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दोहा 99

चौ०

तब मयना हिमवंतु अनंदे। पुनि पुनि पारबती पद बंदे॥ नारि पुरुष सिसु जुबा सयाने। नगर लोग सब अति हरषाने॥१॥

भावार्थ

तब मैना और हिमवान्‌ आनन्दमें मग्न हो गये और उन्होंने बार-बार पार्वतीके चरणोंकी वन्दना की। स्त्री, पुरुष, बालक, युवा और वृद्ध नगरके सभी लोग बहुत प्रसन्न हुए॥१॥

चौ०

लगे होन पुर मंगल गाना। सजे सबहिं हाटक घट नाना॥ भाँति अनेक भई जेवनारा। सूपसास्त्र जस कछु ब्यवहारा॥२॥

भावार्थ

नगरमें मङ्गलगीत गाये जाने लगे और सबने भाँति-भाँतिके सुवर्णके कलश सजाये। पाकशास्त्रमें जैसी रीति है, उसके अनुसार अनेक भाँतिकी ज्योनार हुई ( रसोई बनी )॥२॥

चौ०

सो जेवनार कि जाइ बखानी। बसहिं भवन जेहिं मातु भवानी॥ सादर बोले सकल बराती। बिष्नु बिरंचि देव सब जाती॥३॥

भावार्थ

जिस घरमें स्वयं माता भवानी रहती हों, वहाँकी ज्योनार ( भोजनसामग्री ) का वर्णन कैसे किया जा सकता है? हिमाचलने आदरपूर्वक सब बरातियोंको—विष्णु, ब्रह्मा और सब जातिके देवताओंको बुलवाया॥ ३ ॥

चौ०

बिबिधि पाँति बैठी जेवनारा। लागे परुसन निपुन सुआरा॥ नारिबृंद सुर जेवँत जानी। लगीं देन गारीं मृदु बानी॥४॥

भावार्थ

भोजन [ करनेवालों ] की बहुत-सी पङ्गतें बैठीं। चतुर रसोइये परोसने लगे। स्त्रियोंकी मण्डलियाँ देवताओंको भोजन करते जानकर कोमल वाणीसे गालियाँ देने लगीं॥ ४॥

छं०

गारीं मधुर स्वर देहिं सुंदरि बिंग्य बचन सुनावहीं। भोजनु करहिं सुर अति बिलंबु बिनोदु सुनि सचु पावहीं॥ जेवँत जो बढ़्यो अनंदु सो मुख कोटिहूँ न परै कह्यो। अचवाँइ दीन्हे पान गवने बास जहँ जाको रह्यो॥

भावार्थ

सब सुन्दरी स्त्रियाँ मीठे स्वरमें गालियाँ देने लगीं और व्यंग्यभरे वचन सुनाने लगीं। देवगण विनोद सुनकर बहुत सुख अनुभव करते हैं, इसलिये भोजन करनेमें बड़ी देर लगा रहे हैं। भोजनके समय जो आनन्द बढ़ा, वह करोड़ों मुँहसे भी नहीं कहा जा सकता। [ भोजन कर चुकनेपर ] सबके हाथ-मुँह धुलवाकर पान दिये गये। फिर सब लोग, जो जहाँ ठहरे थे, वहाँ चले गये।

दो०

बहुरि मुनिन्ह हिमवंत कहुँ लगन सुनाई आइ। समय बिलोकि बिबाह कर पठए देव बोलाइ॥९९॥

भावार्थ

फिर मुनियोंने लौटकर हिमवान्‌को लगन ( लग्नपत्रिका ) सुनायी और विवाहका समय देखकर देवताओंको बुला भेजा॥ ९९ ॥

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