दोहा 90b
बिनु संतोष न काम नसाहीं। काम अछत सुख सपनेहुँ नाहीं॥ राम भजन बिनु मिटहिं कि कामा। थल बिहीन तरु कबहुंँ कि जामा॥१॥
भावार्थ
संतोषके बिना कामनाका नाश नहीं होता और कामनाओंके रहते स्वप्नमें भी सुख नहीं हो सकता। और श्रीरामके भजन बिना कामनाएँ कहीं मिट सकती हैं ? बिना धरतीके भी कहीं पेड़ उग सकता है ?॥१॥
बिनु बिग्यान कि समता आवइ। कोउ अवकास कि नभ बिनु पावइ॥ श्रद्धा बिना धर्म नहिं होई। बिनु महि गंध कि पावइ कोई॥२॥
भावार्थ
विज्ञान ( तत्त्वज्ञान ) के बिना क्या समभाव आ सकता है ? आकाशके बिना क्या कोई अवकाश ( पोल ) पा सकता है ? श्रद्धाके बिना धर्म [ का आचरण ] नहीं होता। क्या पृथ्वीतत्त्वके बिना कोई गन्ध पा सकता है ?॥२॥
बिनु तप तेज कि कर बिस्तारा। जल बिनु रस कि होइ संसारा॥ सील कि मिल बिनु बुध सेवकाई। जिमि बिनु तेज न रूप गोसाँई॥३॥
भावार्थ
तपके बिना क्या तेज फैल सकता है ? जल-तत्त्वके बिना संसारमें क्या रस हो सकता है ? पण्डितजनोंकी सेवा बिना क्या शील ( सदाचार ) प्राप्त हो सकता है ? हे गोसाईं! जैसे बिना तेज ( अग्नि-तत्त्व ) के रूप नहीं मिलता॥३॥
निज सुख बिनु मन होइ कि थीरा। परस कि होइ बिहीन समीरा॥ कवनिउ सिद्धि कि बिनु बिस्वासा। बिनु हरि भजन न भव भय नासा॥४॥
भावार्थ
निज-सुख ( आत्मानन्द ) के बिना क्या मन स्थिर हो सकता है ? वायु-तत्त्वके बिना क्या स्पर्श हो सकता है ? क्या विश्वासके बिना कोई भी सिद्धि हो सकती है ? इसी प्रकार श्रीहरिके भजन बिना जन्म-मृत्युके भयका नाश नहीं होता॥४॥
बिनु बिस्वास भगति नहिं तेहि बिनु द्रवहिं न रामु। राम कृपा बिनु सपनेहुँ जीव न लह बिश्रामु॥९०(क)॥
भावार्थ
बिना विश्वासके भक्ति नहीं होती, भक्तिके बिना श्रीरामजी पिघलते ( ढरते ) नहीं और श्रीरामजीकी कृपाके बिना जीव स्वप्नमें भी शान्ति नहीं पाता॥९०(क)॥
अस बिचारि मतिधीर तजि कुतर्क संसय सकल। भजहु राम रघुबीर करुनाकर सुंदर सुखद॥९०(ख)॥
भावार्थ
हे धीरबुद्धि! ऐसा विचारकर सम्पूर्ण कुतर्कों और सन्देहोंको छोड़कर करुणाकी खान सुन्दर और सुख देनेवाले श्रीरघुवीरका भजन कीजिये॥९०(ख)॥
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