Ramayana.com

दोहा 124b

चौ०

सुमिरि राम के गुन गन नाना। पुनि पुनि हरष भुसुंडि सुजाना॥ महिमा निगम नेति करि गाई। अतुलित बल प्रताप प्रभुताई॥१॥

भावार्थ

श्रीरामचन्द्रजीके बहुत-से गुणसमूहोंका स्मरण कर-करके सुजान भुशुण्डिजी बार-बार हर्षित हो रहे हैं। जिनकी महिमा वेदोंने ‘नेति-नेति’ कहकर गायी है; जिनका बल, प्रताप और प्रभुत्व ( सामर्थ्य ) अतुलनीय है;॥ १॥

चौ०

सिव अज पूज्य चरन रघुराई। मो पर कृपा परम मृदुलाई॥ अस सुभाउ कहुँ सुनउँ न देखउँ। केहि खगेस रघुपति सम लेखउँ॥२॥

भावार्थ

जिन श्रीरघुनाथजीके चरण शिवजी और ब्रह्माजीके द्वारा पूज्य हैं, उनकी मुझपर कृपा होनी उनकी परम कोमलता है। किसीका ऐसा स्वभाव कहीं न सुनता हूँ, न देखता हूँ। अतः हे पक्षिराज गरुड़जी! मैं श्रीरघुनाथजीके समान किसे गिनूँ ( समझूँ )?॥२॥

चौ०

साधक सिद्ध बिमुक्त उदासी। कबि कोबिद कृतग्य संन्यासी॥ जोगी सूर सुतापस ग्यानी। धर्म निरत पंडित बिग्यानी॥३॥

भावार्थ

साधक, सिद्ध, जीवन्मुक्त, उदासीन ( विरक्त ), कवि, विद्वान्, कर्म [ रहस्य ] के ज्ञाता, संन्यासी, योगी, शूरवीर, बड़े तपस्वी, ज्ञानी, धर्मपरायण, पण्डित और विज्ञानी॥३॥

चौ०

तरहिं न बिनु सेए मम स्वामी। राम नमामि नमामि नमामी॥ सरन गएँ मो से अघ रासी। होहिं सुद्ध नमामि अबिनासी॥४॥

भावार्थ

ये कोई भी मेरे स्वामी श्रीरामजीका सेवन ( भजन ) किये बिना नहीं तर सकते। मैं उन्हीं श्रीरामजीको बार-बार नमस्कार करता हूँ। जिनकी शरण जानेपर मुझ-जैसे पापराशि भी शुद्ध ( पापरहित ) हो जाते हैं, उन अविनाशी श्रीरामजीको मैं नमस्कार करता हूँ॥४॥

दो०

जासु नाम भव भेषज हरन घोर त्रय सूल। सो कृपाल मोहि तो पर सदा रहउ अनुकूल॥१२४ (क)॥

भावार्थ

जिनका नाम जन्म-मरणरूपी रोगकी [ अव्यर्थ ] औषध और तीनों भयंकर पीड़ाओं ( आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक दुःखों ) को हरनेवाला है, वे कृपालु श्रीरामजी मुझपर और आपपर सदा प्रसन्न रहें॥१२४ ( क )॥

दो०

सुनि भुसुंडि के बचन सुभ देखि राम पद नेह। बोलेउ प्रेम सहित गिरा गरुड़ बिगत संदेह॥१२४ (ख)॥

भावार्थ

भुशुण्डिजीके मंगलमय वचन सुनकर और श्रीरामजीके चरणोंमें उनका अतिशय प्रेम देखकर सन्देहसे भलीभाँति छूटे हुए गरुड़जी प्रेमसहित वचन बोले॥१२४ ( ख )॥

Ramayan appFree. No ads. Works offline.Install

गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें