दोहा 9
खल परिहास होइ हित मोरा । काक कहहिं कलकंठ कठोरा ॥ हंसहि बक दादुर चातकही । हँसहिं मलिन खल बिमल बतकही ॥ १ ॥
भावार्थ
किन्तु दुष्टोंके हँसनेसे मेरा हित ही होगा। मधुर कण्ठवाली कोयलको कौए तो कठोर ही कहा करते हैं। जैसे बगुले हंसको और मेढक पपीहेको हँसते हैं, वैसे ही मलिन मनवाले दुष्ट निर्मल वाणीको हँसते हैं॥ १ ॥
कबित रसिक न राम पद नेहू । तिन्ह कहँ सुखद हास रस एहू ॥ भाषा भनिति भोरि मति मोरी । हँसिबे जोग हँसें नहिं खोरी ॥ २ ॥
भावार्थ
जो न तो कविताके रसिक हैं और न जिनका श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें प्रेम है, उनके लिये भी यह कविता सुखद हास्यरसका काम देगी। प्रथम तो यह भाषाकी रचना है, दूसरे मेरी बुद्धि भोली है; इससे यह हँसनेके योग्य ही है, हँसनेमें उन्हें कोई दोष नहीं॥ २ ॥
प्रभु पद प्रीति न सामुझि नीकी । तिन्हहि कथा सुनि लागिहि फीकी ॥ हरि हर पद रति मति न कुतरकी । तिन्ह कहुँ मधुर कथा रघुबर की ॥ ३ ॥
भावार्थ
जिन्हें न तो प्रभुके चरणोंमें प्रेम है और न अच्छी समझ ही है, उनको यह कथा सुननेमें फीकी लगेगी। जिनकी श्रीहरि ( भगवान् विष्णु ) और श्रीहर ( भगवान् शिव ) के चरणोंमें प्रीति है और जिनकी बुद्धि कुतर्क करनेवाली नहीं है [ जो श्रीहरि-हरमें भेदकी या ऊँच-नीचकी कल्पना नहीं करते ], उन्हें श्रीरघुनाथजीकी यह कथा मीठी लगेगी॥ ३ ॥
राम भगति भूषित जियँ जानी । सुनिहहिं सुजन सराहि सुबानी ॥ कबि न होउँ नहिं बचन प्रबीनू । सकल कला सब बिद्या हीनू ॥ ४ ॥
भावार्थ
सज्जनगण इस कथाको अपने जीमें श्रीरामजीकी भक्तिसे भूषित जानकर सुन्दर वाणीसे सराहना करते हुए सुनेंगे। मैं न तो कवि हूँ, न वाक्यरचनामें ही कुशल हूँ, मैं तो सब कलाओं तथा सब विद्याओंसे रहित हूँ॥ ४॥
आखर अरथ अलंकृति नाना । छंद प्रबंध अनेक बिधाना ॥ भाव भेद रस भेद अपारा । कबित दोष गुन बिबिध प्रकारा ॥ ५ ॥
भावार्थ
नाना प्रकारके अक्षर, अर्थ और अलङ्कार, अनेक प्रकारकी छन्दरचना, भावों और रसोंके अपार भेद और कविताके भाँति-भाँतिके गुण-दोष होते हैं॥ ५॥
कबित बिबेक एक नहिं मोरें । सत्य कहउँ लिखि कागद कोरें ॥ ६ ॥
भावार्थ
इनमेंसे काव्यसम्बन्धी एक भी बातका ज्ञान मुझमें नहीं है, यह मैं कोरे कागजपर लिखकर [ शपथपूर्वक ] सत्य-सत्य कहता हूँ॥ ६ ॥
भनिति मोरि सब गुन रहित बिस्व बिदित गुन एक । सो बिचारि सुनिहहिं सुमति जिन्ह कें बिमल बिबेक ॥ ९ ॥
भावार्थ
मेरी रचना सब गुणोंसे रहित है; इसमें बस, जगत्प्रसिद्ध एक गुण है। उसे विचारकर अच्छी बुद्धिवाले पुरुष, जिनके निर्मल ज्ञान है, इसको सुनेंगे॥ ९ ॥
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