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दोहा 23

चौ०

फूलहिं फरहिं सदा तरु कानन। रहहिं एक सँग गज पंचानन॥ खग मृग सहज बयरु बिसराई। सबन्हि परस्पर प्रीति बढ़ाई॥१॥

भावार्थ

वनोंमें वृक्ष सदा फूलते और फलते हैं। हाथी और सिंह [वैर भूलकर] एक साथ रहते हैं। पक्षी और पशु सभीने स्वाभाविक वैर भुलाकर आपसमें प्रेम बढ़ा लिया है॥१॥

चौ०

कूजहिं खग मृग नाना बृंदा। अभय चरहिं बन करहिं अनंदा॥ सीतल सुरभि पवन बह मंदा। गुंजत अलि लै चलि मकरंदा॥२॥

भावार्थ

पक्षी कूजते (मीठी बोली बोलते) हैं, भाँति-भाँतिके पशुओंके समूह वनमें निर्भय विचरते और आनन्द करते हैं। शीतल, मन्द, सुगन्धित पवन चलता रहता है। भौंरे पुष्पोंका रस लेकर चलते हुए गुंजार करते जाते हैं॥२॥

चौ०

लता बिटप मागें मधु चवहीं। मनभावतो धेनु पय स्रवहीं॥ ससि संपन्न सदा रह धरनी। त्रेताँ भइ कृतजुग कै करनी॥३॥

भावार्थ

बेलें और वृक्ष माँगनेसे ही मधु (मकरन्द) टपका देते हैं। गौएँ मनचाहा दूध देती हैं। धरती सदा खेतीसे भरी रहती है। त्रेतामें सत्ययुगकी करनी (स्थिति) हो गयी॥३॥

चौ०

प्रगटीं गिरिन्ह बिबिधि मनि खानी। जगदातमा भूप जग जानी॥ सरिता सकल बहहिं बर बारी। सीतल अमल स्वाद सुखकारी॥४॥

भावार्थ

समस्त जगत्‌के आत्मा भगवान्‌को जगत्‌का राजा जानकर पर्वतोंने अनेक प्रकारकी मणियोंकी खानें प्रकट कर दीं। सब नदियाँ श्रेष्ठ, शीतल, निर्मल और सुखप्रद स्वादिष्ट जल बहने लगीं॥४॥

चौ०

सागर निज मरजादाँ रहहीं। डारहिं रत्न तटन्हि नर लहहीं॥ सरसिज संकुल सकल तड़ागा। अति प्रसन्न दस दिसा बिभागा॥५॥

भावार्थ

समुद्र अपनी मर्यादामें रहते हैं। वे लहरोंके द्वारा किनारोंपर रत्न डाल देते हैं, जिन्हें मनुष्य पा जाते हैं। सब तालाब कमलोंसे परिपूर्ण हैं। दसों दिशाओंके विभाग (अर्थात्‌ सभी प्रदेश) अत्यन्त प्रसन्न हैं॥५॥

दो०

बिधु महि पूर मयूखन्हि रबि तप जेतनेहि काज। मागें बारिद देहिं जल रामचंद्र कें राज॥२३॥

भावार्थ

श्रीरामचन्द्रजीके राज्यमें चन्द्रमा अपनी [अमृतमयी] किरणोंसे पृथ्वीको पूर्ण कर देते हैं। सूर्य उतना ही तपते हैं जितनेकी आवश्यकता होती है और मेघ माँगनेसे [जब जहाँ जितना चाहिये उतना ही] जल देते हैं॥२३॥

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