दोहा 87b
एक पिता के बिपुल कुमारा। होहिं पृथक गुन सील अचारा॥ कोउ पंडित कोउ तापस ग्याता। कोउ धनवंत सूर कोउ दाता॥१॥
भावार्थ
एक पिताके बहुत-से पुत्र पृथक्-पृथक् गुण, स्वभाव और आचरणवाले होते हैं। कोई पण्डित होता है, कोई तपस्वी, कोई ज्ञानी, कोई धनी, कोई शूरवीर, कोई दानी,॥१॥
कोउ सर्बग्य धर्मरत कोई। सब पर पितहि प्रीति सम होई॥ कोउ पितु भगत बचन मन कर्मा। सपनेहुँ जान न दूसर धर्मा॥२॥
भावार्थ
कोई सर्वज्ञ और कोई धर्मपरायण होता है। पिताका प्रेम इन सभीपर समान होता है। परन्तु इनमेंसे यदि कोई मन, वचन और कर्मसे पिताका ही भक्त होता है, स्वप्नमें भी दूसरा धर्म नहीं जानता,॥२॥
सो सुत प्रिय पितु प्रान समाना। जद्यपि सो सब भाँति अयाना॥ एहि बिधि जीव चराचर जेते। त्रिजग देव नर असुर समेते॥३॥
भावार्थ
वह पुत्र पिताको प्राणोंके समान प्रिय होता है, यद्यपि (चाहे) वह सब प्रकारसे अज्ञान (मूर्ख) ही हो। इस प्रकार तिर्यक् (पशु-पक्षी), देव, मनुष्य और असुरोंसमेत जितने भी चेतन और जड जीव हैं,॥३॥
अखिल बिस्व यह मोर उपाया। सब पर मोहि बराबरि दाया॥ तिन्ह महँ जो परिहरि मद माया। भजै मोहि मन बच अरु काया॥४॥
भावार्थ
[उनसे भरा हुआ] यह सम्पूर्ण विश्व मेरा ही पैदा किया हुआ है। अतः सबपर मेरी बराबर दया है। परन्तु इनमेंसे जो मद और माया छोड़कर मन, वचन और शरीरसे मुझको भजता है,॥४॥
पुरुष नपुंसक नारि वा जीव चराचर कोइ। सर्ब भाव भज कपट तजि मोहि परम प्रिय सोइ॥८७ (क)॥
भावार्थ
वह पुरुष हो, नपुंसक हो, स्त्री हो अथवा चर-अचर कोई भी जीव हो, कपट छोड़कर जो भी सर्वभावसे मुझे भजता है वही मुझे परम प्रिय है॥८७ (क)॥
सत्य कहउँ खग तोहि सुचि सेवक मम प्रानप्रिय। अस बिचारि भजु मोहि परिहरि आस भरोस सब॥८७ (ख)॥
भावार्थ
हे पक्षी! मैं तुझसे सत्य कहता हूँ, पवित्र (अनन्य एवं निष्काम) सेवक मुझे प्राणोंके समान प्यारा है। ऐसा विचारकर सब आशा-भरोसा छोड़कर मुझीको भज॥८७ (ख)॥
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