दोहा 72b
जो माया सब जगहि नचावा। जासु चरित लखि काहुँ न पावा॥ सोइ प्रभु भ्रू बिलास खगराजा। नाच नटी इव सहित समाजा॥१॥
भावार्थ
जो माया सारे जगत्को नचाती है और जिसका चरित्र ( करनी ) किसीने नहीं लख पाया, हे खगराज गरुड़जी! वही माया प्रभु श्रीरामचन्द्रजीकी भ्रुकुटीके इशारेपर अपने समाज ( परिवार ) सहित नटीकी तरह नाचती है॥ १ ॥
सोइ सच्चिदानंद घन रामा। अज बिग्यान रूप बल धामा॥ ब्यापक ब्याप्य अखंड अनंता। अखिल अमोघसक्ति भगवंता॥२॥
भावार्थ
श्रीरामजी वही सच्चिदानन्दघन हैं जो अजन्मा, विज्ञानस्वरूप, रूप और बलके धाम, सर्वव्यापक एवं व्याप्य ( सर्वरूप ), अखण्ड, अनन्त, सम्पूर्ण, अमोघशक्ति ( जिसकी शक्ति कभी व्यर्थ नहीं होती ) और छः ऐश्वर्योंसे युक्त भगवान् हैं॥ २ ॥
अगुन अदभ्र गिरा गोतीता। सबदरसी अनवद्य अजीता॥ निर्मम निराकार निरमोहा। नित्य निरंजन सुख संदोहा॥३॥
भावार्थ
वे निर्गुण ( मायाके गुणोंसे रहित ), महान्, वाणी और इन्द्रियोंसे परे, सब कुछ देखनेवाले, निर्दोष, अजेय, ममतारहित, निराकार ( मायिक आकारसे रहित ), मोहरहित, नित्य, मायारहित, सुखकी राशि, ॥ ३ ॥
प्रकृति पार प्रभु सब उर बासी। ब्रह्म निरीह बिरज अबिनासी॥ इहाँ मोह कर कारन नाहीं। रबि सन्मुख तम कबहुँ कि जाहीं॥४॥
भावार्थ
प्रकृतिसे परे, प्रभु ( सर्वसमर्थ ), सदा सबके हृदयमें बसनेवाले, इच्छारहित, विकाररहित, अविनाशी ब्रह्म हैं। यहाँ ( श्रीराममें ) मोहका कारण ही नहीं है। क्या अन्धकारका समूह कभी सूर्यके सामने जा सकता है?॥ ४ ॥
भगत हेतु भगवान प्रभु राम धरेउ तनु भूप। किए चरित पावन परम प्राकृत नर अनुरूप॥७२ (क)॥
भावार्थ
भगवान् प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने भक्तोंके लिये राजाका शरीर धारण किया और साधारण मनुष्योंके-से अनेकों परम पावन चरित्र किये॥ ७२ ( क )॥
जथा अनेक बेष धरि नृत्य करइ नट कोइ। सोइ सोइ भाव देखावइ आपुन होइ न सोइ॥७२ (ख)॥
भावार्थ
जैसे कोई नट ( खेल करनेवाला ) अनेक वेष धारण करके नृत्य करता है, और वही-वही ( जैसा वेष होता है, उसीके अनुकूल ) भाव दिखलाता है, पर स्वयं वह उनमेंसे कोई हो नहीं जाता, ॥ ७२ ( ख )॥
गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें