अरण्यकाण्ड, सर्ग 48
एवं ब्रुवत्यां सीतायां संरब्धः परुषं वचः । ललाटे भ्रुकुटिं कृत्वा रावणः प्रत्युवाच ह ॥ १ ॥ भ्राता वैश्रवणस्याहं सापत्नो वरवर्णिनि । रावणो नाम भद्रं ते दशग्रीवः प्रतापवान् ॥ २ ॥
भावार्थ
सीताके ऐसा कहनेपर रावण रोषमें भर गया और ललाटमें भौंहें टेढ़ी करके वह कठोर वाणीमें बोला—॥ ‘सुन्दरी ! मैं कुबेरका सौतेला भाई परम प्रतापी दशग्रीव रावण हूँ । तुम्हारा भला हो ॥ २ ॥
यस्य देवाः सगन्धर्वाः पिशाचपतगोरगाः । विद्रवन्ति सदा भीता मृत्योरिव सदा प्रजाः ॥ ३ ॥ येन वैश्रवणो भ्राता वैमात्राः कारणान्तरे । द्वन्द्वमासादितः क्रोधाद् रणे विक्रम्य निर्जितः ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘जैसे प्रजा मौतके भयसे सदा डरती रहती है, उसी प्रकार देवता, गन्धर्व, पिशाच, पक्षी और नाग सदा जिससे भयभीत होकर भागते हैं, जिसने किसी कारणवश अपने सौतेले भाई कुबेरके साथ द्वन्द्वयुद्ध किया और क्रोधपूर्वक पराक्रम करके रणभूमिमें उन्हें परास्त कर दिया था, वही रावण मैं हूँ ॥ ३-४ ॥
मद्भयार्तः परित्यज्य स्वमधिष्ठानमृद्धिमत् । कैलासं पर्वतश्रेष्ठमध्यास्ते नरवाहनः ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘मेरे ही भयसे पीड़ित हो नरवाहन कुबेरने अपनी समृद्धिशालिनी पुरी लङ्काका परित्याग करके इस समय पर्वतश्रेष्ठ कैलासकी शरण ली है ॥ ५ ॥
यस्य तत् पुष्पकं नाम विमानं कामगं शुभम्। वीर्यादावर्जितं भद्रे येन यामि विहायसम् ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘भद्रे ! उनका सुप्रसिद्ध पुष्पक नामक सुन्दर विमान, जो इच्छाके अनुसार चलनेवाला है, मैंने पराक्रमसे जीत लिया है और उसी विमानके द्वारा मैं आकाशमें विचरता हूँ ॥ ६ ॥
मम संजातरोषस्य मुखं दृष्ट्वैव मैथिलि । विद्रवन्ति परित्रस्ताः सुराः शक्रपुरोगमाः ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘मिथिलेशकुमारी ! जब मुझे रोष चढ़ता है, उस समय इन्द्र आदि सब देवता मेरा मुँह देखकर ही भयसे थर्रा उठते हैं और इधर-उधर भाग जाते हैं ॥ ७ ॥
यत्र तिष्ठाम्यहं तत्र मारुतो वाति शङ्कितः । तीव्रांशुः शिशिरांशुश्च भयात् सम्पद्यते दिवि ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘जहाँ मैं खड़ा होता हूँ, वहाँ हवा डरकर धीरे-धीरे चलने लगती है । मेरे भयसे आकाशमें प्रचण्ड किरणोंवाला सूर्य भी चन्द्रमाके समान शीतल हो जाता है ॥ ८ ॥
निष्कम्पपत्रास्तरवो नद्यश्च स्तिमितोदकाः । भवन्ति यत्र तत्राहं तिष्ठामि च चरामि च ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘जिस स्थानपर मैं ठहरता या भ्रमण करता हूँ, वहाँ वृक्षोंके पत्तेतक नहीं हिलते और नदियोंका पानी स्थिर हो जाता है ॥ ९ ॥
मम पारे समुद्रस्य लङ्का नाम पुरी शुभा । सम्पूर्णा राक्षसैर्घोरैर्यथेन्द्रस्यामरावती ॥ १० ॥
भावार्थ
‘समुद्रके उस पार लङ्का नामक मेरी सुन्दर पुरी है, जो इन्द्रकी अमरावतीके समान मनोहर तथा घोर राक्षसोंसे भरी हुई है ॥ १० ॥
प्राकारेण परिक्षिप्ता पाण्डुरेण विराजिता । हेमकक्ष्या पुरी रम्या वैदूर्यमयतोरणा ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘उसके चारों ओर बनी हुई सफेद चहारदिवारी उस पुरीकी शोभा बढ़ाती है । लङ्कापुरीके महलोंके दालान, फर्श आदि सोनेके बने हैं और उसके बाहरी दरवाजे वैदूर्यमय हैं । वह पुरी बहुत ही रमणीय है ॥ ११ ॥
हस्त्यश्वरथसम्बाधा तूर्यनादविनादिता । सर्वकामफलैर्वृक्षैः संकुलोद्यानभूषिता ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘हाथी, घोड़े और रथोंसे वहाँकी सड़कें भरी रहती हैं । भाँति-भाँतिके वाद्योंकी ध्वनि गूँजा करती है । सब प्रकारके मनोवाञ्छित फल देनेवाले वृक्षोंसे लङ्कापुरी व्याप्त है । नाना प्रकारके उद्यान उसकी शोभा बढ़ाते हैं ॥ १२ ॥
तत्र त्वं वस हे सीते राजपुत्रि मया सह । न स्मरिष्यसि नारीणां मानुषीणां मनस्विनि ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘राजकुमारी सीते ! तुम मेरे साथ उस पुरीमें चलकर निवास करो । मनस्विनि ! वहाँ रहकर तुम मानवी स्त्रियोंको भूल जाओगी ॥ १३ ॥
भुञ्जाना मानुषान् भोगान् दिव्यांश्च वरवर्णिनि । न स्मरिष्यसि रामस्य मानुषस्य गतायुषः ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘सुन्दरी ! लङ्कामें दिव्य और मानुष-भोगोंका उपभोग करती हुई तुम उस मनुष्य रामका कभी स्मरण नहीं करोगी, जिसकी आयु अब समाप्त हो चली है ॥ १४ ॥
स्थापयित्वा प्रियं पुत्रं राज्ये दशरथो नृपः । मन्दवीर्यस्ततो ज्येष्ठः सुतः प्रस्थापितो वनम् ॥ १५ ॥ तेन किं भ्रष्टराज्येन रामेण गतचेतसा । करिष्यसि विशालाक्षि तापसेन तपस्विना ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘विशाललोचने ! राजा दशरथने अपने प्यारे पुत्रको राज्यपर बिठाकर जिस अल्पपराक्रमी ज्येष्ठ पुत्रको वनमें भेज दिया, उस राज्यभ्रष्ट, बुद्धिहीन एवं तपस्यामें लगे हुए तापस रामको लेकर क्या करोगी ? ॥ १५–१६ ॥
रक्ष राक्षसभर्तारं कामय स्वयमागतम् । न मन्मथशराविष्टं प्रत्याख्यातुं त्वमर्हसि ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘यह राक्षसोंका स्वामी स्वयं तुम्हारे द्वारपर आया है, तुम इसकी रक्षा करो, इसे मनसे चाहो । यह कामदेवके बाणोंसे पीड़ित है । इसे ठुकराना तुम्हारे लिये उचित नहीं है ॥ १७ ॥
प्रत्याख्याय हि मां भीरु पश्चात्तापं गमिष्यसि । चरणेनाभिहत्येव पुरूरवसमुर्वशी ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘भीरु ! मुझे ठुकराकर तुम उसी तरह पश्चात्ताप करोगी, जैसे पुरूरवाको लात मारकर उर्वशी पछतायी थी ॥ १८ ॥
अङ्गुल्या न समो रामो मम युद्धे स मानुषः । तव भाग्येन सम्प्राप्तं भजस्व वरवर्णिनि ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘सुन्दरी ! युद्धमें मनुष्यजातीय राम मेरी एक अङ्गुलिके बराबर भी नहीं है । तुम्हारे भाग्यसे मैं आ गया हूँ । तुम मुझे स्वीकार करो’ ॥ १९ ॥
एवमुक्ता तु वैदेही क्रुद्धा संरक्तलोचना । अब्रवीत् परुषं वाक्यं रहिते राक्षसाधिपम् ॥ २० ॥
भावार्थ
रावणके ऐसा कहनेपर विदेहकुमारी सीताके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये । उन्होंने उस एकान्त स्थानमें राक्षसराज रावणसे कठोर वाणीमें कहा—॥ २० ॥
कथं वैश्रवणं देवं सर्वदेवनमस्कृतम् । भ्रातरं व्यपदिश्य त्वमशुभं कर्तुमिच्छसि ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘अरे ! भगवान् कुबेर तो सम्पूर्ण देवताओंके वन्दनीय हैं । तू उन्हें अपना भाई बताकर ऐसा पापकर्म कैसे करना चाहता है ? ॥ २१ ॥
अवश्यं विनशिष्यन्ति सर्वे रावण राक्षसाः । येषां त्वं कर्कशो राजा दुर्बुद्धिरजितेन्द्रियः ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘रावण ! जिनका तुझ-जैसा क्रूर, दुर्बुद्धि और अजितेन्द्रिय राजा है, वे सब राक्षस अवश्य ही नष्ट हो जायँगे ॥ २२ ॥
अपहृत्य शचीं भार्यां शक्यमिन्द्रस्य जीवितुम् । नहि रामस्य भार्यां मामानीय स्वस्तिमान् भवेत् ॥२३॥
भावार्थ
‘इन्द्रकी पत्नी शचीका अपहरण करके सम्भव है कोई जीवित रह जाय; किंतु रामपत्नी मुझ सीताका हरण करके कोई कुशलसे नहीं रह सकता ॥ २३ ॥
जीवेच्चिरं वज्रधरस्य पश्चा- च्छचीं प्रधृष्याप्रतिरूपरूपाम् । न मादृशीं राक्षस धर्षयित्वा पीतामृतस्यापि तवास्ति मोक्षः ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘राक्षस ! वज्रधारी इन्द्रकी अनुपम रूपवती भार्या शचीका तिरस्कार करके सम्भव है कोई उसके बाद भी चिरकालतक जीवित रह जाय; परंतु मेरी-जैसी स्त्रीका अपमान करके तू अमृत पी ले तो भी तुझे जीते-जी छुटकारा नहीं मिल सकता’ ॥ २४ ॥
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