दोहा 79
दच्छसुतन्ह उपदेसेन्हि जाई। तिन्ह फिरि भवनु न देखा आई॥ चित्रकेतु कर घरु उन घाला। कनककसिपु कर पुनि अस हाला॥१॥
भावार्थ
उन्होंने जाकर दक्षके पुत्रोंको उपदेश दिया था, जिससे उन्होंने फिर लौटकर घरका मुँह भी नहीं देखा। चित्रकेतुके घरको नारदने ही चौपट किया। फिर यही हाल हिरण्यकशिपुका हुआ॥१॥
नारद सिख जे सुनहिं नर नारी। अवसि होहिं तजि भवनु भिखारी॥ मन कपटी तन सज्जन चीन्हा। आपु सरिस सबही चह कीन्हा॥२॥
भावार्थ
जो स्त्री-पुरुष नारदकी सीख सुनते हैं, वे घर-बार छोड़कर अवश्य ही भिखारी हो जाते हैं। उनका मन तो कपटी है, शरीरपर सज्जनोंके चिह्न हैं। वे सभीको अपने समान बनाना चाहते हैं॥२॥
तेहि कें बचन मानि बिस्वासा। तुम्ह चाहहु पति सहज उदासा॥ निर्गुन निलज कुबेष कपाली। अकुल अगेह दिगंबर ब्याली॥३॥
भावार्थ
उनके वचनोंपर विश्वास मानकर तुम ऐसा पति चाहती हो जो स्वभावसे ही उदासीन, गुणहीन, निर्लज्ज, बुरे वेषवाला, नर-कपालोंकी माला पहननेवाला, कुलहीन, बिना घर-बारका, नंगा और शरीरपर साँपोंको लपेटे रखनेवाला है॥३॥
कहहु कवन सुखु अस बरु पाएँ। भल भूलिहु ठग के बौराएँ॥ पंच कहें सिवँ सती बिबाही। पुनि अवडेरि मराएन्हि ताही॥४॥
भावार्थ
ऐसे वरके मिलनेसे कहो, तुम्हें क्या सुख होगा? तुम उस ठग ( नारद ) के बहकावेमें आकर खूब भूलीं। पहले पंचोंके कहनेसे शिवने सतीसे विवाह किया था, परन्तु फिर उसे त्यागकर मरवा डाला॥४॥
अब सुख सोवत सोचु नहिं भीख मागि भव खाहिं। सहज एकाकिन्ह के भवन कबहुँ कि नारि खटाहिं॥७९॥
भावार्थ
अब शिवको कोई चिन्ता नहीं रही, भीख माँगकर खा लेते हैं और सुखसे सोते हैं। ऐसे स्वभावसे ही अकेले रहनेवालोंके घर भी भला क्या कभी स्त्रियाँ टिक सकती हैं?॥७९॥
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