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दोहा 111b

चौ०

तब मुनीस रघुपति गुन गाथा । कहे कछुक सादर खगनाथा॥ ब्रह्मग्यान रत मुनि बिग्यानी । मोहि परम अधिकारी जानी॥१॥

भावार्थ

तब हे पक्षिराज! मुनीश्वरने श्रीरघुनाथजीके गुणोंकी कुछ कथाएँ आदरसहित कहीं। फिर वे ब्रह्मज्ञानपरायण विज्ञानवान् मुनि मुझे परम अधिकारी जानकर— ॥ १ ॥

चौ०

लागे करन ब्रह्म उपदेसा । अज अद्वैत अगुन हृदयेसा॥ अकल अनीह अनाम अरूपा । अनुभव गम्य अखंड अनूपा॥२॥

भावार्थ

ब्रह्मका उपदेश करने लगे कि वह अजन्मा है, अद्वैत है, निर्गुण है और हृदयका स्वामी ( अन्तर्यामी ) है। उसे कोई बुद्धिके द्वारा माप नहीं सकता, वह इच्छारहित, नामरहित, रूपरहित, अनुभवसे जाननेयोग्य, अखण्ड और उपमारहित है, ॥ २ ॥

चौ०

मन गोतीत अमल अबिनासी । निर्बिकार निरवधि सुख रासी॥ सो तैं ताहि तोहि नहिं भेदा । बारि बीचि इव गावहिं बेदा॥३॥

भावार्थ

वह मन और इन्द्रियोंसे परे, निर्मल, विनाशरहित, निर्विकार, सीमारहित और सुखकी राशि है। वेद ऐसा गाते हैं कि वही तू है ( तत्त्वमसि ), जल और जलकी लहरकी भाँति उसमें और तुझमें कोई भेद नहीं है॥ ३ ॥

चौ०

बिबिधि भाँति मोहि मुनि समुझावा । निर्गुन मत मम हृदयँ न आवा॥ पुनि मैं कहेउँ नाइ पद सीसा । सगुन उपासन कहहु मुनीसा॥४॥

भावार्थ

मुनिने मुझे अनेकों प्रकारसे समझाया, पर निर्गुण मत मेरे हृदयमें नहीं बैठा। मैंने फिर मुनिके चरणोंमें सिर नवाकर कहा—हे मुनीश्वर! मुझे सगुण ब्रह्मकी उपासना कहिये॥ ४॥

चौ०

राम भगति जल मम मन मीना । किमि बिलगाइ मुनीस प्रबीना॥ सोइ उपदेस कहहु करि दाया। निज नयनन्हि देखौं रघुराया॥ ५ ॥

भावार्थ

मेरा मन रामभक्तिरूपी जलमें मछली हो रहा है ( उसीमें रम रहा है )। हे चतुर मुनीश्वर! ऐसी दशामें वह उससे अलग कैसे हो सकता है ? आप दया करके मुझे वही उपदेश ( उपाय ) कहिये जिससे मैं श्रीरघुनाथजीको अपनी आँखोंसे देख सकूँ॥ ५ ॥

चौ०

भरि लोचन बिलोकि अवधेसा । तब सुनिहउँ निर्गुन उपदेसा॥ मुनि पुनि कहि हरिकथा अनूपा । खंडि सगुन मत अगुन निरूपा॥६॥

भावार्थ

[ पहले ] नेत्र भरकर श्रीअयोध्यानाथको देखकर, तब निर्गुणका उपदेश सुनूँगा। मुनिने फिर अनुपम हरिकथा कहकर, सगुण मतका खण्डन करके निर्गुणका निरूपण किया॥ ६ ॥

चौ०

तब मैं निर्गुन मत कर दूरी । सगुन निरूपउँ करि हठ भूरी॥ उत्तर प्रतिउत्तर मैं कीन्हा । मुनि तन भए क्रोध के चीन्हा॥७॥

भावार्थ

तब मैं निर्गुण मतको हटाकर ( काटकर ) बहुत हठ करके सगुणका निरूपण करने लगा। मैंने उत्तर-प्रत्युत्तर किया, इससे मुनिके शरीरमें क्रोधके चिह्न उत्पन्न हो गये॥ ७॥

चौ०

सुनु प्रभु बहुत अवग्या किएँ । उपज क्रोध ग्यानिन्ह के हिएँ॥ अति संघरषन जौं कर कोई । अनल प्रगट चंदन ते होई॥८॥

भावार्थ

हे प्रभो! सुनिये, बहुत अपमान करनेपर ज्ञानीके भी हृदयमें क्रोध उत्पन्न हो जाता है। यदि कोई चन्दनकी लकड़ीको बहुत अधिक रगड़े, तो उससे भी अग्नि प्रकट हो जायगी॥ ८॥

दो०

बारंबार सकोप मुनि करइ निरूपन ग्यान। मैं अपनें मन बैठ तब करउँ बिबिधि अनुमान॥१११(क)॥

भावार्थ

मुनि बार-बार क्रोधसहित ज्ञानका निरूपण करने लगे। तब मैं बैठा-बैठा अपने मनमें अनेकों प्रकारके अनुमान करने लगा॥ १११ ( क )॥

दो०

क्रोध कि द्वैतबुद्धि बिनु द्वैत कि बिनु अग्यान। मायाबस परिछिन्न जड़ जीव कि ईस समान॥१११(ख)॥

भावार्थ

बिना द्वैतबुद्धिके क्रोध कैसा और बिना अज्ञानके क्या द्वैतबुद्धि हो सकती है ? मायाके वश रहनेवाला परिच्छिन्न जड़ जीव क्या ईश्वरके समान हो सकता है?॥१११(ख)॥

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