अरण्यकाण्ड, सर्ग 39
एवमस्मि तदा मुक्तः कथंचित् तेन संयुगे। इदानीमपि यद् वृत्तं तच्छृणुष्व यदुत्तरम् ॥ १ ॥
भावार्थ
‘इस प्रकार इस समय तो मैं किसी तरह श्रीरामचन्द्रजीके हाथसे जीवित बच गया। उसके बाद इन दिनों जो घटना घटित हुई है, उसे भी सुन लो ॥ १ ॥
राक्षसाभ्यामहं द्वाभ्यामनिर्विण्णस्तथाकृतः। सहितो मृगरूपाभ्यां प्रविष्टो दण्डकावने ॥ २ ॥
भावार्थ
‘श्रीरामने मेरी वैसी दुर्दशा कर दी थी, तो भी मैं उनके विरोधसे बाज नहीं आया। एक दिन मृगरूपधारी दो राक्षसोंके साथ मैं भी मृगका ही रूप धारण करके दण्डकवनमें गया ॥ २ ॥
दीप्तजिह्वो महादंष्ट्रस्तीक्ष्णशृङ्गो महाबलः। व्यचरन् दण्डकारण्यं मांसभक्षो महामृगः ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘मैं महान् बलशाली तो था ही, मेरी जीभ आगके समान उद्दीप्त हो रही थी। दाढ़ें भी बहुत बड़ी थीं, सींग तीखे थे और मैं महान् मृगके रूपमें मांस खाता हुआ दण्डकारण्यमें विचरने लगा ॥ ३ ॥
अग्निहोत्रेषु तीर्थेषु चैत्यवृक्षेषु रावण। अत्यन्तघोरो व्यचरंस्तापसांस्तान् प्रधर्षयन् ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘रावण! मैं अत्यन्त भयंकर रूप धारण किये अग्निशालाओंमें, जलाशयोंके घाटोंपर तथा देववृक्षोंके नीचे बैठे हुए तपस्वीजनोंको तिरस्कृत करता हुआ सब ओर विचरण करने लगा ॥ ४ ॥
निहत्य दण्डकारण्ये तापसान् धर्मचारिणः। रुधिराणि पिबंस्तेषां तन्मांसानि च भक्षयन् ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘दण्डकारण्यके भीतर धर्मानुष्ठानमें लगे हुए तापसोंको मारकर उनका रक्त पीना और मांस खाना यही मेरा काम था ॥ ५ ॥
ऋषिमांसाशनः क्रूरस्त्रासयन् वनगोचरान्। तदा रुधिरमत्तोऽहं व्यचरं दण्डकावनम् ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘मेरा स्वभाव तो क्रूर था ही, मैं ऋषियोंके मांस खाता और वनमें विचरनेवाले प्राणियोंको डराता हुआ रक्तपान करके मतवाला हो दण्डकवनमें घूमने लगा ॥ ६ ॥
तदाहं दण्डकारण्ये विचरन् धर्मदूषकः। आसादयं तदा रामं तापसं धर्ममाश्रितम् ॥ ७ ॥ वैदेहीं च महाभागां लक्ष्मणं च महारथम्। तापसं नियताहारं सर्वभूतहिते रतम् ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘इस प्रकार उस समय दण्डकारण्यमें विचरता हुआ धर्मको कलंकित करनेवाला मैं मारीच तापस धर्मका आश्रय लेनेवाले श्रीराम, विदेहनन्दिनी महाभागा सीता तथा मिताहारी तपस्वीके रूपमें समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहनेवाले महारथी लक्ष्मणके पास जा पहुँचा ॥ ७-८ ॥
सोऽहं वनगतं रामं परिभूय महाबलम् । तापसोऽयमिति ज्ञात्वा पूर्ववैरमनुस्मरन् ॥ ९ ॥ अभ्यधावं सुसंक्रुद्धस्तीक्ष्णशृङ्गो मृगाकृतिः । जिघांसुरकृतप्रज्ञस्तं प्रहारमनुस्मरन् ॥ १० ॥
भावार्थ
‘वनमें आये हुए महाबली श्रीरामको ‘यह एक तपस्वी है’ ऐसा जानकर उनकी अवहेलना करके मैं आगे बढ़ा और पहलेके वैरका बारंबार स्मरण करके अत्यन्त कुपित हो उनकी ओर दौड़ा । उस समय मेरी आकृति मृगके ही समान थी। मेरे सींग बड़े तीखे थे । उनके पहलेके प्रहारको याद करके मैं उन्हें मार डालना चाहता था । मेरी बुद्धि शुद्ध न होनेके कारण मैं उनकी शक्ति और प्रभावको भूल-सा गया था ॥ ९-१० ॥
तेन त्यक्ताश्रयो बाणाः शिताः शत्रुनिबर्हणाः । विकृष्य सुमहच्चापं सुपर्णानिलतुल्यगाः ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘हम तीनोंको आते देख श्रीरामने अपने विशाल धनुषको खींचकर तीन पैने बाण छोड़े, जो गरुड़ और वायुके समान शीघ्रगामी तथा शत्रुके प्राण लेनेवाले थे ॥ ११ ॥
ते बाणा वज्रसंकाशाः सुघोरा रक्तभोजनाः । आजग्मुः सहिताः सर्वे त्रयः संनतपर्वणः ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘झुकी हुई गाँठवाले वे सब तीनों बाण, जो वज्रके समान दुःसह, अत्यन्त भयंकर तथा रक्त पीनेवाले थे, एक साथ ही हमारी ओर आये ॥ १२ ॥
पराक्रमज्ञो रामस्य शठो दृष्टभयः पुरा । समुत्क्रान्तस्ततो मुक्तस्तावुभौ राक्षसौ हतौ ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘मैं तो श्रीरामके पराक्रमको जानता था और पहले एक बार उनके भयका सामना कर चुका था, इसलिये शठतापूर्वक उछलकर भाग निकला । भाग जानेसे मैं तो बच गया; किंतु मेरे वे दोनों साथी राक्षस मारे गये ॥ १३ ॥
शरेण मुक्तो रामस्य कथंचित् प्राप्य जीवितम् । इह प्रव्राजितो युक्तस्तापसोऽहं समाहितः ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘इस बार श्रीरामके बाणसे किसी तरह छुटकारा पाकर मुझे नया जीवन मिला और तभीसे संन्यास लेकर समस्त दुष्कर्मोंका परित्याग करके स्थिरचित्त हो योगाभ्यासमें तत्पर रहकर तपस्यामें लग गया ॥ १४ ॥
वृक्षे वृक्षे हि पश्यामि चीरकृष्णाजिनाम्बरम् । गृहीतधनुषं रामं पाशहस्तमिवान्तकम् ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘अब मुझे एक-एक वृक्षमें चीर, काला मृगचर्म और धनुष धारण किये श्रीराम ही दिखायी देते हैं, जो मुझे पाशधारी यमराजके समान प्रतीत होते हैं ॥ १५ ॥
अपि रामसहस्राणि भीतः पश्यामि रावण । रामभूतमिदं सर्वमरण्यं प्रतिभाति मे ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘रावण ! मैं भयभीत होकर हजारों रामोंको अपने सामने खड़ा देखता हूँ । यह सारा वन ही मुझे राममय प्रतीत हो रहा है ॥ १६ ॥
राममेव हि पश्यामि रहिते राक्षसेश्वर । दृष्ट्वा स्वप्नगतं राममुद्भ्रमामि विचेतनः ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘राक्षसराज ! जब मैं एकान्तमें बैठता हूँ, तब मुझे श्रीरामके ही दर्शन होते हैं । सपनेमें श्रीरामको देखकर मैं उद्भ्रान्त और अचेत-सा हो उठता हूँ ॥ १७ ॥
रकारादीनि नामानि रामत्रस्तस्य रावण । रत्नानि च रथाश्चैव वित्रासं जनयन्ति मे ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘रावण ! मैं रामसे इतना भयभीत हो गया हूँ कि रत्न और रथ आदि जितने भी रकारादि नाम हैं, वे मेरे कानोंमें पड़ते ही मनमें भारी भय उत्पन्न कर देते हैं ॥ १८ ॥
अहं तस्य प्रभावज्ञो न युद्धं तेन ते क्षमम् । बलिं वा नमुचिं वापि हन्याद्धि रघुनन्दनः ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘मैं उनके प्रभावको अच्छी तरह जानता हूँ । इसीलिये कहता हूँ कि श्रीरामके साथ तुम्हारा युद्ध करना कदापि उचित नहीं है। रघुकुलनन्दन श्रीराम राजा बलि अथवा नमुचिका भी वध कर सकते हैं ॥ १९ ॥
रणे रामेण युध्यस्व क्षमां वा कुरु रावण । न ते रामकथा कार्या यदि मां द्रष्टुमिच्छसि ॥ २० ॥
भावार्थ
‘रावण ! तुम्हारी इच्छा हो तो रणभूमिमें श्रीरामके साथ युद्ध करो अथवा उन्हें क्षमा कर दो, किंतु यदि मुझे जीवित देखना चाहते हो तो मेरे सामने श्रीरामकी चर्चा न करो ॥ २० ॥
बहवः साधवो लोके युक्ता धर्ममनुष्ठिताः । परेषामपराधेन विनष्टाः सपरिच्छदाः ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘लोकमें बहुत-से साधुपुरुष, जो योगयुक्त होकर केवल धर्मके ही अनुष्ठानमें लगे रहते थे, दूसरोंके अपराधसे ही परिकरोंसहित नष्ट हो गये ॥ २१ ॥
सोऽहं परापराधेन विनशेयं निशाचर । कुरु यत् ते क्षमं तत्त्वमहं त्वां नानुयामि वै ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘निशाचर ! मैं भी किसी तरह दूसरोंके अपराधसे नष्ट हो सकता हूँ, अतः तुम्हें जो उचित जान पड़े, वह करो । मैं इस कार्यमें तुम्हारा साथ नहीं दे सकता ॥ २२ ॥
रामश्च हि महातेजा महासत्त्वो महाबलः । अपि राक्षसलोकस्य भवेदन्तकरोऽपि हि ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘क्योंकि श्रीरामचन्द्रजी बड़े तेजस्वी, महान् आत्मबलसे सम्पन्न तथा अधिक बलशाली हैं । वे समस्त राक्षस-जगत्का भी संहार कर सकते हैं ॥ २३ ॥
यदि शूर्पणखाहेतोर्जनस्थानगतः खरः । अतिवृत्तो हतः पूर्वं रामेणाक्लिष्टकर्मणा । अत्र ब्रूहि यथातत्त्वं को रामस्य व्यतिक्रमः ॥ २४ ॥ इदं वचो बन्धुहितार्थिना मया यथोच्यमानं यदि नाभिपत्स्यसे । सबान्धवस्त्यक्ष्यसि जीवितं रणे हतोऽद्य रामेण शरैरजिह्मगैः ॥ २५ ॥
भावार्थ
‘यदि शूर्पणखाका बदला लेनेके लिये जनस्थाननिवासी खर पहले श्रीरामपर चढ़ाई करनेके लिये गया और अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीरामके हाथसे मारा गया तो तुम्हीं ठीक-ठीक बताओ, इसमें श्रीरामका क्या अपराध है ? ।२४। ‘तुम मेरे बन्धु हो । मैं तुम्हारा हित करनेकी इच्छासे ही ये बातें कह रहा हूँ । यदि नहीं मानोगे तो युद्धमें आज रामके सीधे जानेवाले बाणोंद्वारा घायल होकर तुम्हें बन्धु-बान्धवोंसहित प्राणोंका परित्याग करना पड़ेगा’ ॥ २५ ॥
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