दोहा 96b
स्वारथ साँच जीव कहुँ एहा। मन क्रम बचन राम पद नेहा॥ सोइ पावन सोइ सुभग सरीरा। जो तनु पाइ भजिअ रघुबीरा॥१॥
भावार्थ
जीवके लिये सच्चा स्वार्थ यही है कि मन, वचन और कर्मसे श्रीरामजीके चरणोंमें प्रेम हो। वही शरीर पवित्र और सुन्दर है जिस शरीरको पाकर श्रीरघुवीरका भजन किया जाय॥१॥
राम बिमुख लहि बिधि सम देही। कबि कोबिद न प्रसंसहिं तेही॥ राम भगति एहिं तन उर जामी। ताते मोहि परम प्रिय स्वामी॥२॥
भावार्थ
जो श्रीरामजीके विमुख है वह यदि ब्रह्माजीके समान शरीर पा जाय तो भी कवि और पण्डित उसकी प्रशंसा नहीं करते। इसी शरीरसे मेरे हृदयमें रामभक्ति उत्पन्न हुई। इसीसे हे स्वामी! यह मुझे परम प्रिय है॥२॥
तजउँ न तन निज इच्छा मरना। तन बिनु बेद भजन नहिं बरना॥ प्रथम मोहँ मोहि बहुत बिगोवा। राम बिमुख सुख कबहुँ न सोवा॥३॥
भावार्थ
मेरा मरण अपनी इच्छापर है, परन्तु फिर भी मैं यह शरीर नहीं छोड़ता; क्योंकि वेदोंने वर्णन किया है कि शरीरके बिना भजन नहीं होता। पहले मोहने मेरी बड़ी दुर्दशा की। श्रीरामजीके विमुख होकर मैं कभी सुखसे नहीं सोया॥३॥
नाना जनम कर्म पुनि नाना। किए जोग जप तप मख दाना॥ कवन जोनि जनमेउँ जहँ नाहीं। मैं खगेस भ्रमि भ्रमि जग माहीं॥४॥
भावार्थ
अनेकों जन्मोंमें मैंने अनेकों प्रकारके योग, जप, तप, यज्ञ और दान आदि कर्म किये। हे गरुड़जी! जगत्में ऐसी कौन योनि है, जिसमें मैंने [ बार-बार ] घूम-फिरकर जन्म न लिया हो॥४॥
देखेउँ करि सब करम गोसाईं। सुखी न भयउँ अबहिं की नाईं॥ सुधि मोहि नाथ जन्म बहु केरी। सिव प्रसाद मति मोहँ न घेरी॥५॥
भावार्थ
हे गुसाईं! मैंने सब कर्म करके देख लिये, पर अब ( इस जन्म ) की तरह मैं कभी सुखी नहीं हुआ। हे नाथ! मुझे बहुत-से जन्मोंकी याद है। [ क्योंकि ] श्रीशिवजीकी कृपासे मेरी बुद्धिको मोहने नहीं घेरा॥५॥
प्रथम जन्म के चरित अब कहउँ सुनहु बिहगेस। सुनि प्रभु पद रति उपजइ जातें मिटहिं कलेस॥ ९६ (क) ॥
भावार्थ
हे पक्षिराज! सुनिये, अब मैं अपने प्रथम जन्मके चरित्र कहता हूँ, जिन्हें सुनकर प्रभुके चरणोंमें प्रीति उत्पन्न होती है, जिससे सब क्लेश मिट जाते हैं॥९६ ( क )॥
पूरुब कल्प एक प्रभु जुग कलिजुग मल मूल। नर अरु नारि अधर्म रत सकल निगम प्रतिकूल॥ ९६ (ख) ॥
भावार्थ
हे प्रभो! पूर्वके एक कल्पमें पापोंका मूल युग कलियुग था, जिसमें पुरुष और स्त्री सभी अधर्मपरायण और वेदके विरोधी थे॥९६ ( ख )॥
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