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दोहा 2b

श्रीरामजीका स्वागत, भरत-मिलाप, सबका मिलनानन्द

चौ०

देखत हनूमान अति हरषेउ। पुलक गात लोचन जल बरषेउ॥ मन महँ बहुत भाँति सुख मानी। बोलेउ श्रवन सुधा सम बानी॥ १ ॥

भावार्थ

उन्हें देखते ही हनुमान्‌जी अत्यन्त हर्षित हुए। उनका शरीर पुलकित हो गया, नेत्रोंसे [ प्रेमाश्रुओंका ] जल बरसने लगा। मनमें बहुत प्रकारसे सुख मानकर वे कानोंके लिये अमृतके समान वाणी बोले— ॥१॥

चौ०

जासु बिरहँ सोचहु दिन राती। रटहु निरंतर गुन गन पाँती॥ रघुकुल तिलक सुजन सुखदाता। आयउ कुसल देव मुनि त्राता॥ २ ॥

भावार्थ

जिनके विरहमें आप दिन-रात सोच करते ( घुलते ) रहते हैं और जिनके गुण-समूहोंकी पंक्तियोंको आप निरन्तर रटते रहते हैं, वे ही रघुकुलके तिलक, सज्जनोंको सुख देनेवाले और देवताओं तथा मुनियोंके रक्षक श्रीरामजी सकुशल आ गये॥२॥

चौ०

रिपु रन जीति सुजस सुर गावत। सीता सहित अनुज प्रभु आवत॥ सुनत बचन बिसरे सब दूखा। तृषावंत जिमि पाइ पियूषा॥ ३ ॥

भावार्थ

शत्रुको रणमें जीतकर सीताजी और लक्ष्मणजीसहित प्रभु आ रहे हैं; देवता उनका सुन्दर यश गा रहे हैं। ये वचन सुनते ही [ भरतजीको ] सारे दुःख भूल गये। जैसे प्यासा आदमी अमृत पाकर प्यासके दुःखको भूल जाय॥३॥

चौ०

को तुम्ह तात कहाँ ते आए। मोहि परम प्रिय बचन सुनाए॥ मारुत सुत मैं कपि हनुमाना। नामु मोर सुनु कृपानिधाना॥ ४ ॥

भावार्थ

[ भरतजीने पूछा— ] हे तात! तुम कौन हो ? और कहाँसे आये हो ? [ जो ] तुमने मुझको [ ये ] परम प्रिय ( अत्यन्त आनन्द देनेवाले ) वचन सुनाये। [ हनुमान्‌जीने कहा— ] हे कृपानिधान! सुनिये, मैं पवनका पुत्र और जातिका वानर हूँ; मेरा नाम हनुमान् है॥४॥

चौ०

दीनबंधु रघुपति कर किंकर। सुनत भरत भेंटेउ उठि सादर॥ मिलत प्रेम नहिं हृदयँ समाता। नयन स्रवत जल पुलकित गाता॥ ५ ॥

भावार्थ

मैं दीनोंके बन्धु श्रीरघुनाथजीका दास हूँ। यह सुनते ही भरतजी उठकर आदरपूर्वक हनुमान्‌जीसे गले लगकर मिले। मिलते समय प्रेम हृदयमें नहीं समाता। नेत्रोंसे [ आनन्द और प्रेमके आँसुओंका ] जल बहने लगा और शरीर पुलकित हो गया॥५॥

चौ०

कपि तव दरस सकल दुख बीते। मिले आजु मोहि राम पिरीते॥ बार बार बूझी कुसलाता। तो कहुँ देउँ काह सुनु भ्राता॥ ६ ॥

भावार्थ

[ भरतजीने कहा— ] हे हनुमान्! तुम्हारे दर्शनसे मेरे समस्त दुःख समाप्त हो गये ( दुःखोंका अन्त हो गया )। [ तुम्हारे रूपमें ] आज मुझे प्यारे रामजी ही मिल गये। भरतजीने बार-बार कुशल पूछी [ और कहा— ] हे भाई! सुनो, [ इस शुभ संवादके बदलेमें ] तुम्हें क्या दूँ ?॥६॥

चौ०

एहि संदेस सरिस जग माहीं। करि बिचार देखेउँ कछु नाहीं॥ नाहिन तात उरिन मैं तोही। अब प्रभु चरित सुनावहु मोही॥ ७ ॥

भावार्थ

इस सन्देशके समान ( इसके बदलेमें देने लायक पदार्थ ) जगत्‌में कुछ भी नहीं है, मैंने यह विचार कर देख लिया है। [ इसलिये ] हे तात! मैं तुमसे किसी प्रकार भी उऋण नहीं हो सकता। अब मुझे प्रभुका चरित्र ( हाल ) सुनाओ॥७॥

चौ०

तब हनुमंत नाइ पद माथा। कहे सकल रघुपति गुन गाथा॥ कहु कपि कबहुँ कृपाल गोसाईं। सुमिरहिं मोहि दास की नाईं॥८॥

भावार्थ

तब हनुमान्‌जीने भरतजीके चरणोंमें मस्तक नवाकर श्रीरघुनाथजीकी सारी गुणगाथा कही। [ भरतजीने पूछा— ] हे हनुमान्! कहो, कृपालु स्वामी श्रीरामचन्द्रजी कभी मुझे अपने दासकी तरह याद भी करते हैं ?॥८॥

छं०

निज दास ज्यों रघुबंसभूषन कबहुँ मम सुमिरन कर्यो। सुनि भरत बचन बिनीत अति कपि पुलकि तन चरनन्हि पर्यो॥ रघुबीर निज मुख जासु गुन गन कहत अग जग नाथ जो। काहे न होइ बिनीत परम पुनीत सदगुन सिंधु सो॥

भावार्थ

रघुवंशके भूषण श्रीरामजी क्या कभी अपने दासकी भाँति मेरा स्मरण करते रहे हैं ? भरतजीके अत्यन्त नम्र वचन सुनकर हनुमान्‌जी पुलकित शरीर होकर उनके चरणोंपर गिर पड़े [ और मनमें विचारने लगे कि ] जो चराचरके स्वामी हैं वे श्रीरघुवीर अपने श्रीमुखसे जिनके गुणसमूहोंका वर्णन करते हैं, वे भरतजी ऐसे विनम्र, परम पवित्र और सद्‌गुणोंके समुद्र क्यों न हों ?

दो०

राम प्रान प्रिय नाथ तुम्ह सत्य बचन मम तात। पुनि पुनि मिलत भरत सुनि हरष न हृदयँ समात॥२ (क)॥

भावार्थ

[ हनुमान्‌जीने कहा— ] हे नाथ! आप श्रीरामजीको प्राणोंके समान प्रिय हैं, हे तात! मेरा वचन सत्य है। यह सुनकर भरतजी बार-बार मिलते हैं, हृदयमें हर्ष समाता नहीं है॥२ (क)॥

सो०

भरत चरन सिरु नाइ तुरित गयउ कपि राम पहिं। कही कुसल सब जाइ हरषि चलेउ प्रभु जान चढ़ि॥२ (ख)॥

भावार्थ

फिर भरतजीके चरणोंमें सिर नवाकर हनुमान्‌जी तुरंत ही श्रीरामजीके पास [ लौट ] गये और जाकर उन्होंने सब कुशल कही। तब प्रभु हर्षित होकर विमानपर चढ़कर चले॥२ (ख)॥

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