Ramayana.com

दोहा 94b

चौ०

तुम्ह सर्बग्य तग्य तम पारा। सुमति सुसील सरल आचारा॥ ग्यान बिरति बिग्यान निवासा। रघुनायक के तुम्ह प्रिय दासा॥१॥

भावार्थ

आप सब कुछ जाननेवाले हैं, तत्त्वके ज्ञाता हैं, अन्धकार ( माया ) से परे, उत्तम बुद्धिसे युक्त, सुशील, सरल आचरणवाले, ज्ञान, वैराग्य और विज्ञानके धाम और श्रीरघुनाथजीके प्रिय दास हैं॥१॥

चौ०

कारन कवन देह यह पाई। तात सकल मोहि कहहु बुझाई॥ राम चरित सर सुंदर स्वामी। पायहु कहाँ कहहु नभगामी॥२॥

भावार्थ

आपने यह काकशरीर किस कारणसे पाया ? हे तात! सब समझाकर मुझसे कहिये। हे स्वामी! हे आकाशगामी! यह सुन्दर रामचरितमानस आपने कहाँ पाया, सो कहिये॥२॥

चौ०

नाथ सुना मैं अस सिव पाहीं। महा प्रलयहुँ नास तव नाहीं॥ मुधा बचन नहिं ईस्वर कहई। सोउ मोरें मन संसय अहई॥३॥

भावार्थ

हे नाथ! मैंने शिवजीसे ऐसा सुना है कि महाप्रलयमें भी आपका नाश नहीं होता और ईश्वर ( शिवजी ) कभी मिथ्या वचन कहते नहीं। वह भी मेरे मनमें सन्देह है॥३॥

चौ०

अग जग जीव नाग नर देवा। नाथ सकल जगु काल कलेवा॥ अंड कटाह अमित लयकारी। कालु सदा दुरतिक्रम भारी॥४॥

भावार्थ

[ क्योंकि ] हे नाथ! नाग, मनुष्य, देवता आदि चर-अचर जीव तथा यह सारा जगत्‌ कालका कलेवा है। असंख्य ब्रह्माण्डोंका नाश करनेवाला काल सदा बड़ा ही अनिवार्य है॥४॥

सो०

तुम्हहि न ब्यापत काल अति कराल कारन कवन। मोहि सो कहहु कृपाल ग्यान प्रभाव कि जोग बल॥९४(क)॥

भावार्थ

[ ऐसा वह ] अत्यन्त भयङ्कर काल आपको नहीं व्यापता ( आपपर प्रभाव नहीं दिखलाता ) इसका क्या कारण है ? हे कृपालु! मुझे कहिये, यह ज्ञानका प्रभाव है या योगका बल है ?॥९४(क)॥

दो०

प्रभु तव आश्रम आएँ मोर मोह भ्रम भाग। कारन कवन सो नाथ सब कहहु सहित अनुराग॥९४(ख)॥

भावार्थ

हे प्रभो! आपके आश्रममें आते ही मेरा मोह और भ्रम भाग गया। इसका क्या कारण है ? हे नाथ! यह सब प्रेमसहित कहिये॥९४(ख)॥

Ramayan appFree. No ads. Works offline.Install

गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें