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अरण्यकाण्ड, सर्ग 12

स प्रविश्याश्रमपदं लक्ष्मणो राघवानुजः। अगस्त्यशिष्यमासाद्य वाक्यमेतदुवाच ह ॥ १ ॥

भावार्थ

श्रीरामचन्द्रजीके छोटे भाई लक्ष्मणने आश्रममें प्रवेश करके अगस्त्यजीके शिष्यसे भेंट की और उनसे यह बात कही—॥ १ ॥

राजा दशरथो नाम ज्येष्ठस्तस्य सुतो बली। रामः प्राप्तो मुनिं द्रष्टुं भार्यया सह सीतया ॥ २ ॥

भावार्थ

‘मुने ! अयोध्यामें जो दशरथ नामसे प्रसिद्ध राजा थे, उन्हींके ज्येष्ठ पुत्र महाबली श्रीरामचन्द्रजी अपनी पत्नी सीताके साथ महर्षिका दर्शन करनेके लिये आये हैं ॥ २ ॥

लक्ष्मणो नाम तस्याहं भ्राता त्ववरजो हितः। अनुकूलश्च भक्तश्च यदि ते श्रोत्रमागतः ॥ ३ ॥

भावार्थ

‘मैं उनका छोटा भाई, हितैषी और अनुकूल चलनेवाला भक्त हूँ। मेरा नाम लक्ष्मण है। सम्भव है यह नाम कभी आपके कानोंमें पड़ा हो ॥ ३ ॥

ते वयं वनमत्युग्रं प्रविष्टाः पितृशासनात्। द्रष्टुमिच्छामहे सर्वे भगवन्तं निवेद्यताम् ॥ ४ ॥

भावार्थ

‘हम सब लोग पिताकी आज्ञासे इस अत्यन्त भयंकर वनमें आये हैं और भगवान् अगस्त्य मुनिका दर्शन करना चाहते हैं। आप उनसे यह समाचार निवेदन कीजिये’ ॥ ४ ॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा लक्ष्मणस्य तपोधनः। तथेत्युक्त्वाग्निशरणं प्रविवेश निवेदितुम् ॥ ५ ॥

भावार्थ

लक्ष्मणकी वह बात सुनकर उन तपोधनने ‘बहुत अच्छा’ कहकर महर्षिको समाचार देनेके लिये अग्निशालामें प्रवेश किया ॥ ५ ॥

स प्रविश्य मुनिश्रेष्ठं तपसा दुष्प्रधर्षणम्। कृताञ्जलिरुवाचेदं रामागमनमञ्जसा ॥ ६ ॥ यथोक्तं लक्ष्मणेनैव शिष्योऽगस्त्यस्य सम्मतः।

भावार्थ

अग्निशालामें प्रवेश करके अगस्त्यके उस प्रिय शिष्यने जो अपनी तपस्याके प्रभावसे दूसरोंके लिये दुर्जय थे, उन मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यके पास जा हाथ जोड़ लक्ष्मणके कथनानुसार उन्हें श्रीरामचन्द्रजीके आगमनका समाचार शीघ्रतापूर्वक यों सुनाया—॥ ६½ ॥

पुत्रौ दशरथस्येमौ रामो लक्ष्मण एव च ॥ ७ ॥ प्रविष्टावाश्रमपदं सीतया सह भार्यया। द्रष्टुं भवन्तमायातौ शुश्रूषार्थमरिंदमौ ॥ ८ ॥ यदत्रानन्तरं तत् त्वमाज्ञापयितुमर्हसि।

भावार्थ

‘महामुने ! राजा दशरथके ये दो पुत्र श्रीराम और लक्ष्मण आश्रममें पधारे हैं। श्रीराम अपनी धर्मपत्नी सीताके साथ हैं । वे दोनों शत्रुदमन वीर आपकी सेवाके उद्देश्यसे आपका दर्शन करनेके लिये आये हैं। अब इस विषयमें जो कुछ कहना या करना हो, इसके लिये आप मुझे आज्ञा दें‘ ॥ ७-८½ ॥

ततः शिष्यादुपश्रुत्य प्राप्तं रामं सलक्ष्मणम् ॥ ९ ॥ वैदेहीं च महाभागामिदं वचनमब्रवीत् ।

भावार्थ

शिष्यसे लक्ष्मणसहित श्रीराम और महाभागा विदेहनन्दिनी सीताके शुभागमनका समाचार सुनकर महर्षिने इस प्रकार कहा—॥ ९½ ॥

दिष्ट्या रामश्चिरस्याद्य द्रष्टुं मां समुपागतः ॥ १० ॥ मनसा काङ्क्षितं ह्यस्य मयाप्यागमनं प्रति । गम्यतां सत्कृतो रामः सभार्यः सहलक्ष्मणः ॥ ११ ॥ प्रवेश्यतां समीपं मे किमसौ न प्रवेशितः । एवमुक्तस्तु मुनिना धर्मज्ञेन महात्मना ॥ १२ ॥ अभिवाद्याब्रवीच्छिष्यस्तथेति नियताञ्जलिः ।

भावार्थ

‘सौभाग्यकी बात है कि आज चिरकालके बाद श्रीरामचन्द्रजी स्वयं ही मुझसे मिलनेके लिये आ गये । मेरे मनमें भी बहुत दिनोंसे यह अभिलाषा थी कि वे एक बार मेरे आश्रमपर पधारते । जाओ, पत्नीसहित श्रीराम और लक्ष्मणको सत्कारपूर्वक आश्रमके भीतर मेरे समीप ले आओ । तुम अबतक उन्हें ले क्यों नहीं आये ?‘ ॥ धर्मज्ञ महात्मा अगस्त्य मुनिके ऐसा कहनेपर शिष्यने हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया और कहा—‘बहुत अच्छा अभी ले आता हूँ‘ ॥ १२½ ॥

तदा निष्क्रम्य सम्भ्रान्तः शिष्यो लक्ष्मणमब्रवीत् ॥ १३ ॥ कोऽसौ रामो मुनिं द्रष्टुमेतु प्रविशतु स्वयम् ।

भावार्थ

इसके बाद वह शिष्य आश्रमसे निकलकर शीघ्रतापूर्वक लक्ष्मणके पास गया और बोला—‘श्रीरामचन्द्रजी कौन हैं ? वे स्वयं आश्रममें प्रवेश करें और मुनिका दर्शन करनेके लिये चलें‘ ॥ १३½ ॥

ततो गत्वाऽऽश्रमपदं शिष्येण सह लक्ष्मणः ॥ १४ ॥ दर्शयामास काकुत्स्थं सीतां च जनकात्मजाम् ।

भावार्थ

तब लक्ष्मणने शिष्यके साथ आश्रमके द्वारपर जाकर उसे श्रीरामचन्द्रजी तथा जनककिशोरी श्रीसीताका दर्शन कराया ॥ १४½ ॥

तं शिष्यः प्रश्रितं वाक्यमगस्त्यवचनं ब्रुवन् ॥ १५ ॥ प्रावेशयद् यथान्यायं सत्कारार्हं सुसत्कृतम् ।

भावार्थ

शिष्यने बड़ी विनयके साथ महर्षि अगस्त्यकी कही हुई बात वहाँ दुहरायी और जो सत्कारके योग्य थे, उन श्रीरामका यथोचित रीतिसे भलीभाँति सत्कार करके वह उन्हें आश्रममें ले गया ॥ १५½ ॥

प्रविवेश ततो रामः सीतया सह लक्ष्मणः ॥ १६ ॥ प्रशान्तहरिणाकीर्णमाश्रमं ह्यवलोकयन् । स तत्र ब्रह्मणः स्थानमग्नेः स्थानं तथैव च ॥ १७ ॥ विष्णोः स्थानं महेन्द्रस्य स्थानं चैव विवस्वतः । सोमस्थानं भगस्थानं स्थानं कौबेरमेव च ॥ १८ ॥ धातुर्विधातुः स्थानं च वायोः स्थानं तथैव च । स्थानं च पाशहस्तस्य वरुणस्य महात्मनः ॥ १९ ॥ स्थानं तथैव गायत्र्या वसूनां स्थानमेव च । स्थानं च नागराजस्य गरुडस्थानमेव च ॥ २० ॥ कार्तिकेयस्य च स्थानं धर्मस्थानं च पश्यति । ततः शिष्यैः परिवृतो मुनिरप्यभिनिष्पतत् ॥ २१ ॥ तं ददर्शाग्रतो रामो मुनीनां दीप्ततेजसाम् । अब्रवीद् वचनं वीरो लक्ष्मणं लक्ष्मिवर्धनम् ॥ २२ ॥

भावार्थ

उस समय श्रीरामने लक्ष्मण और सीताके साथ आश्रममें प्रवेश किया । वह आश्रम शान्तभावसे रहनेवाले हरिणोंसे भरा हुआ था । आश्रमकी शोभा देखते हुए उन्होंने वहाँ ब्रह्माजीका स्थान और अग्निदेवका स्थान देखा ॥ फिर क्रमशः भगवान् विष्णु, महेन्द्र, सूर्य, चन्द्रमा, भग, कुबेर, धाता, विधाता, वायु, पाशधारी महात्मा वरुण, गायत्री, वसु, नागराज अनन्त, गरुड़, कार्तिकेय तथा धर्मराजके पृथक्-पृथक् स्थानका निरीक्षण किया ॥ इतनेहीमें मुनिवर अगस्त्य भी शिष्योंसे घिरे हुए अग्निशालासे बाहर निकले । वीर श्रीरामने मुनियोंके आगे-आगे आते हुए उद्दीप्त तेजस्वी अगस्त्यजीका दर्शन किया और अपनी शोभाका विस्तार करनेवाले लक्ष्मणसे इस प्रकार कहा—॥ २१-२२ ॥

बहिर्लक्ष्मण निष्क्रामत्यगस्त्यो भगवानृषिः । औदार्येणावगच्छामि निधानं तपसामिमम् ॥ २३ ॥ एवमुक्त्वा महाबाहुरगस्त्यं सूर्यवर्चसम् । जग्राहापततस्तस्य पादौ च रघुनन्दनः ॥ २४ ॥

भावार्थ

‘लक्ष्मण ! भगवान् अगस्त्य मुनि आश्रमसे बाहर निकल रहे हैं । ये तपस्याके निधि हैं । इनके विशिष्ट तेजके आधिक्यसे ही मुझे पता चलता है कि ये अगस्त्यजी हैं‘ ॥ सूर्यतुल्य तेजस्वी महर्षि अगस्त्यके विषयमें ऐसा कहकर महाबाहु रघुनन्दनने सामनेसे आते हुए उन मुनीश्वरके दोनों चरण पकड़ लिये ॥ २४ ॥

अभिवाद्य तु धर्मात्मा तस्थौ रामः कृताञ्जलिः । सीतया सह वैदेह्या तदा रामः सलक्ष्मणः ॥ २५ ॥

भावार्थ

जिनमें योगियोंका मन रमण करता है अथवा जो भक्तों को आनन्द प्रदान करनेवाले हैं, वे धर्मात्मा श्रीराम उस समय विदेहकुमारी सीता और लक्ष्मणके साथ महर्षिके चरणोंमें प्रणाम करके हाथ जोड़कर खड़े हो गये ॥ २५ ॥

प्रतिगृह्य च काकुत्स्थमर्चयित्वाऽऽसनोदकैः। कुशलप्रश्नमुक्त्वा च आस्यतामिति सोऽब्रवीत्॥२६॥

भावार्थ

महर्षिने भगवान् श्रीरामको हृदयसे लगाया और आसन तथा जल ( पाद्य, अर्घ्य आदि ) देकर उनका आतिथ्य-सत्कार किया। फिर कुशल-समाचार पूछकर उन्हें बैठनेको कहा ॥ २६ ॥

अग्नि हुत्वा प्रदायार्घ्यमतिथीन् प्रतिपूज्य च । वानप्रस्थेन धर्मेण स तेषां भोजनं ददौ ॥ २७ ॥

भावार्थ

अगस्त्यजीने पहले अग्निमें आहुति दी, फिर वानप्रस्थधर्मके अनुसार अर्घ्य दे अतिथियोंका भलीभाँति पूजन करके उनके लिये भोजन दिया ॥ २७ ॥

प्रथमं चोपविश्याथ धर्मज्ञो मुनिपुंगवः। उवाच राममासीनं प्राञ्जलिं धर्मकोविदम् ॥ २८ ॥ अग्नि हुत्वा प्रदायार्घ्यमतिथिं प्रतिपूजयेत् । अन्यथा खलु काकुत्स्थ तपस्वी समुदाचरन् । दुःसाक्षीव परे लोके स्वानि मांसानि भक्षयेत् ॥ २९ ॥

भावार्थ

धर्मके ज्ञाता मुनिवर अगस्त्यजी पहले स्वयं बैठे, फिर धर्मज्ञ श्रीरामचन्द्रजी हाथ जोड़कर आसनपर विराजमान हुए । इसके बाद महर्षिने उनसे कहा—‘काकुत्स्थ ! वानप्रस्थको चाहिये कि वह पहले अग्निको आहुति दे। तदनन्तर अर्घ्य देकर अतिथिका पूजन करे । जो तपस्वी इसके विपरीत आचरण करता है, उसे झूठी गवाही देनेवालेकी भाँति परलोकमें अपने ही शरीरका मांस खाना पड़ता है ॥ २८-२९ ॥

राजा सर्वस्य लोकस्य धर्मचारी महारथः। पूजनीयश्च मान्यश्च भवान् प्राप्तः प्रियातिथिः ॥ ३० ॥

भावार्थ

‘आप सम्पूर्ण लोकके राजा, महारथी और धर्मका आचरण करनेवाले हैं तथा मेरे प्रिय अतिथिके रूपमें इस आश्रमपर पधारे हैं, अतएव आप हमलोगोंके माननीय एवं पूजनीय हैं’ ॥ ३० ॥

एवमुक्त्वा फलैर्मूलैः पुष्पैश्चान्यैश्च राघवम् । पूजयित्वा यथाकामं ततोऽगस्त्यस्तमब्रवीत् ॥ ३१ ॥

भावार्थ

ऐसा कहकर महर्षि अगस्त्यने फल, मूल, फूल तथा अन्य उपकरणोंसे इच्छानुसार भगवान् श्रीरामका पूजन किया । तत्पश्चात् अगस्त्यजी उनसे इस प्रकार बोले—॥ ३१ ॥

इदं दिव्यं महच्चापं हेमवज्रविभूषितम् । वैष्णवं पुरुषव्याघ्र निर्मितं विश्वकर्मणा ॥ ३२ ॥ अमोघः सूर्यसंकाशो ब्रह्मदत्तः शरोत्तमः । दत्तौ मम महेन्द्रेण तूणी चाक्षय्यसायकौ ॥ ३३ ॥ सम्पूर्णौ निशितैर्बाणैर्ज्वलद्भिरिव पावकैः । महाराजतकोशोऽयमसिर्हेमविभूषितः ॥ ३४ ॥

भावार्थ

‘पुरुषसिंह ! यह महान् दिव्य धनुष विश्वकर्माजीने बनाया है । इसमें सुवर्ण और हीरे जड़े हैं । यह भगवान् विष्णुका दिया हुआ है तथा यह जो सूर्यके समान देदीप्यमान अमोघ उत्तम बाण है, ब्रह्माजीका दिया हुआ है । इनके सिवा इन्द्रने ये दो तरकस दिये हैं, जो तीखे तथा प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी बाणोंसे सदा भरे रहते हैं, कभी खाली नहीं होते । साथ ही यह तलवार भी है जिसकी मूठमें सोना जड़ा हुआ है । इसकी म्यान भी सोनेकी ही बनी हुई है ॥ ३२–३४ ॥

आनेन धनुषा राम हत्वा संख्ये महासुरान् । आजहार श्रियं दीप्तां पुरा विष्णुर्दिवौकसाम् ॥ ३५ ॥ तद्धनुस्तौ च तूणी च शरं खड्गं च मानद । जयाय प्रतिगृह्णीष्व वज्रं वज्रधरो यथा ॥ ३६ ॥ एवमुक्त्वा महातेजाः समस्तं तद्वरायुधम् । दत्त्वा रामाय भगवानगस्त्यः पुनरब्रवीत् ॥ ३७ ॥

भावार्थ

‘श्रीराम ! पूर्वकालमें भगवान् विष्णुने इसी धनुषसे युद्धमें बड़े-बड़े असुरोंका संहार करके देवताओंकी उद्दीप्त लक्ष्मीको उनके अधिकारसे लौटाया था । मानद ! आप यह धनुष, ये दोनों तरकस, ये बाण और यह तलवार ( राक्षसोंपर ) विजय पानेके लिये ग्रहण कीजिये । ठीक उसी तरह, जैसे वज्रधारी इन्द्र वज्र ग्रहण करते हैं’ ॥ ऐसा कहकर महान् तेजस्वी अगस्त्यने वे सभी श्रेष्ठ आयुध श्रीरामचन्द्रजीको सौंप दिये । तत्पश्चात् वे फिर बोले ॥ ३७ ॥

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