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दोहा 86

चौ०

उभय घरी अस कौतुक भयऊ। जौ लगि कामु संभु पहिं गयऊ॥ सिवहि बिलोकि ससंकेउ मारू। भयउ जथाथिति सबु संसारू॥१॥

भावार्थ

दो घड़ीतक ऐसा तमाशा हुआ, जबतक कामदेव शिवजीके पास पहुँच गया। शिवजीको देखकर कामदेव डर गया, तब सारा संसार फिर जैसा-का-तैसा स्थिर हो गया॥१॥

चौ०

भए तुरत सब जीव सुखारे। जिमि मद उतरि गएँ मतवारे॥ रुद्रहि देखि मदन भय माना। दुराधरष दुर्गम भगवाना॥२॥

भावार्थ

तुरंत ही सब जीव वैसे ही सुखी हो गये जैसे मतवाले (नशा पिये हुए) लोग मद (नशा) उतर जानेपर सुखी होते हैं। दुराधर्ष (जिनको पराजित करना अत्यन्त ही कठिन है) और दुर्गम (जिनका पार पाना कठिन है) भगवान्‌ (सम्पूर्ण ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्यरूप छः ईश्वरीय गुणोंसे युक्त) रुद्र (महाभयङ्कर) शिवजीको देखकर कामदेव भयभीत हो गया॥२॥

चौ०

फिरत लाज कछु करि नहिं जाई। मरनु ठानि मन रचेसि उपाई॥ प्रगटेसि तुरत रुचिर रितुराजा। कुसुमित नव तरु राजि बिराजा॥३॥

भावार्थ

लौट जानेमें लज्जा मालूम होती है और करते कुछ बनता नहीं। आखिर मनमें मरनेका निश्चय करके उसने उपाय रचा। तुरंत ही सुन्दर ऋतुराज वसन्तको प्रकट किया। फूले हुए नये-नये वृक्षोंकी कतारें सुशोभित हो गयीं॥३॥

चौ०

बन उपबन बापिका तड़ागा। परम सुभग सब दिसा बिभागा॥ जहँ तहँ जनु उमगत अनुरागा। देखि मुएहुँ मन मनसिज जागा॥४॥

भावार्थ

वन-उपवन, बावली-तालाब और सब दिशाओंके विभाग परम सुन्दर हो गये। जहाँ-तहाँ मानो प्रेम उमड़ रहा है, जिसे देखकर मरे मनोंमें भी कामदेव जाग उठा॥४॥

छं०

जागइ मनोभव मुएहुँ मन बन सुभगता न परै कही। सीतल सुगंध सुमंद मारुत मदन अनल सखा सही॥ बिकसे सरन्हि बहु कंज गुंजत पुंज मंजुल मधुकरा। कलहंस पिक सुक सरस रव करि गान नाचहिं अपछरा॥

भावार्थ

मरे हुए मनमें भी कामदेव जागने लगा, वनकी सुन्दरता कही नहीं जा सकती। कामरूपी अग्निका सच्चा मित्र शीतल-मन्द-सुगन्धित पवन चलने लगा। सरोवरोंमें अनेकों कमल खिल गये, जिनपर सुन्दर भौंरोंके समूह गुंजार करने लगे। राजहंस, कोयल और तोते रसीली बोली बोलने लगे और अप्सराएँ गा-गाकर नाचने लगीं।

दो०

सकल कला करि कोटि बिधि हारेउ सेन समेत। चली न अचल समाधि सिव कोपेउ हृदयनिकेत॥८६॥

भावार्थ

कामदेव अपनी सेनासमेत करोड़ों प्रकारकी सब कलाएँ (उपाय) करके हार गया, पर शिवजीकी अचल समाधि न डिगी। तब कामदेव क्रोधित हो उठा॥८६॥

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