अरण्यकाण्ड, सर्ग 43
सा तं सम्प्रेक्ष्य सुश्रोणी कुसुमानि विचिन्वती । हेमराजतवर्णाभ्यां पार्श्वाभ्यामुपशोभितम् ॥ १ ॥ प्रहृष्टा चानवद्याङ्गी मृष्टहाटकवर्णिनी । भर्तारमपि चक्रन्द लक्ष्मणं चैव सायुधम् ॥ २ ॥
भावार्थ
वह मृग सोने और चाँदीके समान कान्तिवाले पार्श्व-भागोंसे सुशोभित था । शुद्ध सुवर्णके समान कान्ति तथा निर्दोष अङ्गोंवाली सुन्दरी सीता फूल चुनते-चुनते ही उस मृगको देखकर मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुईं और अपने पति श्रीराम तथा देवर लक्ष्मणको हथियार लेकर आनेके लिये पुकारने लगीं ॥ १-२ ॥
आह्वयाह्वय च पुनस्तं मृगं साधु वीक्षते । आगच्छागच्छ शीघ्रं वै आर्यपुत्र सहानुज ॥ ३ ॥
भावार्थ
वे बार-बार उन्हें पुकारतीं और फिर उस मृगको अच्छी तरह देखने लगती थीं । वे बोलीं, ‘आर्यपुत्र ! अपने भाईके साथ आइये, शीघ्र आइये’ ॥ ३ ॥
तावाहूतौ नरव्याघ्रौ वैदेह्या रामलक्ष्मणौ । वीक्षमाणौ तु तं देशं तदा दद़शतुर्मृगम् ॥ ४ ॥ शङ्कमानस्तु तं दृष्ट्वा लक्ष्मणो वाक्यमब्रवीत् । तमेवैनमहं मन्ये मारीचं राक्षसं मृगम् ॥ ५ ॥
भावार्थ
विदेहकुमारी सीताके द्वारा पुकारे जानेपर नरश्रेष्ठ श्रीराम और लक्ष्मण वहाँ आये और उस स्थानपर सब ओर दृष्टि डालते हुए उन्होंने उस समय उस मृगको देखा ॥ उसे देखकर लक्ष्मणके मनमें संदेह हुआ और वे बोले—‘भैया ! मैं तो समझता हूँ कि इस मृगके रूपमें वह मारीच नामका राक्षस ही आया है ॥ ५ ॥
चरन्तो मृगयां हृष्टाः पापेनोपाधिना वने । अनेन निहता राम राजानः कामरूपिणा ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘श्रीराम ! स्वेच्छानुसार रूप धारण करनेवाले इस पापीने कपट-वेष बनाकर वनमें शिकार खेलनेके लिये आये हुए कितने ही हर्षोत्फुल्ल नरेशोंका वध किया है ॥ ६ ॥
अस्य मायाविदो माया मृगरूपमिदं कृतम् । भानुमत् पुरुषव्याघ्र गन्धर्वपुरसंनिभम् ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘पुरुषसिंह ! यह अनेक प्रकारकी मायाएँ जानता है । इसकी जो माया सुनी गयी है, वही इस प्रकाशमान मृगरूपमें परिणत हो गयी है । यह गन्धर्व-नगरके समान देखने-भरके लिये ही है ( इसमें वास्तविकता नहीं है ) ॥ ७ ॥
मृगो ह्येवंविधो रत्नविचित्रो नास्ति राघव । जगत्यां जगतीनाथ मायैषा हि न संशयः ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘रघुनन्दन ! पृथ्वीनाथ ! इस भूतलपर कहीं भी ऐसा विचित्र रत्नमय मृग नहीं है; अतः निःसंदेह यह माया ही है’ ॥ ८ ॥
एवं ब्रुवाणं काकुत्स्थं प्रतिवार्य शुचिस्मिता । उवाच सीता संहृष्टा छद्मना हृतचेतना ॥ ९ ॥
भावार्थ
मारीचके छलसे जिनकी विचारशक्ति हर ली गयी थी, उन पवित्र मुसकानवाली सीताने उपर्युक्त बातें कहते हुए लक्ष्मणको रोककर स्वयं ही बड़े हर्षके साथ कहा—॥ ९ ॥
आर्यपुत्राभिरामोऽसौ मृगो हरति मे मनः । आनयैनं महाबाहो क्रीडार्थं नो भविष्यति ॥ १० ॥
भावार्थ
‘आर्यपुत्र ! यह मृग बड़ा ही सुन्दर है । इसने मेरे मनको हर लिया है । महाबाहो ! इसे ले आइये । यह हम-लोगोंके मन-बहलावके लिये रहेगा ॥ १० ॥
इहाश्रमपदेऽस्माकं बहवः पुण्यदर्शनाः । मृगाश्चरन्ति सहिताश्चमराः सृमरास्तथा ॥ ११ ॥ ऋक्षाः पृषतसङ्घाश्च वानराः किन्नरास्तथा । विहरन्ति महाबाहो रूपश्रेष्ठा महाबलाः ॥ १२ ॥ न चान्यः सदृशो राजन् दृष्टः पूर्वं मृगो मया । तेजसा क्षमया दीप्त्या यथायं मृगसत्तमः ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘राजन् ! महाबाहो ! यद्यपि हमारे इस आश्रमपर बहुत-से पवित्र एवं दर्शनीय मृग एक साथ आकर चरते हैं तथा सृमर ( काली पूँछवाली चँवरी गाय ), चमर ( सफेद पूँछवाली चवँरी गाय ), रीछ, चितकबरे मृगोंके झुंड, वानर तथा सुन्दर रूपवाले महाबली किन्नर भी विचरण करते हैं, तथापि आजके पहले मैंने दूसरा कोई ऐसा तेजस्वी, सौम्य और दीप्तिमान् मृग नहीं देखा था, जैसा कि यह श्रेष्ठ मृग दिखायी दे रहा है ॥ ११–१३ ॥
नानावर्णविचित्राङ्गो रत्नभूतो ममाग्रतः । द्योतयन् वनमव्यग्रं शोभते शशिसंनिभः ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘नाना प्रकारके रंगोंसे युक्त होनेके कारण इसके अङ्ग विचित्र जान पड़ते हैं । ऐसा प्रतीत होता है मानो यह अङ्गोंका ही बना हुआ हो । मेरे आगे निर्भय एवं शान्तभावसे स्थित होकर इस वनको प्रकाशित करता हुआ यह चन्द्रमाके समान शोभा पा रहा है ॥ १४ ॥
अहो रूपमहो लक्ष्मीः स्वरसम्पच्च शोभना । मृगोऽद्भुतो विचित्राङ्गो हृदयं हरतीव मे ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘इसका रूप अद्भुत है । इसकी शोभा अवर्णनीय है । इसकी स्वरसम्पत्ति ( बोली ) बड़ी सुन्दर है । विचित्र अङ्गोंसे सुशोभित यह अद्भुत मृग मेरे मनको मोहे लेता है ॥ १५ ॥
यदि ग्रहणमभ्येति जीवन्नेव मृगस्तव । आश्चर्यभूतं भवति विस्मयं जनयिष्यति ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘यदि यह मृग जीते-जी ही आपकी पकड़में आ जाय तो एक आश्चर्यकी वस्तु होगा और सबके हृदयमें विस्मय उत्पन्न कर देगा ॥ १६ ॥
समाप्तवनवासानां राज्यस्थानां च नः पुनः । अन्तःपुरे विभूषार्थो मृग एष भविष्यति ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘जब हमारे वनवासकी अवधि पूरी हो जायगी और हम पुनः अपना राज्य पा लेंगे, उस समय यह मृग हमारे अन्तःपुरकी शोभा बढ़ायेगा ॥ १७ ॥
भरतस्यार्यपुत्रस्य श्वश्रूणां मम च प्रभो । मृगरूपमिदं दिव्यं विस्मयं जनयिष्यति ॥ १८ ॥ जीवन्न यदि तेऽभ्येति ग्रहणं मृगसत्तमः । अजिनं नरशार्दूल रुचिरं तु भविष्यति ॥ १९ ॥ निहतस्यास्य सत्त्वस्य जाम्बूनदमयत्वचि । शष्पबृस्यां विनीतायामिच्छाम्यहमुपासितुम् ॥ २० ॥
भावार्थ
‘प्रभो ! इस मृगका यह दिव्य रूप भरतके, आपके, मेरी सासुओंके और मेरे लिये भी विस्मयजनक होगा ॥ ‘पुरुषसिंह ! यदि कदाचित् यह श्रेष्ठ मृग जीते-जी पकड़ा न जा सके तो इसका चमड़ा ही बहुत सुन्दर होगा ॥ ‘घास-फूसकी बनी हुई चटाईपर इस मरे हुए मृगका सुवर्णमय चमड़ा बिछाकर मैं इसपर आपके साथ बैठना चाहती हूँ ॥ २० ॥
कामवृत्तमिदं रौद्रं स्त्रीणामसदृशं मतम् । वपुषा त्वस्य सत्त्वस्य विस्मयो जनितो मम ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘यद्यपि स्वेच्छासे प्रेरित होकर अपने पतिको ऐसे काममें लगाना यह भयंकर स्वेच्छाचार है और साध्वी स्त्रियोंके लिये उचित नहीं माना गया है तथापि इस जन्तुके शरीरने मेरे हृदयमें विस्मय उत्पन्न कर दिया है ( इसीलिये मैं इसको पकड़ लानेके लिये अनुरोध करती हूँ )’ ॥ २१ ॥
तेन काञ्चनरोम्णा तु मणिप्रवरशृङ्गिणा । तरुणादित्यवर्णेन नक्षत्रपथवर्चसा ॥ २२ ॥ बभूव राघवस्यापि मनो विस्मयमागतम् । इति सीतावचः श्रुत्वा दृष्ट्वा च मृगमद्भुतम् ॥ २३ ॥ लोभितस्तेन रूपेण सीतया च प्रचोदितः । उवाच राघवो हृष्टो भ्रातरं लक्ष्मणं वचः ॥ २४ ॥
भावार्थ
सुनहरी रोमावली, इन्द्रनील मणिके समान सींग, उदयकालके सूर्यकी-सी कान्ति तथा नक्षत्रलोककी भाँति बिन्दुयुक्त तेजसे सुशोभित उस मृगको देखकर श्रीरामचन्द्रजीका मन भी विस्मित हो उठा । सीताकी पूर्वोक्त बातको सुनकर, उस मृगके अद्भुत रूपको देखकर, उसके उस रूपपर लुभाकर और सीतासे प्रेरित होकर हर्षसे भरे हुए श्रीरामने अपने भाई लक्ष्मणसे कहा–॥ २२–२४ ॥
पश्य लक्ष्मण वैदेह्याः स्पृहामुल्लसितामिमाम् । रूपश्रेष्ठतया ह्येष मृगोऽद्य न भविष्यति ॥ २५ ॥
भावार्थ
‘लक्ष्मण ! देखो तो सही, विदेहनन्दिनी सीताके मनमें इस मृगको पानेके लिये कितनी प्रबल इच्छा जाग उठी है ? वास्तवमें इसका रूप है भी बहुत ही सुन्दर । अपने रूपकी इस श्रेष्ठताके कारण ही यह मृग आज जीवित नहीं रह सकेगा ॥ २५ ॥
न वने नन्दनोद्देशे न चैत्ररथसंश्रये । कुतः पृथिव्यां सौमित्रे योऽस्य कश्चित् समो मृगः ॥
भावार्थ
‘सुमित्रानन्दन ! देवराज इन्द्रके नन्दनवनमें और कुबेरके चैत्ररथवनमें भी कोई ऐसा मृग नहीं होगा, जो इसकी समानता कर सके । फिर पृथ्वीपर तो हो ही कहाँसे सकता है ॥ २६ ॥
प्रतिलोमानुलोमाश्च रुचिरा रोमराजयः । शोभन्ते मृगमाश्रित्य चित्राः कनकबिन्दुभिः ॥ २७ ॥
भावार्थ
‘टेढ़ी और सीधी रुचिर रोमावलियाँ इस मृगके शरीरका आश्रय ले सुनहरे बिन्दुओंसे चित्रित हो बड़ी शोभा पा रही हैं ॥ २७ ॥
पश्यास्य जृम्भमाणस्य दीप्तामग्निशिखोपमाम् । जिह्वां मुखान्निःसरन्तीं मेघादिव शतह्रदाम् ॥ २८ ॥
भावार्थ
‘देखो न, जब यह जँभाई लेता है, तब इसके मुखसे प्रज्वलित अग्निशिखाके समान दमकती हुई जिह्वा बाहर निकल आती है और मेघसे प्रकट हुई बिजलीके समान चमकने लगती है ॥ २८ ॥
मसारगल्वर्कमुखः शङ्खमुक्तानिभोदरः । कस्य नामानिरूप्योऽसौ न मनो लोभयेन्मृगः ॥ २९ ॥
भावार्थ
‘इसका मुख-सम्पुट इन्द्रनीलमणिके बने हुए चषक ( पानपात्र ) के समान जान पड़ता है, उदर शङ्ख और मोतीके समान सफेद है। यह अवर्णनीय मृग किसके मनको नहीं लुभा लेगा ॥ २९ ॥
कस्य रूपमिदं दृष्ट्वा जाम्बूनदमयप्रभम् । नानारत्नमयं दिव्यं न मनो विस्मयं व्रजेत् ॥ ३० ॥
भावार्थ
‘नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित इसके सुनहरी प्रभावाले दिव्य रूपको देखकर किसके मनमें विस्मय नहीं होगा ॥३०॥
मांसहेतोरपि मृगान् विहारार्थं च धन्विनः । घ्नन्ति लक्ष्मण राजानो मृगयायां महावने ॥ ३१ ॥
भावार्थ
‘लक्ष्मण ! राजालोग बड़े-बड़े वनोंमें मृगया खेलते समय मांस ( मृगचर्म ) के लिये और शिकार खेलनेका शौक पूरा करनेके लिये भी धनुष हाथमें लेकर मृगोंको मारते हैं ॥ ३१ ॥
धनानि व्यवसायेन विचीयन्ते महावने । धातवो विविधाश्चापि मणिरत्नसुवर्णिनः ॥ ३२ ॥
भावार्थ
मृगयाके उद्योगसे ही राजा लोग विशाल वनमें धनका भी संग्रह करते हैं; क्योंकि वहाँ मणि, रत्न और सुवर्ण आदिसे युक्त नाना प्रकारकी धातुएँ उपलब्ध होती हैं ॥ ३२ ॥
तत् सारमखिलं नृणां धनं निचयवर्धनम् । मनसा चिन्तितं सर्वं यथा शुक्रस्य लक्ष्मण ॥ ३३ ॥
भावार्थ
‘लक्ष्मण ! कोशकी वृद्धि करनेवाला वह वन्य धन मनुष्योंके लिये अत्यन्त उत्कृष्ट होता है । ठीक उसी तरह, जैसे ब्रह्मभावको प्राप्त हुए पुरुषके लिये मनके चिन्तनमात्रसे प्राप्त हुई सारी वस्तुएँ अत्यन्त उत्तम बतायी गयी हैं ॥ ३३ ॥
अर्थी येनार्थकृत्येन संव्रजत्यविचारयन् । तमर्थमर्थशास्त्रज्ञाः प्राहुरर्थ्याः सुलक्ष्मण ॥ ३४ ॥
भावार्थ
‘लक्ष्मण ! अर्थी मनुष्य जिस अर्थ ( प्रयोजन ) का सम्पादन करनेके लिये उसके प्रति आकृष्ट हो बिना विचारे ही चल देता है, उस अत्यन्त आवश्यक प्रयोजनको ही अर्थसाधनमें चतुर एवं अर्थशास्त्रके ज्ञाता विद्वान् ‘अर्थ’ कहते हैं ॥३४॥
एतस्य मृगरत्नस्य परार्ध्ये काञ्चनत्वचि । उपवेक्ष्यति वैदेही मया सह सुमध्यमा ॥ ३५ ॥
भावार्थ
‘इस रत्नस्वरूप श्रेष्ठ मृगके बहुमूल्य सुनहरे चमड़ेपर सुन्दरी विदेहराजनन्दिनी सीता मेरे साथ बैठेगी ॥ ३५ ॥
न कादली न प्रियकी न प्रवेणी न चाविकी । भवेदेतस्य सदृशी स्पर्शेऽनेनेति मे मतिः ॥ ३६ ॥
भावार्थ
‘कदली ( कोमल ऊँचे चितकबरे और नीलाग्ररोमवाले मृगविशेष ), प्रियक ( कोमल ऊँचे चिकने और घने रोमवाले मृगविशेष ), प्रवेण ( विशेष प्रकारके बकरे ) और अवि ( भेड़ ) की त्वचा भी स्पर्श करनेमें इस काञ्चन मृगके छालेके समान कोमल एवं सुखद नहीं हो सकती, ऐसा मेरा विश्वास है ॥ ३६ ॥
एष चैव मृगः श्रीमान् यश्च दिव्यो नभश्चरः । उभावेतौ मृगौ दिव्यौ तारामृगमहीमृगौ ॥ ३७ ॥
भावार्थ
‘यह सुन्दर मृग और वह जो दिव्य आकाशचारी मृग ( मृगशिरानक्षत्र ) है, ये दोनों ही दिव्य मृग हैं । इनमेंसे एक तारामृग और दूसरा महीमृग है ॥ ३७ ॥
यदि वायं तथा यन्मां भवेद् वदसि लक्ष्मण । मायैषा राक्षसस्येति कर्तव्योऽस्य वधो मया ॥ ३८ ॥
भावार्थ
‘लक्ष्मण ! तुम मुझसे जैसा कह रहे हो यदि वैसा ही यह मृग हो, यदि यह राक्षसकी माया ही हो तो भी मुझे उसका वध करना ही चाहिये ॥ ३८ ॥
एतेन हि नृशंसेन मारीचेनाकृतात्मना । वने विचरता पूर्वं हिंसिता मुनिपुंगवाः ॥ ३९ ॥
भावार्थ
‘क्योंकि अपवित्र ( दुष्ट ) चित्तवाले इस क्रूरकर्मा मारीचने वनमें विचरते समय पहले अनेकानेक श्रेष्ठ मुनियोंकी हत्या की है ॥ ३९ ॥
उत्थाय बहवोऽनेन मृगयायां जनाधिपाः । निहताः परमेष्वासास्तस्माद् वध्यस्त्वयं मृगः ॥ ४० ॥
भावार्थ
‘इसने मृगयाके समय प्रकट होकर बहुत-से महाधनुर्धर नरेशोंका वध किया है, अतः इस मृगके रूपमें इसका भी वध अवश्य करने योग्य है ॥ ४० ॥
पुरस्तादिह वातापिः परिभूय तपस्विनः । उदरस्थो द्विजान् हन्ति स्वगर्भोऽश्वतरीमिव ॥ ४१ ॥
भावार्थ
‘इसी वनमें पहले वातापि नामक राक्षस रहता था, जो तपस्वी महात्माओंका तिरस्कार करके कपटपूर्ण उपायसे उनके पेटमें पहुँच जाता और जैसे खच्चरीको अपने ही गर्भका बच्चा नष्ट कर देता है, उसी प्रकार उन ब्रह्मर्षियोंको नष्ट कर देता था ॥ ४१ ॥
स कदाचिच्चिराल्लोभादाससाद महामुनिम् । अगस्त्यं तेजसा युक्तं भक्ष्यस्तस्य बभूव ह ॥ ४२ ॥
भावार्थ
‘वह वातापि एक दिन दीर्घकालके पश्चात् लोभवश तेजस्वी महामुनि अगस्त्यजीके पास जा पहुँचा और ( श्राद्ध-कालमें ) उनका आहार बन गया। उनके पेटमें पहुँच गया ॥ ४२ ॥
समुत्थाने च तद्रूपं कर्तुकामं समीक्ष्य तम् । उत्स्मयित्वा तु भगवान् वातापिमिदमब्रवीत् ॥ ४३ ॥
भावार्थ
‘श्राद्धके अन्तमें जब वह अपना राक्षसरूप प्रकट करनेकी इच्छा करने लगा--उनका पेट फाड़कर निकल आनेको उद्यत हुआ, तब उस वातापिको लक्ष्य करके भगवान् अगस्त्य मुसकराये और उससे इस प्रकार बोले--॥ ४३ ॥
त्वयाविगण्य वातापे परिभूताश्च तेजसा । जीवलोके द्विजश्रेष्ठास्तस्मादसि जरां गतः ॥ ४४ ॥
भावार्थ
‘वातापे ! तुमने बिना सोचे-विचारे इस जीव-जगत्में बहुत-से श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको अपने तेजसे तिरस्कृत किया है, उसी पापसे अब तुम पच गये’ ॥ ४४ ॥
तद् रक्षो न भवेदेव वातापिरिव लक्ष्मण । मद्विधं योऽतिमन्येत धर्मनित्यं जितेन्द्रियम् ॥ ४५ ॥
भावार्थ
‘लक्ष्मण ! जो सदा धर्ममें तत्पर रहनेवाले मुझ-जैसे जितेन्द्रिय पुरुषका भी अतिक्रमण करे, उस मारीच नामक राक्षसको भी वातापिके समान ही नष्ट हो जाना चाहिये ॥४५॥
भवेद्धतोऽयं वातापिरगस्त्येनेव मा गतः । इह त्वं भव संनद्धो यन्त्रितो रक्ष मैथिलीम् ॥ ४६ ॥
भावार्थ
‘जैसे वातापि अगस्त्यके द्वारा नष्ट हुआ, उसी प्रकार यह मारीच अब मेरे सामने आकर अवश्य ही मारा जायगा । तुम अस्त्र और कवच आदिसे सुसज्जित हो जाओ और यहाँ सावधानीके साथ मिथिलेशकुमारीकी रक्षा करो ॥ ४६ ॥
अस्यामायत्तमस्माकं यत् कृत्यं रघुनन्दन । अहमेनं वधिष्यामि ग्रहीष्याम्यथवा मृगम् ॥ ४७ ॥
भावार्थ
‘रघुनन्दन ! हमलोगोंका जो आवश्यक कर्तव्य है, वह सीताकी रक्षाके ही अधीन है । मैं इस मृगको मार डालूँगा अथवा इसे जीता ही पकड़ लाऊँगा ॥ ४७ ॥
यावद् गच्छामि सौमित्रे मृगमानयितुं द्रुतम् । पश्य लक्ष्मण वैदेह्या मृगत्वचि गतां स्पृहाम्॥ ४८ ॥ त्वचा प्रधानया ह्येष मृगोऽद्य न भविष्यति । अप्रमत्तेन ते भाव्यमाश्रमस्थेन सीतया ॥ ४९ ॥ यावत् पृषतमेकेन सायकेन निहन्म्यहम् । हत्वैतच्चर्म चादाय शीघ्रमेष्यामि लक्ष्मण ॥ ५० ॥
भावार्थ
‘सुमित्राकुमार लक्ष्मण ! देखो, इस मृगका चर्म हस्तगत करनेके लिये विदेहनन्दिनीको कितनी उत्कण्ठा हो रही है, इसलिये इस मृगको ले आनेके लिये मैं तुरंत ही जा रहा हूँ ॥ ‘इस मृगको मारनेका प्रधान हेतु है, इसके चमड़ेको प्राप्त करना । आज इसीके कारण यह मृग जीवित नहीं रह सकेगा । लक्ष्मण ! तुम आश्रमपर रहकर सीताके साथ सावधान रहना--सावधानीके साथ तबतक इसकी रक्षा करना, जबतक कि मैं एक ही बाणसे इस चितकबरे मृगको मार नहीं डालता हूँ । मारनेके पश्चात् इसका चमड़ा लेकर मैं शीघ्र लौट आऊँगा ॥ ४९-५० ॥
प्रदक्षिणेनातिबलेन पक्षिणा जटायुषा बुद्धिमता च लक्ष्मण । भवाप्रमत्तः प्रतिगृह्य मैथिलीं प्रतिक्षणं सर्वत एव शङ्कितः ॥ ५१ ॥
भावार्थ
‘लक्ष्मण ! बुद्धिमान् पक्षी गृध्रराज जटायु बड़े ही बलवान् और सामर्थ्यशाली हैं । उनके साथ ही यहाँ सदा सावधान रहना । मिथिलेशकुमारी सीताको अपने संरक्षणमें लेकर प्रतिक्षण सब दिशाओंमें रहनेवाले राक्षसोंकी ओरसे चौकन्ने रहना’ ॥ ५१ ॥
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