दोहा 72
अब जौं तुम्हहि सुता पर नेहू। तौ अस जाइ सिखावनु देहू॥ करै सो तपु जेहिं मिलहिं महेसू। आन उपायँ न मिटिहि कलेसू॥१॥
भावार्थ
अब यदि तुम्हें कन्यापर प्रेम है तो जाकर उसे यह शिक्षा दो कि वह ऐसा तप करे जिससे शिवजी मिल जायँ। दूसरे उपायसे यह क्लेश नहीं मिटेगा॥ १ ॥
नारद बचन सगर्भ सहेतू। सुंदर सब गुन निधि बृषकेतू॥ अस बिचारि तुम्ह तजहु असंका। सबहि भाँति संकरु अकलंका॥ २॥
भावार्थ
नारदजीके वचन रहस्यसे युक्त और सकारण हैं और शिवजी समस्त सुन्दर गुणोंके भण्डार हैं। यह विचारकर तुम [ मिथ्या ] सन्देहको छोड़ दो। शिवजी सभी तरहसे निष्कलङ्क हैं॥ २ ॥
सुनि पति बचन हरषि मन माहीं। गई तुरत उठि गिरिजा पाहीं॥ उमहि बिलोकि नयन भरे बारी। सहित सनेह गोद बैठारी॥३॥
भावार्थ
पतिके वचन सुन मनमें प्रसन्न होकर मैना उठकर तुरंत पार्वतीके पास गयीं। पार्वतीको देखकर उनकी आँखोंमें आँसू भर आये। उसे स्नेहके साथ गोदमें बैठा लिया॥ ३ ॥
बारहिं बार लेति उर लाई। गदगद कंठ न कछु कहि जाई॥ जगत मातु सर्बग्य भवानी। मातु सुखद बोलीं मृदु बानी॥ ४॥
भावार्थ
फिर बार-बार उसे हृदयसे लगाने लगीं। प्रेमसे मैनाका गला भर आया, कुछ कहा नहीं जाता। जगज्जननी भवानीजी तो सर्वज्ञ ठहरीं। [ माताके मनकी दशाको जानकर ] वे माताको सुख देनेवाली कोमल वाणीसे बोलीं—॥ ४ ॥
सुनहि मातु मैं दीख अस सपन सुनावउँ तोहि। सुंदर गौर सुबिप्रबर अस उपदेसेउ मोहि॥७२॥
भावार्थ
माँ! सुन, मैं तुझे सुनाती हूँ; मैंने ऐसा स्वप्न देखा है कि मुझे एक सुन्दर गौरवर्ण श्रेष्ठ ब्राह्मणने ऐसा उपदेश दिया है—॥ ७२ ॥
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