दोहा 68
सुनि मुनि गिरा सत्य जियँ जानी। दुख दंपतिहि उमा हरषानी॥ नारदहूँ यह भेदु न जाना। दसा एक समुझब बिलगाना॥१॥
भावार्थ
नारद मुनिकी वाणी सुनकर और उसको हृदयमें सत्य जानकर पति-पत्नी ( हिमवान् और मैना ) को दुःख हुआ और पार्वतीजी प्रसन्न हुईं। नारदजीने भी इस रहस्यको नहीं जाना, क्योंकि सबकी बाहरी दशा एक-सी होनेपर भी भीतरी समझ भिन्न-भिन्न थी॥ १ ॥
सकल सखीं गिरिजा गिरि मैना। पुलक सरीर भरे जल नैना॥ होइ न मृषा देवरिषि भाषा। उमा सो बचनु हृदयँ धरि राखा॥२॥
भावार्थ
सारी सखियाँ, पार्वती, पर्वतराज हिमवान् और मैना सभीके शरीर पुलकित थे और सभीके नेत्रोंमें जल भरा था। देवर्षिके वचन असत्य नहीं हो सकते, [ यह विचारकर ] पार्वतीने उन वचनोंको हृदयमें धारण कर लिया॥ २ ॥
उपजेउ सिव पद कमल सनेहू। मिलन कठिन मन भा संदेहू॥ जानि कुअवसरु प्रीति दुराई। सखी उछँग बैठी पुनि जाई॥३॥
भावार्थ
उन्हें शिवजीके चरणकमलोंमें स्नेह उत्पन्न हो आया, परन्तु मनमें यह सन्देह हुआ कि उनका मिलना कठिन है। अवसर ठीक न जानकर उमाने अपने प्रेमको छिपा लिया और फिर वे सखीकी गोदमें जाकर बैठ गयीं॥ ३ ॥
झूठि न होइ देवरिषि बानी। सोचहिं दंपति सखीं सयानी॥ उर धरि धीर कहइ गिरिराऊ। कहहु नाथ का करिअ उपाऊ॥ ४॥
भावार्थ
देवर्षिकी वाणी झूठी न होगी, यह विचारकर हिमवान्, मैना और सारी चतुर सखियाँ चिन्ता करने लगीं। फिर हृदयमें धीरज धरकर पर्वतराजने कहा—हे नाथ! कहिये, अब क्या उपाय किया जाय?॥ ४ ॥
कह मुनीस हिमवंत सुनु जो बिधि लिखा लिलार। देव दनुज नर नाग मुनि कोउ न मेटनिहार॥६८॥
भावार्थ
मुनीश्वरने कहा—हे हिमवान्! सुनो, विधाताने ललाटपर जो कुछ लिख दिया है, उसको देवता, दानव, मनुष्य, नाग और मुनि कोई भी नहीं मिटा सकते॥ ६८ ॥
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