अरण्यकाण्ड, सर्ग 33
ततः शूर्पणखा दीना रावणं लोकरावणम् । अमात्यमध्ये संक्रुद्धा परुषं वाक्यमब्रवीत् ॥ १ ॥
भावार्थ
उस समय शूर्पणखा श्रीरामसे तिरस्कृत होनेके कारण बहुत दुखी थी । उसने मन्त्रियोंके बीचमें बैठे हुए समस्त लोकोंको रुलानेवाले रावणसे अत्यन्त कुपित होकर कठोर वाणीमें कहा—॥ १ ॥
प्रमत्तः कामभोगेषु स्वैरवृत्तो निरङ्कुशः । समुत्पन्नं भयं घोरं बोद्धव्यं नावबुध्यसे ॥ २ ॥
भावार्थ
‘राक्षसराज ! तुम स्वेच्छाचारी और निरङ्कुश होकर विषय-भोगोंमें मतवाले हो रहे हो । तुम्हारे लिये घोर भय उत्पन्न हो गया है । तुम्हें इसकी जानकारी होनी चाहिये थी, किंतु तुम इसके विषयमें कुछ नहीं जानते हो ॥ २ ॥
सक्तं ग्राम्येषु भोगेषु कामवृत्तं महीपतिम् । लुब्धं न बहु मन्यन्ते श्मशानाग्निमिव प्रजाः ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘जो राजा निम्न श्रेणीके भोगोंमें आसक्त हो स्वेच्छाचारी और लोभी हो जाता है, उसे मरघटकी आगके समान हेय मानकर प्रजा उसका अधिक आदर नहीं करती है ॥ ३ ॥
स्वयं कार्याणि यः काले नानुतिष्ठति पार्थिवः । स तु वै सह राज्येन तैश्च कार्यैर्विनश्यति ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘जो राजा ठीक समयपर स्वयं ही अपने कार्योंका सम्पादन नहीं करता है, वह राज्य और उन कार्योंके साथ ही नष्ट हो जाता है ॥ ४ ॥
अयुक्तचारं दुर्दर्शमस्वाधीनं नराधिपम् । वर्जयन्ति नरा दूरान्नदीपङ्कमिव द्विपाः ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘जो राज्यकी देख-भालके लिये गुप्तचरोंको नियुक्त नहीं करता है, प्रजाजनोंको जिसका दर्शन दुर्लभ हो जाता है और कामिनी आदि भोगोंमें आसक्त होनेके कारण अपनी स्वाधीनता खो बैठता है, ऐसे राजाको प्रजा दूरसे ही त्याग देती है । ठीक उसी तरह, जैसे हाथी नदीकी कीचड़से दूर ही रहते हैं ॥ ५ ॥
ये न रक्षन्ति विषयमस्वाधीनं नराधिपाः । ते न वृद्ध्या प्रकाशन्ते गिरयः सागरे यथा ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘जो नरेश अपने राज्यके उस प्रान्तकी, जो अपनी ही असावधानीके कारण दूसरेके अधिकारमें चला गया हो, रक्षा नहीं करते—उसे पुनः अपने अधिकारमें नहीं लाते, वे समुद्रमें डूबे हुए पर्वतोंकी भाँति अपने अभ्युदयसे प्रकाशित नहीं होते हैं ॥ ६ ॥
आत्मवद्भिर्विगृह्य त्वं देवगन्धर्वदानवैः । अयुक्तचारश्चपलः कथं राजा भविष्यसि ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘जो अपने मनको काबूमें रखनेवाले एवं प्रयत्नशील हैं, उन देवताओं, गन्धर्वों तथा दानवोंके साथ विरोध करके तुमने अपने राज्यकी देखभालके लिये गुप्तचर नहीं नियुक्त किये हैं, ऐसी दशामें तुम-जैसा विषयलोलुप चपल पुरुष कैसे राजा बना रह सकेगा ? ॥ ७ ॥
त्वं तु बालस्वभावश्च बुद्धिहीनश्च राक्षस । ज्ञातव्यं तन्न जानीषे कथं राजा भविष्यसि ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘राक्षस ! तुम्हारा स्वभाव बालकों-जैसा है । तुम निरे बुद्धिहीन हो । तुम्हें जानने योग्य बातोंका भी ज्ञान नहीं है । ऐसी दशामें तुम किस तरह राजा बने रह सकोगे ? ॥ ८ ॥
येषां चाराश्च कोशश्च नयश्च जयतां वर । अस्वाधीना नरेन्द्राणां प्राकृतैस्ते जनैः समाः ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ निशाचरपते ! जिन नरेशोंके गुप्तचर, कोष और नीति—ये सब अपने अधीन नहीं हैं, वे साधारण लोगोंके ही समान हैं ॥ ९ ॥
यस्मात् पश्यन्ति दूरस्थान् सर्वानर्थान् नराधिपाः । चारेण तस्मादुच्यन्ते राजानो दीर्घचक्षुषः ॥ १० ॥
भावार्थ
‘गुप्तचरोंकी सहायतासे राजालोग दूर-दूरके सारे कार्योंकी देखभाल करते-रहते हैं, इसीलिये वे दीर्घदर्शी या दूरदर्शी कहलाते हैं ॥ १० ॥
अयुक्तचारं मन्ये त्वां प्राकृतैः सचिवैर्युतः । स्वजनं च जनस्थानं निहतं नावबुध्यसे ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘मैं समझती हूँ, तुम गवाँर मन्त्रियोंसे घिरे हुए हो, तभी तो तुमने अपने राज्यके भीतर गुप्तचर नहीं तैनात किये हैं । तुम्हारे स्वजन मारे गये और जनस्थान उजाड़ हो गया, फिर भी तुम्हें इसका पता नहीं लगा है ॥ ११ ॥
चतुर्दश सहस्राणि रक्षसां भीमकर्मणाम् । हतान्येकेन रामेण खरश्च सदूषणः ॥ १२ ॥ ऋषीणामभयं दत्तं कृतक्षेमाश्च दण्डकाः । धर्षितं च जनस्थानं रामेणाक्लिष्टकारिणा ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘अकेले रामने, जो अनायास ही महान् कर्म करनेवाले हैं, भीमकर्मा राक्षसोंकी चौदह हजार सेनाको यमलोक पहुँचा दिया, खर और दूषणके भी प्राण ले लिये, ऋषियोंको भी अभयदान कर दिया तथा दण्डकारण्यमें राक्षसोंकी ओरसे जो विघ्न-बाधाएँ थीं, उन सबको दूर करके वहाँ शान्ति स्थापित कर दी । जनस्थानको तो उन्होंने चौपट ही कर डाला ॥ १२–१३ ॥
त्वं तु लुब्धः प्रमत्तश्च पराधीनश्च राक्षस । विषये स्वे समुत्पन्नं यद् भयं नावबुध्यसे ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘राक्षस ! तुम तो लोभ और प्रमादमें फँसकर पराधीन हो रहे हो, अतः अपने ही राज्यमें उत्पन्न हुए भयका तुम्हें कुछ पता ही नहीं है ॥ १४ ॥
तीक्ष्णमल्पप्रदातारं प्रमत्तं गर्वितं शठम् । व्यसने सर्वभूतानि नाभिधावन्ति पार्थिवम् ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘जो राजा कठोरतापूर्ण बर्ताव करता अथवा तीखे स्वभावका परिचय देता है, सेवकोंको बहुत कम वेतन देता है, प्रमादमें पड़ा और गर्वमें भरा रहता है तथा स्वभावसे ही शठ होता है, उसके संकटमें पड़नेपर सभी प्राणी उसका साथ छोड़ देते हैं--उसकी सहायताके लिये आगे नहीं बढ़ते हैं ॥ १५ ॥
अतिमानिनमग्राह्यमात्मसम्भावितं नरम् । क्रोधनं व्यसने हन्ति स्वजनोऽपि नराधिपम् ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘जो अत्यन्त अभिमानी, अपनानेके अयोग्य, आप ही अपनेको बहुत बड़ा माननेवाला और क्रोधी होता है, ऐसे नर अथवा नरेशको संकटकालमें आत्मीय जन भी मार डालते हैं ॥ १६ ॥
नानुतिष्ठति कार्याणि भयेषु न बिभेति च । क्षिप्रं राज्याच्च्युतो दीनस्तृणैस्तुल्यो भवेदिह ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘जो राजा अपने कर्तव्यका पालन अथवा करने योग्य कार्योंका सम्पादन नहीं करता तथा भयके अवसरोंपर भयभीत ( एवं अपनी रक्षाके लिये सावधान ) नहीं होता, वह शीघ्र ही राज्यसे भ्रष्ट एवं दीन होकर इस भूतलपर तिनकोंके समान उपेक्षणीय हो जाता है ॥ १७ ॥
शुष्ककाष्ठैर्भवेत् कार्यं लोष्टैरपि च पांसुभिः । न तु स्थानात् परिभ्रष्टैः कार्यं स्याद् वसुधाधिपैः ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘लोगोंको सूखे काठोंसे, मिट्टीके ढेलों तथा धूलसे भी कुछ प्रयोजन होता है, किंतु स्थानभ्रष्ट राजाओंसे उन्हें कोई प्रयोजन नहीं रहता ॥ १८ ॥
उपभुक्तं यथा वासः स्रजो वा मृदिता यथा । एवं राज्यात् परिभ्रष्टः समर्थोऽपि निरर्थकः ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘जैसे पहना हुआ वस्त्र और मसली डाली गयी फूलोंकी माला दूसरोंके उपयोगमें आने योग्य नहीं होती, इसी प्रकार राज्यसे भ्रष्ट हुआ राजा समर्थ होनेपर भी दूसरोंके लिये निरर्थक है ॥ १९ ॥
अप्रमत्तश्च यो राजा सर्वज्ञो विजितेन्द्रियः । कृतज्ञो धर्मशीलश्च स राजा तिष्ठते चिरम् ॥ २० ॥
भावार्थ
‘परंतु जो राजा सदा सावधान रहता, राज्यके समस्त कार्योंकी जानकारी रखता, इन्द्रियोंको वशमें किये रहता, कृतज्ञ ( दूसरोंके उपकारको माननेवाला ) तथा स्वभावसे ही धर्मपरायण होता है, वह राजा बहुत दिनोंतक राज्य करता है ॥ २० ॥
नयनाभ्यां प्रसुप्तो वा जागर्ति नयचक्षुषा । व्यक्तक्रोधप्रसादश्च स राजा पूज्यते जनैः ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘जो स्थूल आँखोंसे तो सोता है, परंतु नीतिकी आँखोंसे सदा जागता रहता है तथा जिसके क्रोध और अनुग्रहका फल प्रत्यक्ष प्रकट होता है, उसी राजाकी लोग पूजा करते हैं ॥ २१ ॥
त्वं तु रावण दुर्बुद्धिर्गुणैरेतैर्विवर्जितः । यस्य तेऽविदितश्चारै रक्षसां सुमहान् वधः ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘रावण ! तुम्हारी बुद्धि दूषित है और तुम इन सभी राजोचित गुणोंसे वञ्चित हो; क्योंकि तुम्हें अबतक गुप्तचरोंकी सहायतासे राक्षसोंके इस महान् संहारका समाचार ज्ञात नहीं हो सका था ॥ २२ ॥
परावमन्ता विषयेषु सङ्गवान् न देशकालप्रविभागतत्त्ववित् । अयुक्तबुद्धिर्गुणदोषनिश्चये विपन्नराज्यो न चिराद् विपत्स्यसे ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘तुम दूसरोंका अनादर करनेवाले, विषयासक्त और देश-कालके विभागको यथार्थरूपसे न जाननेवाले हो, तुमने गुण और दोषके विचार एवं निश्चयमें कभी अपनी बुद्धिको नहीं लगाया है, अतः तुम्हारा राज्य शीघ्र ही नष्ट हो जायगा और तुम स्वयं भी भारी विपत्तिमें पड़ जाओगे’ ॥ २३ ॥
इति स्वदोषान् परिकीर्तितांस्तया समीक्ष्य बुद्ध्या क्षणदाचरेश्वरः । धनेन दर्पेण बलेन चान्वितो विचिन्तयामास चिरं स रावणः ॥ २४ ॥
भावार्थ
शूर्पणखाके द्वारा कहे गये अपने दोषोंपर बुद्धिपूर्वक विचार करके धन, अभिमान और बलसे सम्पन्न वह निशाचर रावण बहुत देरतक सोच-विचार एवं चिन्तामें पड़ा रहा ॥ २४ ॥
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