीघ्रगः ॥ ३१ ॥

भावार्थ

‘शङ्खणके शूरवीर पुत्र श्रीमान् सुदर्शन हुए । सुदर्शनके पुत्र अग्निवर्ण और अग्निवर्णके पुत्र शीघ्रग थे ॥ ३१ ॥

शीघ्रगस्य मरुः पुत्रो मरोः पुत्रः प्रशुश्रुवः । प्रशुश्रुवस्य पुत्रोऽभूदम्बरीषो महामतिः ॥ ३२ ॥

भावार्थ

‘शीघ्रगके पुत्र मरु, मरुके पुत्र प्रशुश्रव तथा प्रशुश्रुवके महाबुद्धिमान् पुत्र अम्बरीष हुए ॥ ३२ ॥

अम्बरीषस्य पुत्रोऽभून्नहुषः सत्यविक्रमः । नहुषस्य च नाभागः पुत्रः परमधार्मिकः ॥ ३३ ॥

भावार्थ

‘अम्बरीषके पुत्र सत्यपराक्रमी नहुष थे । नहुषके पुत्र नाभाग हुए, जो बड़े धर्मात्मा थे ॥ ३३ ॥

अजश्च सुव्रतश्चैव नाभागस्य सुतावुभौ । अजस्य चैव धर्मात्मा राजा दशरथः सुतः ॥ ३४ ॥

भावार्थ

‘नाभागके दो पुत्र हुए—अज और सुव्रत । अजके धर्मात्मा पुत्र राजा दशरथ थे ॥ ३४ ॥

तस्य ज्येष्ठोऽसि दायादो राम इत्यभिविश्रुतः । तद् गृहाण स्वकं राज्यमवेक्षस्व जगन्नृप ॥ ३५ ॥

भावार्थ

‘दशरथके ज्येष्ठ पुत्र तुम हो, जिसकी ‘श्रीराम’ के नामसे प्रसिद्धि है । नरेश्वर ! यह अयोध्याका राज्य तुम्हारा है, इसे ग्रहण करो और इसकी देख-भाल करते रहो ॥ ३५ ॥

इक्ष्वाकूणां हि सर्वेषां राजा भवति पूर्वजः । पूर्वजे नावरः पुत्रो ज्येष्ठो राजाभिषिच्यते ॥ ३६ ॥

भावार्थ

‘समस्त इक्ष्वाकुवंशियोंके यहाँ ज्येष्ठ पुत्र ही राजा होता आया है । ज्येष्ठके होते हुए छोटा पुत्र राजा नहीं होता है । ज्येष्ठ पुत्रका ही राजाके पदपर अभिषेक होता है ॥ ३६ ॥

स राघवाणां कुलधर्ममात्मनः सनातनं नाद्य विहन्तुमर्हसि । प्रभूतरत्नामनुशाधि मेदिनीं प्रभूतराष्ट्रां पितृवन्महायशः ॥ ३७ ॥

भावार्थ

‘महायशस्वी श्रीराम ! रघुवंशियोंका जो अपना सनातन कुलधर्म है, उसको आज तुम नष्ट न करो। बहुत-से अवान्तर देशोंवाली तथा प्रचुर रत्नराशिसे सम्पन्न इस वसुधाका पिताकी भाँति पालन करो ॥ ३७ ॥

Ramayan appFree. No ads. Works offline.Install

गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें