दोहा 63
पिता भवन जब गईं भवानी। दच्छ त्रास काहुँ न सनमानी॥ सादर भलेहिं मिली एक माता। भगिनीं मिलीं बहुत मुसुकाता॥१॥
भावार्थ
भवानी जब पिता ( दक्ष ) के घर पहुँचीं, तब दक्षके डरके मारे किसीने उनकी आवभगत नहीं की, केवल एक माता भले ही आदरसे मिली। बहिनें बहुत मुसकराती हुई मिलीं॥ १ ॥
दच्छ न कछु पूछी कुसलाता। सतिहि बिलोकि जरे सब गाता॥ सतीं जाइ देखेउ तब जागा। कतहुँ न दीख संभु कर भागा॥२॥
भावार्थ
दक्षने तो उनकी कुछ कुशलतक नहीं पूछी, सतीजीको देखकर उलटे उनके सारे अङ्ग जल उठे। तब सतीने जाकर यज्ञ देखा तो वहाँ कहीं शिवजीका भाग दिखायी नहीं दिया॥२॥
तब चित चढ़ेउ जो संकर कहेऊ। प्रभु अपमानु समुझि उर दहेऊ॥ पाछिल दुखु न हृदयँ अस ब्यापा। जस यह भयउ महा परितापा॥३॥
भावार्थ
तब शिवजीने जो कहा था वह उनकी समझमें आया। स्वामीका अपमान समझकर सतीका हृदय जल उठा। पिछला ( पतिपरित्यागका ) दुःख उनके हृदयमें उतना नहीं व्यापा था, जितना महान् दुःख इस समय ( पति-अपमानके कारण ) हुआ॥३॥
जद्यपि जग दारुन दुख नाना। सब तें कठिन जाति अवमाना॥ समुझि सो सतिहि भयउ अति क्रोधा। बहु बिधि जननीं कीन्ह प्रबोधा॥४॥
भावार्थ
यद्यपि जगत्में अनेक प्रकारके दारुण दुःख हैं, तथापि जाति-अपमान सबसे बढ़कर कठिन है। यह समझकर सतीजीको बड़ा क्रोध हो आया। माताने उन्हें बहुत प्रकारसे समझाया-बुझाया॥४॥
सिव अपमानु न जाइ सहि हृदयँ न होइ प्रबोध। सकल सभहि हठि हटकि तब बोलीं बचन सक्रोध॥६३॥
भावार्थ
परन्तु उनसे शिवजीका अपमान सहा नहीं गया, इससे उनके हृदयमें कुछ भी प्रबोध नहीं हुआ। तब वे सारी सभाको हठपूर्वक डाँटकर क्रोधभरे वचन बोलीं— ॥६३॥
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