दोहा 15
वानरोंकी और निषादकी विदाई
सुनु खगपति यह कथा पावनी। त्रिबिध ताप भव भय दावनी॥ महाराज कर सुभ अभिषेका। सुनत लहहिं नर बिरति बिबेका॥१॥
भावार्थ
हे गरुड़जी! सुनिये, यह कथा [ सबको ] पवित्र करनेवाली है, [ दैहिक, दैविक, भौतिक ] तीनों प्रकारके तापोंका और जन्म-मृत्युके भयका नाश करनेवाली है। महाराज श्रीरामचन्द्रजीके कल्याणमय राज्याभिषेकका चरित्र [ निष्कामभावसे ] सुनकर मनुष्य वैराग्य और ज्ञान प्राप्त करते हैं॥ १ ॥
जे सकाम नर सुनहिं जे गावहिं। सुख संपति नाना बिधि पावहिं॥ सुर दुर्लभ सुख करि जग माहीं। अंतकाल रघुपति पुर जाहीं॥२॥
भावार्थ
और जो मनुष्य सकामभावसे सुनते और जो गाते हैं, वे अनेकों प्रकारके सुख और सम्पत्ति पाते हैं। वे जगत्में देवदुर्लभ सुखोंको भोगकर अन्तकालमें श्रीरघुनाथजीके परमधामको जाते हैं॥ २ ॥
सुनहिं बिमुक्त बिरत अरु बिषई। लहहिं भगति गति संपति नई॥ खगपति राम कथा मैं बरनी। स्वमति बिलास त्रास दुख हरनी॥३॥
भावार्थ
इसे जो जीवन्मुक्त, विरक्त और विषयी सुनते हैं, वे [ क्रमशः ] भक्ति, मुक्ति और नवीन सम्पत्ति ( नित्य नये भोग ) पाते हैं। हे पक्षिराज गरुड़जी! मैंने अपनी बुद्धिकी पहुँचके अनुसार रामकथा वर्णन की है, जो [ जन्म-मरणके ] भय और दुःखको हरनेवाली है॥ ३ ॥
बिरति बिबेक भगति दृढ़ करनी। मोह नदी कहँ सुंदर तरनी॥ नित नव मंगल कौसलपुरी। हरषित रहहिं लोग सब कुरी॥४॥
भावार्थ
यह वैराग्य, विवेक और भक्तिको दृढ़ करनेवाली है तथा मोहरूपी नदीके [ पार करनेके ] लिये सुन्दर नाव है। अवधपुरीमें नित-नये मङ्गलोत्सव होते हैं। सभी वर्गोंके लोग हर्षित रहते हैं॥ ४ ॥
नित नइ प्रीति राम पद पंकज। सब कें जिन्हहि नमत सिव मुनि अज॥ मंगन बहु प्रकार पहिराए। द्विजन्ह दान नाना बिधि पाए॥५॥
भावार्थ
श्रीरामजीके चरणकमलोंमें—जिन्हें श्रीशिवजी, मुनिगण और ब्रह्माजी भी नमस्कार करते हैं—सबकी नित्य नवीन प्रीति है। भिक्षुकोंको बहुत प्रकारके वस्त्राभूषण पहनाये गये और ब्राह्मणोंने नाना प्रकारके दान पाये॥ ५ ॥
ब्रह्मानंद मगन कपि सब कें प्रभु पद प्रीति। जात न जाने दिवस तिन्ह गए मास षट बीति॥१५॥
भावार्थ
वानर सब ब्रह्मानन्दमें मग्न हैं। प्रभुके चरणोंमें सबका प्रेम है! उन्होंने दिन जाते जाने ही नहीं और [ बात-की-बातमें ] छः महीने बीत गये॥ १५ ॥
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