दोहा 91
सबु प्रसंगु गिरिपतिहि सुनावा। मदन दहन सुनि अति दुखु पावा॥ बहुरि कहेउ रति कर बरदाना। सुनि हिमवंत बहुत सुखु माना॥१॥
भावार्थ
उन्होंने पर्वतराज हिमाचलको सब हाल सुनाया। कामदेवका भस्म होना सुनकर हिमाचल बहुत दुखी हुए। फिर मुनियोंने रतिके वरदानकी बात कही, उसे सुनकर हिमवान्ने बहुत सुख माना॥१॥
हृदयँ बिचारि संभु प्रभुताई। सादर मुनिबर लिए बोलाई॥ सुदिनु सुनखतु सुघरी सोचाई। बेगि बेदबिधि लगन धराई॥२॥
भावार्थ
शिवजीके प्रभावको मनमें विचारकर हिमाचलने श्रेष्ठ मुनियोंको आदरपूर्वक बुला लिया और उनसे शुभ दिन, शुभ नक्षत्र और शुभ घड़ी शोधवाकर वेदकी विधिके अनुसार शीघ्र ही लग्न निश्चय कराकर लिखवा लिया॥२॥
पत्री सप्तरिषिन्ह सोइ दीन्ही। गहि पद बिनय हिमाचल कीन्ही॥ जाइ बिधिहि तिन्ह दीन्हि सो पाती। बाचत प्रीति न हृदयँ समाती॥३॥
भावार्थ
फिर हिमाचलने वह लग्नपत्रिका सप्तर्षियोंको दे दी और चरण पकड़कर उनकी विनती की। उन्होंने जाकर वह लग्नपत्रिका ब्रह्माजीको दी। उसको पढ़ते समय उनके हृदयमें प्रेम समाता न था॥३॥
लगन बाचि अज सबहि सुनाई। हरषे मुनि सब सुर समुदाई॥ सुमन बृष्टि नभ बाजन बाजे। मंगल कलस दसहुँ दिसि साजे॥४॥
भावार्थ
ब्रह्माजीने लग्न पढ़कर सबको सुनाया, उसे सुनकर सब मुनि और देवताओंका सारा समाज हर्षित हो गया। आकाशसे फूलोंकी वर्षा होने लगी, बाजे बजने लगे और दसों दिशाओंमें मङ्गल-कलश सजा दिये गये॥४॥
लगे सँवारन सकल सुर बाहन बिबिध बिमान। होहिं सगुन मंगल सुभद करहिं अपछरा गान॥९१॥
भावार्थ
सब देवता अपने भाँति-भाँतिके वाहन और विमान सजाने लगे, कल्याणप्रद मङ्गल शकुन होने लगे और अप्सराएँ गाने लगीं॥९१॥
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