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अयोध्याकाण्ड, सर्ग 108

आश्वासयन्तं भरतं जाबालिर्ब्राह्मणोत्तमः । उवाच रामं धर्मज्ञं धर्मापेतमिदं वचः ॥ १ ॥

भावार्थ

जब धर्मज्ञ श्रीरामचन्द्रजी भरतको इस प्रकार समझा-बुझा रहे थे, उसी समय ब्राह्मणशिरोमणि जाबालिने उनसे यह धर्मविरुद्ध वचन कहा—॥ १ ॥

साधु राघव मा भूत् ते बुद्धिरेवं निरर्थिका । प्राकृतस्य नरस्येव ह्यार्यबुद्धेस्तपस्विनः ॥ २ ॥

भावार्थ

‘रघुनन्दन ! आपने ठीक कहा, परंतु आप श्रेष्ठ बुद्धिवाले और तपस्वी हैं; अतः आपको गँवार मनुष्यकी तरह ऐसा निरर्थक विचार मनमें नहीं लाना चाहिये ॥ २ ॥

कः कस्य पुरुषो बन्धुः किमाप्यं कस्य केनचित् । एको हि जायते जन्तुरेक एव विनश्यति ॥ ३ ॥

भावार्थ

‘संसारमें कौन पुरुष किसका बन्धु है और किससे किसको क्या पाना है ? जीव अकेला ही जन्म लेता और अकेला ही नष्ट हो जाता है ॥ ३ ॥

तस्मान्माता पिता चेति राम सज्जेत यो नरः । उन्मत्त इव स ज्ञेयो नास्ति कश्चिद्धि कस्यचित् ॥ ४ ॥

भावार्थ

‘अतः श्रीराम ! जो मनुष्य माता या पिता समझकर किसीके प्रति आसक्त होता है, उसे पागलके समान समझना चाहिये; क्योंकि यहाँ कोई किसीका कुछ भी नहीं है ॥ ४ ॥

यथा ग्रामान्तरं गच्छन् नरः कश्चिद् बहिर्वसेत् । उत्सृज्य च तमावासं प्रतिष्ठेतापरेऽहनि ॥ ५ ॥ एवमेव मनुष्याणां पिता माता गृहं वसु । आवासमात्रं काकुत्स्थ सज्जन्ते नात्र सज्जनाः ॥ ६ ॥

भावार्थ

‘जैसे कोई मनुष्य दूसरे गाँवको जाते समय बाहर किसी धर्मशालामें एक रातके लिये ठहर जाता है और दूसरे दिन उस स्थानको छोड़कर आगेके लिये प्रस्थित हो जाता है, इसी प्रकार पिता, माता, घर और धन—ये मनुष्योंके आवासमात्र हैं । ककुत्स्थकुलभूषण ! इनमें सज्जन पुरुष आसक्त नहीं होते हैं ॥ ५-६ ॥

पित्र्यं राज्यं समुत्सृज्य स नार्हसि नरोत्तम । आस्थातुं कापथं दुःखं विषमं बहुकण्टकम् ॥ ७ ॥

भावार्थ

‘अतः नरश्रेष्ठ ! आपको पिताका राज्य छोड़कर इस दुःखमय, नीचे-ऊँचे तथा बहुकण्टकाकीर्ण वनके कुत्सित मार्गपर नहीं चलना चाहिये ॥ ७ ॥

समृद्धायामयोध्यायामात्मानमभिषेचय । एकवेणीधरा हि त्वा नगरी सम्प्रतीक्षते ॥ ८ ॥

भावार्थ

‘आप समृद्धिशालिनी अयोध्यामें राजाके पदपर अपना अभिषेक कराइये । वह नगरी प्रोषितभर्तृका नारीकी भाँति एक वेणी धारण करके आपकी प्रतीक्षा करती है ॥ ८ ॥

राजभोगाननुभवन् महार्हान् पार्थिवात्मज । विहर त्वमयोध्यायां यथा शक्रस्त्रिविष्टपे ॥ ९ ॥

भावार्थ

‘राजकुमार ! जैसे देवराज इन्द्र स्वर्गमें विहार करते हैं, उसी प्रकार आप बहुमूल्य राजभोगोंका उपभोग करते हुए अयोध्यामें विहार कीजिये ॥ ९ ॥

न ते कश्चिद् दशरथस्त्वं च तस्य न कश्चन । अन्यो राजा त्वमन्यस्तु तस्मात् कुरु यदुच्यते ॥ १० ॥

भावार्थ

‘राजा दशरथ आपके कोई नहीं थे और आप भी उनके कोई नहीं हैं । राजा दूसरे थे और आप भी दूसरे हैं; इसलिये मैं जो कहता हूँ, वही कीजिये ॥ १० ॥

बीजमात्रं पिता जन्तोः शुक्रं शोणितमेव च । संयुक्तमृतुमन्मात्रा पुरुषस्येह जन्म तत् ॥ ११ ॥

भावार्थ

‘पिता जीवके जन्ममें निमित्तकारणमात्र होता है । वास्तवमें ऋतुमती माताके द्वारा गर्भमें धारण किये हुए वीर्य और रजका परस्पर संयोग होनेपर ही पुरुषका यहाँ जन्म होता है ॥ ११ ॥

गतः स नृपतिस्तत्र गन्तव्यं यत्र तेन वै । प्रवृत्तिरेषा भूतानां त्वं तु मिथ्या विहन्यसे ॥ १२ ॥

भावार्थ

‘राजाको जहाँ जाना था, वहाँ चले गये । यह प्राणियोंके लिये स्वाभाविक स्थिति है। आप तो व्यर्थ ही मारे जाते ( कष्ट उठाते ) हैं ॥ १२ ॥

अर्थधर्मपरा ये ये तांस्तान् शोचामि नेतरान् । ते हि दुःखमिह प्राप्य विनाशं प्रेत्य लेभिरे ॥ १३ ॥

भावार्थ

‘जो-जो मनुष्य प्राप्त हुए अर्थका परित्याग करके धर्मपरायण हुए हैं, उन्हीं-उन्हींके लिये मैं शोक करता हूँ, दूसरोंके लिये नहीं । वे इस जगत्में धर्मके नामपर केवल दुःख भोगकर मृत्युके पश्चात् नष्ट हो गये हैं ॥ १३ ॥

अष्टकापितृदेवत्यमित्ययं प्रसृतो जनः । अन्नस्योपद्रवं पश्य मृतो हि किमशिष्यति ॥ १४ ॥ यदि भुक्तमिहान्येन देहमन्यस्य गच्छति । दद्यात् प्रवसतां श्राद्धं न तत् पथ्यशनं भवेत् ॥ १५ ॥ दानसंवनना ह्येते ग्रन्था मेधाविभिः कृताः । यजस्व देहि दीक्षस्व तपस्तप्यस्व संत्यज ॥ १६ ॥

भावार्थ

‘अष्टका आदि जितने श्राद्ध हैं, उनके देवता पितर हैं— श्राद्धका दान पितरोंको मिलता है । यही सोचकर लोग श्राद्धमें प्रवृत्त होते हैं; किंतु विचार करके देखिये तो इसमें अन्नका नाश ही होता है । भला, मरा हुआ मनुष्य क्या खायेगा ॥ ‘यदि यहाँ दूसरेका खाया हुआ अन्न दूसरेके शरीरमें चला जाता हो तो परदेशमें जानेवालोंके लिये श्राद्ध ही कर देना चाहिये; उनको रास्तेके लिये भोजन देना उचित नहीं है॥। ‘देवताओंके लिये यज्ञ और पूजन करो, दान दो, यज्ञकी दीक्षा ग्रहण करो; तपस्या करो और घर-द्वार छोड़कर संन्यासी बन जाओ इत्यादि बातें बतानेवाले ग्रन्थ बुद्धिमान् मनुष्योंने दानकी ओर लोगोंकी प्रवृत्ति करानेके लिये ही बनाये हैं ॥ १६ ॥

स नास्ति परमित्येतत् कुरु बुद्धि महामते । प्रत्यक्षं यत् तदातिष्ठ परोक्षं पृष्ठतः कुरु ॥ १७ ॥

भावार्थ

‘अतः महामते ! आप अपने मनमें यह निश्चय कीजिये कि इस लोकके सिवा कोई दूसरा लोक नहीं है ( अतः वहाँ फल भोगनेके लिये धर्म आदिके पालनकी आवश्यकता नहीं है ) । जो प्रत्यक्ष राज्यलाभ है, उसका आश्रय लीजिये, परोक्ष ( पारलौकिक लाभ ) को पीछे ढकेल दीजिये ॥ १७ ॥

सतां बुद्धि पुरस्कृत्य सर्वलोकनिदर्शिनीम् । राज्यं स त्वं निगृह्णीष्व भरतेन प्रसादितः ॥ १८ ॥

भावार्थ

‘सत्पुरुषोंकी बुद्धि, जो सब लोगोंके लिये राह दिखानेवाली होनेके कारण प्रमाणभूत है, आगे करके भरतके अनुरोधसे आप अयोध्याका राज्य ग्रहण कीजिये’ ॥ १८ ॥

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