दोहा 7d
रामरूपसे जीवमात्रकी वन्दना
अस बिबेक जब देइ बिधाता। तब तजि दोष गुनहिं मनु राता॥ काल सुभाउ करम बरिआईं। भलेउ प्रकृति बस चुकइ भलाईं॥१॥
भावार्थ
विधाता जब इस प्रकारका ( हंसका-सा ) विवेक देते हैं, तब दोषोंको छोड़कर मन गुणोंमें अनुरक्त होता है। काल-स्वभाव और कर्मकी प्रबलतासे भले लोग ( साधु ) भी मायाके वशमें होकर कभी-कभी भलाईसे चूक जाते हैं॥ १ ॥
सो सुधारि हरिजन जिमि लेहीं। दलि दुख दोष बिमल जसु देहीं॥ खलउ करहिं भल पाइ सुसंगू। मिटइ न मलिन सुभाउ अभंगू॥२॥
भावार्थ
भगवान्के भक्त जैसे उस चूकको सुधार लेते हैं और दुःख-दोषोंको मिटाकर निर्मल यश देते हैं, वैसे ही दुष्ट भी कभी-कभी उत्तम सङ्ग पाकर भलाई करते हैं; परन्तु उनका कभी भंग न होनेवाला मलिन स्वभाव नहीं मिटता॥ २ ॥
लखि सुबेष जग बंचक जेऊ। बेष प्रताप पूजिअहिं तेऊ॥ उघरहिं अंत न होइ निबाहू। कालनेमि जिमि रावन राहू॥३॥
भावार्थ
जो [ वेषधारी ] ठग हैं, उन्हें भी अच्छा ( साधुका-सा ) वेष बनाये देखकर वेषके प्रतापसे जगत् पूजता है; परन्तु एक-न-एक दिन वे चौड़े आ ही जाते हैं, अन्ततक उनका कपट नहीं निभता, जैसे कालनेमि, रावण और राहुका हाल हुआ॥ ३ ॥
किएहुँ कुबेषु साधु सनमानू। जिमि जग जामवंत हनुमानू॥ हानि कुसंग सुसंगति लाहू। लोकहुँ बेद बिदित सब काहू॥४॥
भावार्थ
बुरा वेष बना लेनेपर भी साधुका सम्मान ही होता है, जैसे जगत्में जाम्बवान् और हनुमान्जीका हुआ। बुरे संगसे हानि और अच्छे संगसे लाभ होता है, यह बात लोक और वेदमें है और सभी लोग इसको जानते हैं॥ ४॥
गगन चढ़इ रज पवन प्रसंगा। कीचहिं मिलइ नीच जल संगा॥ साधु असाधु सदन सुक सारीं। सुमिरहिं राम देहिं गनि गारीं॥५॥
भावार्थ
पवनके संगसे धूल आकाशपर चढ़ जाती है और वही नीच ( नीचेकी ओर बहनेवाले ) जलके संगसे कीचड़में मिल जाती है। साधुके घरके तोता-मैना राम-राम सुमिरते हैं और असाधुके घरके तोता-मैना गिन-गिनकर गालियाँ देते हैं॥ ५ ॥
धूम कुसंगति कारिख होई। लिखिअ पुरान मंजु मसि सोई॥ सोइ जल अनल अनिल संघाता। होइ जलद जग जीवन दाता॥६॥
भावार्थ
कुसंगके कारण धुआँ कालिख कहलाता है, वही धुआँ [ सुसंगसे ] सुन्दर स्याही होकर पुराण लिखनेके काममें आता है और वही धुआँ जल, अग्नि और पवनके संगसे बादल होकर जगत्को जीवन देनेवाला बन जाता है॥ ६ ॥
ग्रह भेषज जल पवन पट पाइ कुजोग सुजोग । होहिं कुबस्तु सुबस्तु जग लखहिं सुलच्छन लोग ॥ ७ (क) ॥
भावार्थ
ग्रह, ओषधि, जल, वायु और वस्त्र—ये सब भी कुसंग और सुसंग पाकर संसारमें बुरे और भले पदार्थ हो जाते हैं। चतुर एवं विचारशील पुरुष ही इस बातको जान पाते हैं॥ ७ ( क )॥
सम प्रकास तम पाख दुहुँ नाम भेद बिधि कीन्ह । ससि सोषक पोषक समुझि जग जस अपजस दीन्ह ॥ ७ (ख) ॥
भावार्थ
महीनेके दोनों पखवाड़ोंमें उजियाला और अँधेरा समान ही रहता है, परन्तु विधाताने इनके नाममें भेद कर दिया है ( एकका नाम शुक्ल और दूसरेका नाम कृष्ण रख दिया )। एकको चन्द्रमाका बढ़ानेवाला और दूसरेको उसका घटानेवाला समझकर जगत्ने एकको सुयश और दूसरेको अपयश दे दिया॥ ७ ( ख )॥
जड़ चेतन जग जीव जत सकल राममय जानि । बंदउँ सब के पद कमल सदा जोरि जुग पानि ॥ ७ (ग) ॥
भावार्थ
जगत्में जितने जड़ और चेतन जीव हैं, सबको राममय जानकर मैं उन सबके चरणकमलोंकी सदा दोनों हाथ जोड़कर वन्दना करता हूँ॥ ७ ( ग )॥
देव दनुज नर नाग खग प्रेत पितर गंधर्ब । बंदउँ किंनर रजनिचर कृपा करहु अब सर्ब ॥ ७ (घ) ॥
भावार्थ
देवता, दैत्य, मनुष्य, नाग, पक्षी, प्रेत, पितर, गन्धर्व, किन्नर और निशाचर सबको मैं प्रणाम करता हूँ। अब सब मुझपर कृपा कीजिये॥ ७ ( घ )॥
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